आर्टिफिशिल इंटेलिजेंस स्टार्टअप (AI) परप्लेक्सिटी (Perplexity) ने एक चौंकाने वाला कदम उठाते हुए पूरी तरह से गूगल क्रोम ब्राउजर को खरीदने का प्रस्ताव रखा है। रिपोर्ट के मुताबिक, अरविंद श्रीनिवास के नेतृत्व वाली इस कंपनी ने गूगल को 34.5 अरब डॉलर (लगभग 3.02 लाख करोड़ रुपये) की पेशकश की है, जो परप्लेक्सिटी की अपनी वैल्यूएशन से भी अधिक है। यह पेशकश ऐसे समय आई है जब गूगल की पैरेंट कंपनी अल्फाबेट हाल ही में सर्च मोनोपॉली के मामले में एंटी-ट्रस्ट केस हार चुकी है और उस पर ब्राउजर बेचने का दबाव बढ़ रहा है।
परप्लेक्सिटी का प्रस्ताव और निवेश योजना
ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, परप्लेक्सिटी इस सौदे को बाहरी निवेशकों की मदद से फंड करना चाहती है। कंपनी के चीफ बिज़नेस ऑफिसर दिमित्री शेवेलेंको ने बताया कि कई बड़े निवेश फंड्स इस डील को पूरी तरह फाइनेंस करने पर सहमत हो चुके हैं। खास बात यह है कि यह प्रस्ताव कंपनी की अपनी वैल्यूएशन से बड़ा है। जुलाई में हुई फंडिंग राउंड के बाद परप्लेक्सिटी की वैल्यूएशन 18 अरब डॉलर (लगभग 1.57 लाख करोड़ रुपये) थी, जब उसने 100 मिलियन डॉलर (लगभग 875 करोड़ रुपये) की नई पूंजी जुटाई थी।
क्रोम के भविष्य को लेकर आश्वासन
टेकक्रंच को दिए बयान में, अरविंद श्रीनिवास की कंपनी ने प्रस्ताव की पुष्टि करते हुए कहा कि अगर सौदा सफल होता है तो क्रोमियम (Chrome का कोर इंजन) ओपन-सोर्स ही रहेगा और कंपनी हर साल 3 अरब डॉलर (लगभग 26,000 करोड़ रुपये) का निवेश जारी रखेगी। साथ ही परप्लेक्सिटी ने यह भी वादा किया कि क्रोम में यूजर डिफॉल्ट्स को नहीं बदला जाएगा और गूगल सर्च इंजन ही डिफॉल्ट रहेगा, न कि परप्लेक्सिटी का AI-पावर्ड सर्च।
गूगल पर बढ़ता दबाव
यह अभी स्पष्ट नहीं है कि गूगल वास्तव में क्रोम बेचने का विचार कर रहा है या नहीं। हाल ही में अमेरिकी न्याय विभाग (US DOJ) के पक्ष में आए एक एंटी-ट्रस्ट फैसले में कहा गया कि गूगल ने एप्पल जैसी कंपनियों के साथ प्रतिस्पर्धा-विरोधी समझौते किए थे, जिससे उसका सर्च इंजन अन्य सेवाओं से आगे रखा गया। इस फैसले के बाद अमेरिकी सरकार ने reportedly कहा कि गूगल को क्रोम बेचना चाहिए, प्रतिस्पर्धियों को सर्च डेटा का लाइसेंस देना चाहिए और एक्सक्लूसिव प्रमोशंस के लिए भुगतान बंद करना चाहिए।
