अध्यात्म

Vaishakh Amavasya Vrat Katha: वैशाख अमावस्या की व्रत कथा, पितरों को तृप्त करने की पावन कहानी

Vaishakh Amavasya Vrat Katha: वैशाख अमावस्या का दिन पितरों को याद करने और उनका आशीर्वाद पाने के लिए बेहद खास माना जाता है। इस दिन लोग तर्पण, दान और पूजा-पाठ करते हैं। आइए जानते हैं वैशाख अमावस्या की व्रत कथा।

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वैशाख अमावस्या की व्रत कथा

Vaishakh Amavasya Vrat Katha: वैशाख अमावस्या हिंदू धर्म में बहुत खास मानी जाती है। पंचांग के हिसाब से हर महीने के कृष्ण पक्ष की आखिरी तिथि अमावस्या होती है, और इस बार वैशाख अमावस्या 17 अप्रैल 2026 को पड़ रही है। इस दिन लोग खास तौर पर अपने पितरों को याद करते हैं। सुबह-सुबह पवित्र नदी में स्नान करना, तर्पण करना, श्राद्ध करना और मंत्र जाप करना बहुत शुभ माना जाता है।

कहा जाता है कि पितरों की पूजा का पूरा फल तभी मिलता है, जब इस दिन पूजा के साथ-साथ व्रत कथा भी सुनी या पढ़ी जाए। बिना कथा के पूजा अधूरी मानी जाती है। इसलिए अगर आप सही तरीके से आशीर्वाद पाना चाहते हैं, तो व्रत कथा जरूर सुनें। आइए जानते हैं कि वैशाख अमावस्या की व्रत कथा क्या है।

वैशाख अमावस्या की व्रत कथा

प्राचीन समय की बात है। एक ब्राह्मण थे, जिनका नाम था धर्मवर्ण। अपने नाम के अनुरूप वे अत्यंत धार्मिक और आस्थावान व्यक्ति थे। उनका जीवन भगवान के भजन, ध्यान और सत्संग में बीतता था। एक दिन उन्होंने एक सिद्ध पुरुष से सुना कि कलयुग में भगवान विष्णु के स्मरण से ही मनुष्य को वही पुण्य मिलता है, जो पहले युगों में कठिन तपस्या से मिलता था। यह बात उनके हृदय को गहराई से छू गई।

धर्मवर्ण ने उसी क्षण संसार की मोह-माया त्यागने का निश्चय किया और संन्यास ग्रहण कर लिया। अब वे जगह-जगह भ्रमण करते हुए भगवान विष्णु का ध्यान करने लगे। एक दिन, जब वे गहरे ध्यान में लीन थे, तब उनका सूक्ष्म शरीर पितृ लोक पहुंच गया। वहां उन्होंने एक अजीब दृश्य देखा उनके पितर कष्ट में थे और दुख झेल रहे थे।

यह देखकर धर्मवर्ण व्याकुल हो उठे। उन्होंने अपने पितरों से उनके दुख का कारण पूछा। पितरों ने बताया कि उनके संन्यास लेने के कारण ही उनकी यह स्थिति हुई है, क्योंकि अब कोई उनका पिंडदान करने वाला नहीं रहा। उन्होंने धर्मवर्ण से विनती की कि वे वापस जाकर गृहस्थ जीवन अपनाएं और संतान उत्पन्न करें, ताकि उनके पितरों का उद्धार हो सके। साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि वैशाख अमावस्या के दिन विधिपूर्वक पिंडदान करने से उन्हें मुक्ति मिल सकती है।

पितरों की पीड़ा देखकर धर्मवर्ण का हृदय द्रवित हो गया। उन्होंने तुरंत गृहस्थ जीवन में लौटने का संकल्प लिया। पितृ लोक से लौटकर उन्होंने विवाह किया और फिर वैशाख अमावस्या के दिन विधि-विधान से अपने पितरों का पिंडदान किया। उनके इस कार्य से उनके पूर्वजों को शांति और मुक्ति प्राप्त हुई। तभी से वैशाख अमावस्या का महत्व और भी बढ़ गया।

वैशाख अमावस्या का महत्व

वैशाख अमावस्या के दिन पवित्र नदी में स्नान कर पितरों का तर्पण करने से उन्हें शांति मिलती है और वे प्रसन्न होकर अपने वंशजों को आशीर्वाद देते हैं। इसके साथ ही जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र, जल, तिल और दक्षिणा का दान करना अत्यंत शुभ माना गया है। इस दिन किया गया दान सामान्य दिनों की तुलना में कई गुना अधिक फलदायी होता है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन दान-पुण्य करने से न केवल पितृ दोष कम होता है, बल्कि घर-परिवार में सुख, शांति और समृद्धि भी बनी रहती है।

prabhat sharma
प्रभात शर्माauthor

प्रभात शर्मा टाइम्स नाउ हिंदी डिजिटल के फीचर डेस्क में कार्यरत ट्रैवल और लाइफस्टाइल राइटर हैं। यात्राओं के प्रति उनका गहरा जुनून और नई जगहों को समझने–परखने की क्षमता उनकी लेखन शैली को बेहद जीवंत और पाठकों से जोड़ने वाली बनाती है। वे ऑफबीट डेस्टिनेशन, लोकल कल्चर, हेरिटेज साइट्स, रोड ट्रिप्स, फूड जर्नी और बजट ट्रैवल जैसे विषयों पर मजबूत पकड़ रखते हैं। प्रभात की स्टोरीज़ सिर्फ जानकारी नहीं देतीं, बल्कि यात्रा के माहौल, भाव और अनुभव को भी महसूस कराती हैं। अब तक 7,000 से अधिक कंटेंट लिख चुके प्रभात अपनी सहज भाषा, प्रामाणिक जानकारी और अनुभव-आधारित दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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