होर्मुज संकट के बीच पश्चिम एशिया में सैन्य हलचल तेज होती दिख रही है। फ्रांस का नौसैनिक बेड़ा स्वेज नहर के दक्षिण से आगे बढ़ते हुए लाल सागर की ओर पहुंच रहा है। इस बेड़े में फ्रांस का परमाणु ऊर्जा से संचालित विमानवाहक पोत चार्ल्स डी गॉल शामिल है। यह तैनाती होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास संभावित अभियान की तैयारी के रूप में देखी जा रही है, जिसे फ्रांस और ब्रिटेन मिलकर आगे बढ़ा रहे हैं।
फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने पहले ही संकेत दे दिया था कि फ्रांस पश्चिम एशिया में अपनी सैन्य उपस्थिति बढ़ाएगा। उसी रणनीति के तहत “चार्ल्स डी गॉल” और उसके साथ चल रहे युद्धपोत अब ऐसे स्थान पर पहुंच रहे हैं,जहां से वे हालात बिगड़ने पर तुरंत प्रतिक्रिया दे सकें।
चार्ल्स डी गॉल बाल्टिक सागर से हुआ था रवाना
गौरतलब है कि सैन्य अभियान के तहत तीन मार्च को चार्ल्स डी गॉल को बाल्टिक सागर से रवाना होने का आदेश दिया गया था। इस सैन्य अभियान में आठ फ्रिगेट और दो मिस्ट्रल श्रेणी के हमलावर पोत भी शामिल हैं। विमानवाहक पोत के दक्षिण की ओर बढ़ने से फ्रांसीसी वायु सेना खाड़ी में प्रवेश किए बिना ही जलडमरूमध्य की सीमा में आ गई है।
होर्मुज जलडमरूमध्य वाणिज्यिक जहाजों की आवाजाही बाधित
फ्रांस द्वारा यह कदम तब उठाया गया है जब ईरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य में वाणिज्यिक जहाजों की आवाजाही प्रभावी रूप से बाधित कर दी गई है। यह जलमार्ग वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद अहम है, क्योंकि दुनिया के लगभग 20% कच्चे तेल का व्यापार इसी रास्ते से होता है। ऐसे में इस क्षेत्र में किसी भी सैन्य गतिविधि का सीधा असर वैश्विक अर्थव्यवस्था और तेल बाजार पर पड़ सकता है।
फ्रांसीसी नौसैनिक बेड़े की तैनाती पर क्या बोले कर्नल गुइलौम वर्नेट
फ्रांसीसी सशस्त्र बलों के चीफ ऑफ स्टाफ के प्रवक्ता कर्नल गुइलौम वर्नेट ने बताया कि स्वेज के दक्षिण में जाना हमारे लिए नया है। भौगोलिक रूप से यह होर्मुज जलडमरूमध्य के करीब है और इसलिए परिस्थितियां अनुकूल होते ही हमें तेजी से प्रतिक्रिया करने में सक्षम बनाएगा। वर्नेट ने आगे कहा कि फ्रांस,ब्रिटेन और 50 से अधिक देशों द्वारा गठित व्यापक होर्मुज गठबंधन तब तक काम करना शुरू नहीं करेगा जब तक किसी भी अभियान के लिए पड़ोसी देशों की सहमति न मिल जाए।
उन्होंने कहा कि यह तैनाती पूरी तरह रक्षात्मक है और अंतरराष्ट्रीय कानून के दायरे में रहकर की जा रही है। हालांकि,इसे ईरान और पश्चिमी देशों के बीच बढ़ते तनाव के संदर्भ में देखा जा रहा है। दिलचस्प बात यह है कि फ्रांस-ब्रिटेन का यह मिशन अमेरिकी एस्कॉर्ट ऑपरेशन से अलग बताया जा रहा है,जिससे यह संकेत मिलता है कि पश्चिमी देशों के भीतर भी रणनीतिक स्तर पर अलग-अलग पहलें चल रही हैं।
पश्चिमी देशों के भीतर भी चल रही अलग-अलग पहलें
बीते कुछ हफ्तों में इस बाबत पश्चिमी देशों में कई अहम बैठकें भी हुई हैं। मैक्रों और ब्रिटिश प्रधानमंत्री केअर स्टार्मर ने 16 अप्रैल को पेरिस शिखर सम्मेलन में 50 से अधिक देशों की मेजबानी की थी। इसके अलाना 30 से अधिक देशों के सैन्य योजनाकारों ने 22-23 अप्रैल को ब्रिटेन में आयोजित एक सम्मेलन में होर्मुज में परिचालन संबंधी विवरणों को अंतिम रूप दिया। इससे साफ है कि यह केवल द्विपक्षीय नहीं,बल्कि एक व्यापक अंतरराष्ट्रीय प्रयास का हिस्सा बनता जा रहा है।
