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9/11 की 'डस्ट लेडी': एक तस्वीर ने बदल दी जिंदगी, 10 साल तक डर के साये में जीने को हुईं मजबूर

अमेरिकी लोग 11 सितंबर 2001 को हुए भीषण आतंकी हमलों की 24वीं बरसी मना रहे हैं और इन हमलों में मारे गए लोगों की याद में श्रद्धांजलि सभाएं आयोजित की जा रही हैं। इस हमले से जुड़ी कई यादें और दुखद कहानियां है। एक महिला धमाकों के धुओं के बीच फंस जाती है। हमले में वह बाल बाल बच जाती है लेकिन उसकी जिंदगी कई मायनों में बदल जाती है। पढ़िए डस्ट लेडी के नाम से चर्चित इस महिला की दुखद कहानी...।

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9/11 हमले में बची एक महिला की दर्दनाक कहानी (PHOTO- TWITTER)

9/11 attack survivor story: अमेरिका की वो भयावह दास्तान जिसकी कल्पना दुनिया में किसी ने भी नहीं की थी। ट्विन टावर पर आतंकी हमले का वो दुखद मंजर आजतक दुनिया नहीं भूला पाई है। इसी हमले के बाद कई कहानियां और तस्वीरें वायरल हुई। इसी में एक थी डस्ट लेडी की कहानी। डस्ट लेडी की वायरल तस्वीर के पीछे एक ऐसी महिला थी जिसने उस दिन ( 9/11) के आघात के साथ अपने जीवन का बाकी हिस्सा बिताया।

11 सितंबर, 2001 की सुबह, न्यूयॉर्क शहर में जीवन हमेशा के लिए बदल गया। यह दिन अमेरिकी इतिहास के सबसे अंधेरे दिनों में से शुमार किया जाता है जब हाईजैक किए गए विमानों ने वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के ट्विन टावर्स को निशाना बनाया। विमान आतंकियों के कब्जे में थे और उन्होंने अमेरिका पर कहर बरपा दिया। टावर्स जलने लगे और बाद में ढह गए। लोअर मैनहट्टन की सड़कों पर धूल, मलबा, और हजारों लोग अपनी जान बचाने के लिए भागते हुए देखे गए।

कैद हुई डस्ट लेडी की तस्वीर

11 सितंबर, 2001 की सुबह, न्यूयॉर्क शहर में जीवन अचानक बदल गया

11 सितंबर, 2001 की सुबह, न्यूयॉर्क शहर में जीवन अचानक बदल गया

उस दुखद मंजर के बीच एक तस्वीर कैमरे में कैद होती है। एक महिला जिसका चेहरा और कपड़े मोटी ग्रे राख में ढका हुआ था। वह महिला थी मार्सी बॉर्डर्स जिसे बाद में 9/11 की डस्ट लेडी के रूप में दुनिया भर में जाना गया। बॉर्डर्स उस समय 28 वर्ष की थीं। नॉर्थ टॉवर में बैंक ऑफ अमेरिका में काम कर रही थीं। जब पहला विमान टकराया तो वह बाकी लोगों की तरह ही बुरी तरह घबरा गई और उसे समझ में नहीं आया कि वो क्या करें, लेकिन वह बचने में सफल रहीं। धुएं और चीखों के बीच सीढ़ियों से वह भागती रही लेकिन वह ढहते टावर्स की धूल के बीच बुरी तरह फंस गई। जिंदगी और मौत से लड़ती उस महिला की तस्वीर वायरल हो गई जिसे डस्ट लेडी के नाम से जाना गया ।

जीने की चाह खत्म हो गई थी

बॉडर्स की बेटी नोएल ने न्यूज़ 12 को बताया कि बॉर्डर्स ने खुद माना था कि वह कभी पहले जैसी नहीं रहीं। उन्हें नहीं पता था कि उनकी तस्वीर ली गई है जब तक कि उन्होंने अपने चेहरे को हर जगह नहीं देखा। उनकी तस्वीर अखबारों, टेलीविजन, और ऑनलाइन हर जगह आ गई थी। बॉर्डर्स ने खुद कहा था कि मैंने लगभग 10 सालों में एक दिन का काम नहीं किया, और 2011 तक, मैं पूरी तरह से बिखर गई थी। हर बार जब मैंने एक विमान देखा, मैं घबरा गई। अगर मैंने किसी आदमी को एक इमारत पर देखा, तो मुझे यकीन था कि वह मुझे गोली मारने वाला है। न्यूयॉर्क पोस्ट को दिए इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि मैंने क्रैक कोकीन पीना शुरू कर दिया, क्योंकि मैं जीना नहीं चाहती थी।

नहीं भरे उस आतंकी हमले के घाव

9/11 हमलों में कुल  2,977 लोग मारे गए थे  (फोटो - AP)

9/11 हमलों में कुल 2,977 लोग मारे गए थे (फोटो - AP)

9/11 के कई बचे हुए लोगों की तरह, बॉर्डर्स ने कभी ना भरने वाले घावों का बोझ लंबे समय तक उठाया। उन्हें सुकून केवल 2011 में मिला, जब ओसामा बिन लादेन को मार दिया गया। उन्होंने कहा कि ईश्वर ने मेरे सबसे बड़े डर को खत्म कर दिया। मैं उसके बारे में सोते-सोते खो जाती थी, बिन लादेन के मेरे घर पर बमबारी करने के बुरे सपने देखती थी, लेकिन अब मुझे मानसिक शांति है।

धुओं के विषैले गुबार ने लील ली जिंदगी

लेकिन उस सुबह न्यूयॉर्क पर छाए विषैले धुएं ने पहले ही अपना असर दिखा दिया था। 2015 में केवल 42 वर्ष की उम्र में, मार्सी बॉर्डर्स पेट के कैंसर की जटिलताओं से मर गईं। उसका परिवार अब भी मानता है कि यह बीमारी उस धूल और रसायनों से जुड़ी थी जिन्हें उसने ट्विन टावर्स से भागते समय सांस लेने के दरम्यां हुई थी। मार्सी भी आतंकी हमले का शिकार बन गई और आतंकी हमले के 14 साल के बाद उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया। लेकिन वह इस सुकून के साथ मरी कि इस आतंकी हमले की तबाही के सरगना ओसामा बिन लादेन को तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने मिट्टी में मिला दिया ।

9/11 हमलों में कुल 2,977 लोग मारे गए थे

अमेरिका में 11 सितंबर, 2001 को हुए भीषण आतंकी हमलों को 9/11 हमलों के नाम से जाना जाता है। अलकायदा के आतंकवादियों द्वारा किए गए इन हमलों में कुल 2,977 लोग मारे गए थे, जिनमें वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के कई वित्तीय कर्मचारी और अग्निशमन कर्मी तथा पुलिस अधिकारी शामिल थे, जो जलती हुई इमारतों में लोगों की जान बचाने के लिए पहुंचे थे।

Sanjeev Dubey
संजीव कुमार दुबेauthor

पत्रकारिता में मेरे सफर की शुरुआत 20 साल पहले हुई। 2002 अक्टूबर में टीवी की रुपहले दुनिया में दाखिल हुआ। शुरुआत टीवी की दुनिया के उस पहलू से हुई जहां हर खबर को उसके मुताबिक आकार दिया जाता है यानी उसे कसा जाता है। सहारा टीवी में मेरे कामकाज की शुरुआत पैकेजिंग से हुई जहां खबरों को अलग-अलग प्रारूपों में गढ़ने का काम होता है। फिर पीसीआर में आउटपुट एडिटर की भूमिका निभाने का मौका मिला जहां तुरंत निर्णय कर खबरों को ब्रेक करने की चुनौती रहती है। न्यूजरूम की गहमागमी के बीच रनडाउन तैयार करने की जिम्मेदारी भी बखूबी निभाई। यहां ब्रेकिंग, हार्ड कोर की खबरों और फीचर्ड प्रोग्रामिंग ने मेरे अनुभव का दायरा तो बढ़ाया ही उसमें गहराई एवं पैनापन भी दिया। 2011 में टेलिविजन न्यूज की दुनिया को अलविदा कहना पड़ा। अक्टूबर 2011 में Zee News की हिंदी वेबसाइट को अपनी अगवुाई में लॉन्च करने का मौका मिला। डिजिटल की दुनिया और टीवी की दुनिया में खबरें परोसने और खबरों को दिखाने का अंदाज बिल्कुल अलग था। मैं उस दौर में दस्तक दे चुका था जब टीवी भी स्मार्टफोन पर देखा जाने लगा था। डिजिटल पर भी ब्रेकिंग थी। अगर टीवी में प्रोग्रामिंग थी तो यहां भी बतौर फीचर, सॉफ्ट स्टोरीज का विशाल संसार था। एक नया मीडियम जो स्मार्टफोन पर बखूबी देखा और समझा जा सकता था। डिजिटल की इस दुनिया में टीवी और अखबार दोनों समाहित थे। यहां काम करते हुए डिजिटल न्यूज मीडिया की बारीकियां तो सीखी हीं। साथ ही जब जी न्यूज से विदाई ली तो उस समय 33 मिलियन यूजर्स के बीच 84 मिलियन पीवीज देखने की अपार खुशियां हासिल हुईं। जी न्यूज में एक लंबी पारी खेलने के बाद जुलाई 2017 में टाइम्स नाउ नेटवर्क से जुड़ने का अवसर मिला। 2017 में ही टाइम्स नाउ की हिंदी वेबसाइट की शुरुआत हुई। यह पहला मौका था जब टाइम्स नाउ की अगुवाई में कोई हिंदी न्यूज वेबसाइट लॉन्च हुई। यहां एक नई और युवा टीम बनी। यह टीम आक्रामक अंदाज में काम करते हुए कम समय में अपनी पहचान बनाई। डिजिटल की दुनिया के बदलते संसार में अब चुनौती पीवीज की नहीं बल्कि यूजर्स की थी, जिन्हें लाना इतना आसान नहीं थी। लेकिन टीम के जज्बे, हौसले ने असाधारण चुनौतियों को भी अपनी मेहनत एवं लगन से उसे सामान्य बनाया। डिजिटल न्यूज की दुनिया में हर पल चुनौतियों के बीच नया कुछ सीखने-समझने और कुछ कर गुजरने की प्रेरणा मिलती है। यह सिलसिला आज भी अनवरत जारी है-

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