TRAI Direct to Mobile satellite Authorization : आने वाले समय में पहाड़ों, जंगलों और दूरदराज के इलाकों में बिना मोबाइल टावर के फोन पर इंटरनेट और कॉलिंग संभव होगी। भारत में सैटेलाइट के जरिए सीधे स्मार्टफोन को कनेक्ट करने की तैयारी शुरू हो गई है। टेलीकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया (TRAI) ने 5 नवंबर को Direct-to-Device (D2D) सैटेलाइट कनेक्टिविटी के लिए नए नियमों की सिफारिश की है।
TRAI के प्रस्तावों को अगर नियमों के तौर मंजूरी मिलती है, तो इससे एलन मस्क की Starlink समेत कई सैटेलाइट कंपनियों के लिए कारोबार के नए रास्ते खुल सकते हैं। भारत में खासतौर पर Jio, Airtel और Vodafone Idea को इसका सीधा फायदा मिल सकता है। हालांकि, अभी यह सिर्फ प्रस्ताव है। TRAI ने अपनी सिफारिशें दूरसंचार विभाग (DoT) को भेजी हैं। इन्हें लागू करने का अंतिम फैसला सरकार करेगी।
क्या है डायरेक्ट टू मोबाइल टेक्नोलॉजी?
अभी मोबाइल फोन आसपास लगे टावरों के जरिए नेटवर्क से कनेक्ट होते हैं। लेकिन Direct-to-Device या डायरेक्ट टू मोबाइल टेक्नोलॉजी में सैटेलाइट सीधे स्मार्टफोन को नेटवर्क उपलब्ध करा सकता है। यानी इसके लिए हर जगह मोबाइल टावर लगाने की जरूरत नहीं होगी। इसका सबसे बड़ा फायदा उन इलाकों में हो सकता है जहां मोबाइल नेटवर्क पहुंचाना मुश्किल है। पहाड़ी क्षेत्रों, जंगलों, समुद्री इलाकों और दूरदराज के गांवों में रहने वाले लोग भी सैटेलाइट के जरिए कनेक्टिविटी हासिल कर सकेंगे। हालांकि, इसके लिए फोन का तकनीकी रूप से अनुकूल होना जरूरी होगा। TRAI ने भविष्य में बिकने वाले स्मार्टफोन में जरूरी सैटेलाइट मॉड्यूल शामिल करने के लिए हैंडसेट कंपनियों को प्रोत्साहित करने की सिफारिश भी की है।
क्या स्टारलिंक को मिलेगी भारत में एंट्री?
इस प्रस्ताव से Starlink को भारत में सैटेलाइट से सीधे मोबाइल कनेक्टिविटी देने के कारोबार का अवसर मिल सकता है। हालांकि, यह समझना जरूरी है कि Starlink की सामान्य इंटरनेट सेवा और Direct-to-Cell टेक्नोलॉजी अलग-अलग हैं। सामान्य Starlink इंटरनेट के लिए डिश और राउटर की जरूरत होती है। वहीं Direct-to-Cell में सैटेलाइट सीधे मोबाइल फोन को कनेक्ट कर सकता है। इसके लिए मोबाइल ऑपरेटर के साथ साझेदारी और संबंधित स्पेक्ट्रम का इस्तेमाल किया जाता है। Starlink को भारत में GMPCS सर्विस का लाइसेंस पहले ही मिल चुका है, लेकिन उसकी कमर्शियल सैटेलाइट ब्रॉडबैंड सेवा शुरू नहीं हुई है। नए प्रस्ताव से कंपनी को D2D कारोबार में भी अवसर मिल सकता है। इसके लिए उसे संबंधित नियामकीय और सुरक्षा शर्तें पूरी करनी होंगी।
Jio, Airtel और Vi को कैसे मिलेगा फायदा?
TRAI के प्रस्ताव का फायदा सिर्फ सैटेलाइट कंपनियों को नहीं मिलेगा। भारत की तीनों प्रमुख टेलीकॉम कंपनियां Jio, Airtel और Vodafone Idea भी इससे नए कारोबार के अवसर हासिल कर सकती हैं। Jio पहले ही अपना सैटेलाइट नेटवर्क तैयार कर चुका है। वहीं, Airtel ने इसके लिए Eutelsat OneWeb के साथ साझेदारी कर रखी है। हालांकि, OneWeb की मौजूदा सैटेलाइट व्यवस्था में D2D टेक्नोलॉजी शामिल नहीं है। वहीं, Vi ने AST SpaceMobile के साथ रणनीतिक साझेदारी की है। ऐसे में Vi को अवसर मिल सकता है।
TRAI ने सुझाए 2 मॉडल
TRAI ने डायरेक्ट टू मोबाइल सेवाओं के लिए 2 मॉडल प्रस्तावित किए हैं। पहला मॉडल मोबाइल सैटेलाइट सर्विसेज (MSS) आधारित है। इसमें L-band और S-band स्पेक्ट्रम के जरिए स्मार्टफोन सीधे सैटेलाइट से जुड़ेंगे। वहीं, दूसरा मॉडल इंटरनेशनल मोबाइल टेलीकम्युनिकेशन (IMT) स्पेक्ट्रम आधारित है। इसमें टेलीकॉम कंपनियों को पहले से आवंटित 600 MHz, 700 MHz, 800 MHz, 900 MHz, 1800 MHz और 2100 MHz बैंड का इस्तेमाल सैटेलाइट कनेक्टिविटी के लिए किया जा सकेगा। इस व्यवस्था में सैटेलाइट कंपनियों को संबंधित स्पेक्ट्रम रखने वाली टेलीकॉम कंपनियों के साथ समझौता करना होगा। स्पेक्ट्रम का अधिकार टेलीकॉम ऑपरेटरों के पास ही रहेगा। TRAI ने इसके लिए ऑपरेटरों पर अतिरिक्त स्पेक्ट्रम चार्ज नहीं लगाने की भी सिफारिश की है।
सैटेलाइट कंपनियां सीधे नहीं बेच सकेंगी मोबाइल सेवा
TRAI ने सैटेलाइट कम्युनिकेशन नेटवर्क प्रोवाइडर ऑथराइजेशन (Satellite Communication Network Provider Authorisation) नाम से नई कैटेगरी बनाने का प्रस्ताव दिया है। इसके तहत Starlink, OneWeb और दूसरी पात्र कंपनियां अपने सैटेलाइट नेटवर्क की क्षमता टेलीकॉम ऑपरेटरों और अधिकृत सर्विस प्रोवाइडरों को उपलब्ध करा सकेंगी। इसे सैटेलाइट कम्युनिकेशन नेटवर्क एज ए सर्विस (SCNaaS) मॉडल कहा गया है। इस व्यवस्था में सैटेलाइट कंपनियां नेटवर्क उपलब्ध कराएंगी, जबकि ग्राहकों को सेवा देने का काम अधिकृत टेलीकॉम कंपनियां करेंगी। नई अथॉराइजेशन की अवधि अधिकतम 20 साल रखने और इसे आगे 20 साल तक रिन्यू करने का प्रस्ताव है।
