अध्यात्म

मंदिरों में घड़ी क्यों नहीं लगाई जाती? जानिए समय और अध्यात्म का गहरा रिश्ता

Temple clock significance: क्या आपने कभी सोचा है कि ज्यादातर मंदिरों में घड़ी क्यों नहीं दिखती? इसके पीछे कोई संयोग नहीं, बल्कि समय और अध्यात्म से जुड़ी एक खास सोच मानी जाती है। जानिए मंदिरों में घड़ी न लगाने की वजह और इसका आध्यात्मिक महत्व।

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मंदिरों में घड़ी न होने का रहस्या क्या है

Temple clock significance: आपने मंदिर में जाते समय शायद एक बात पर कभी ध्यान नहीं दिया होगा। वहां घंटियां होती हैं, आरती होती है, दीपक जलते हैं, लेकिन दीवार पर घड़ी बहुत कम दिखाई देती है। ऐसे में मन में सवाल आना स्वाभाविक है कि आखिर ऐसा क्यों होता है? क्या इसके पीछे कोई धार्मिक नियम है या फिर कोई खास मान्यता? दरअसल, इसका जवाब अध्यात्म और हमारी सोच से जुड़ा है। मंदिर ऐसी जगह मानी जाती है, जहां इंसान कुछ देर के लिए दुनिया की भागदौड़, काम की चिंता और समय के दबाव से दूर होकर सिर्फ भगवान और अपने मन से जुड़ता है। यही वजह है कि कई मंदिरों में घड़ी नहीं लगाई जाती।

मंदिर में समय नहीं भगवान सबसे अहम

घर, दफ्तर या बाजार में हमारी नजर बार-बार घड़ी पर जाती रहती है। लेकिन मंदिर में आने का मकसद अलग होता है। यहां इंसान कुछ पल शांति से भगवान का स्मरण करता है। अगर सामने घड़ी लगी हो, तो मन बार-बार यही सोचता रहता है कि कितनी देर हो गई या अब जल्दी निकलना है। इसलिए कई मंदिरों में घड़ी नहीं लगाई जाती, ताकि भक्त बिना किसी जल्दबाजी के पूजा कर सके।

अध्यात्म सिखाता है वर्तमान में जीना

भारतीय संस्कृति में हमेशा वर्तमान पल को सबसे महत्वपूर्ण माना गया है। मंदिर भी यही सीख देता है कि जब भगवान के सामने हों, तो मन पूरी तरह उसी पल में रहे। बीते हुए समय या आने वाले कामों की चिंता छोड़कर अगर कुछ मिनट भी मन शांत हो जाए, तो पूजा का असली लाभ मिलता है। यही वजह है कि मंदिर का माहौल समय की दौड़ से अलग महसूस होता है।

पूजा का समय पहले से तय होता है

कई लोगों को लगता है कि बिना घड़ी के मंदिर का काम कैसे चलता होगा। सच यह है कि मंदिरों में आरती, भोग और दूसरी पूजा का समय पहले से तय होता है। यह समय परंपरा, पंचांग, सूर्योदय और सूर्यास्त के अनुसार तय किया जाता है। पुजारी उसी दिनचर्या का पालन करते हैं। इसलिए घड़ी न होने से मंदिर की व्यवस्था पर कोई असर नहीं पड़ता।

घड़ी लगाना मना नहीं है

यह जानना भी जरूरी है कि किसी धर्मग्रंथ में ऐसा नहीं लिखा है कि मंदिर में घड़ी नहीं लगाई जा सकती। आज कई नए और बड़े मंदिरों में श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए घड़ियां लगी होती हैं। इसलिए इसे कोई धार्मिक नियम नहीं, बल्कि एक परंपरा और आध्यात्मिक सोच माना जाता है। पुराने मंदिरों में इस परंपरा का ज्यादा पालन देखने को मिलता है।

मंदिर हमें क्या संदेश देता है

मंदिर हमें यह एहसास कराता है कि जिंदगी सिर्फ समय के पीछे भागने का नाम नहीं है। दिनभर की भागदौड़ के बीच कुछ पल ऐसे भी होने चाहिए, जब मन शांत हो, भगवान का स्मरण हो और भीतर सुकून महसूस हो। शायद यही कारण है कि कई मंदिरों में घड़ी की जगह घंटियों की आवाज और मंत्रों की गूंज सुनाई देती है। यही माहौल इंसान को कुछ देर के लिए समय की चिंता से दूर ले जाता है।

डिस्क्लेमर: यह लेख सनातन परंपरा, भारतीय दर्शन, मंदिर संस्कृति और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध विश्वसनीय जानकारी के आधार पर तैयार किया गया है। अलग-अलग मंदिरों की परंपराएं अलग हो सकती हैं। यहां दी गई जानकारी का उद्देश्य धार्मिक और सांस्कृतिक विषय को आसान भाषा में समझाना है।

Vineet
विनीतauthor

विनीत टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में हेल्थ डेस्क के साथ बतौर चीफ कॉपी एडिटर जुड़े हैं। दिल्ली के रहने वाले विनीत को हेल्थ, फिटनेस और न्यूट्रिशन जैसे विषयों पर गहरी समझ है। इन्होंने हेल्थ, फिटनेस, न्यूट्रिशन और सप्लीमेंट के फील्ड में प्रोफेशनल सर्टिफिकेशन भी किए हैं। वे 6 साल से इस फील्ड से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर 7,000 से अधिक लेख लिख चुके हैं। विनीत की खासियत उनकी रिसर्च-बेस्ड लेखन शैली और जनहित को ध्यान में रखते हुए लिखी गई जानकारीपूर्ण स्टोरीज हैं।

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