Vat Savitri Vrat katha Hindi Mein (सावित्री की कथा है): वट सावित्री पर्व इस साल 26 जून को मनाया जा रहा है। इस दिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और स्वस्थ जीवन की कामना के लिए व्रत रहती हैं। इस व्रत में वट वृक्ष की पूजा का विशेष महत्व माना गया है। इसके अलावा एक और चीज है जिसके बिना ये व्रत अधूरा माना जाता है वो है इस व्रत की पावन गाथा। इस पवित्र दिन पर सावित्री और सत्यवान की कथा सुनना बेहद फलदायी माना जाता है। यहां देखें वट सावित्री व्रत की पौराणिक कथा।
वट सावित्री व्रत कथा (Vat Savitri Vrat Katha In Hindi)
वट सावित्री व्रत की पौराणिक कथा अनुसार सावित्री महाराज अश्वपति की पुत्री थीं। वह अत्यंत सुंदर, विदुषी और तेजस्विनी थीं। जब विवाह योग्य हुईं, तो उन्होंने स्वयं सत्यवान को अपने पति के रूप में चुना। किंतु नारद मुनि ने चेतावनी दी कि सत्यवान अल्पायु है और केवल एक वर्ष तक जीवित रहेगा।
परंतु सावित्री ने अपने प्रेम, निष्ठा और दृढ़ निश्चय से सत्यवान से विवाह किया। इसके बाद सावित्री अपने पति सत्यवान के साथ वन में वास करने लगीं। एक दिन, सत्यवान लकड़ी काटते समय अचानक अचेत हो गए। उसी समय यमराज उनके प्राण लेने आए। सावित्री ने उन्हें रोकने का प्रयास किया और यमराज के पीछे-पीछे चलने लगीं।
यमराज ने उसे कई बार लौटने को कहा, पर सावित्री अपने धर्म, प्रेम और व्रत की शक्ति से पीछे नहीं हटी। यमराज उसकी निष्ठा और बुद्धिमत्ता से प्रभावित हुए और उसे वर मांगने को कहा। सावित्री ने कहा कि मेरे सास-ससुर वनवासी और अंधे हैं, उन्हें अगर हो सके तो दिव्य ज्योति प्रदान करें। यमराज ने सावित्री की ये इच्छा पूरी कर दी और कहा कि अब वापस लौट जाओ। लेकिन सावित्री इसके बाद भी अपने पति सत्यवान के पीछे-पीछे चलती रहीं। यमराज ने कहा देवी तुम वापस जाओ। सावित्री ने कहा कि मुझे अपने पति के पीछे-पीछे चलने में कोई परेशानी नहीं है क्योंकि यही मेरा कर्तव्य है। यह सुनकर यमराज ने फिर से उसे एक और वर मांगने के लिए कहा।
सावित्री बोलीं मेरे ससुर का राज्य छिन गया है, उसे पुन: वापस दिला दें। यमराज ने सावित्री को यह भी वरदान भी दे दिया और कहा अब वापस लौट जाओ। लेकिन सावित्री फिर भी पीछे-पीछे चलती रहीं। फिर यमराज ने सावित्री को तीसरा वरदान मांगने के लिए कहा। इस पर सावित्री ने अपने लिए 100 संतानों सहित सौभाग्य का वरदान मांगा। यमराज ने इसका वरदान भी सावित्री को दे दिया।
लेकिन यमराज को समझ आया कि पति सत्यवान के बिना यह वरदान संभव नहीं है। इसके बाद यमराज को सत्यवान के प्राण छोड़ने पड़े। यमराज अंतध्यान हो गए और सावित्री को अपने पति के प्राण उसी वट वृक्ष के नीचे प्राप्त हुए जहां उसके पति का मृत शरीर पड़ा था। अंततः यमराज ने सत्यवान को जीवनदान दे दिया। इस तरह से सावित्री अपने व्रत, बुद्धि और नारी धर्म से अपने पति को मृत्यु से वापस ले आईं।
