Surdas ke Dohe in Hindi(सूरदास के दोहे हिंदी में): संत सूरदास, जिन्हें सूर भी कहा जाता है, 15वीं-16वीं शताब्दी के एक महान कवि और संत थे। वे भगवान कृष्ण के अनन्य भक्त थे और उन्होंने अपनी भक्ति को मधुर पदों और कविताओं के माध्यम से व्यक्त किया। उन्हें हिंदी साहित्य के सूर्य के रूप में जाना जाता है, जिसका अर्थ है कि उनका स्थान कवियों में सबसे ऊंचा है। सूरदास ने अपना पूरा जीवन कृष्ण की भक्ति में समर्पित कर दिया। उनकी रचनाओं में कृष्ण के बाल रूप, उनकी लीलाओं, राधा-कृष्ण के प्रेम और भक्ति के विभिन्न पहलुओं का सुंदर और मार्मिक चित्रण मिलता है। सूरसागर उनकी सबसे प्रसिद्ध और महत्वपूर्ण रचना है, जिसमें लगभग एक लाख पदों का संग्रह कहा जाता है, हालांकि वर्तमान में लगभग 8,000 पद ही उपलब्ध हैं। इसमें कृष्ण की लीलाओं का विस्तृत वर्णन है। ऐसे में जब आज सूरदास जी की जयंती मनाई जा रही है तो यहां उनके कुछ दोहे पढ़ते हैं और जानते हैं क्या है इन दोहों का मतलब।
Surdas ke Dohe in Hindi - सूरजास के दोहे हिंदी में
1. जो पै जिय लज्जा नहीं, कहा कहौं सौ बार।
एकहु अंक न हरि भजे, रे सठ ‘सूर’ गँवार॥
अर्थ- सूरदास जी कहते हैं कि हे गँवार दुष्ट, अगर तुझे अपने दिल में शर्म नहीं है, तो मैं तुझे सौ बार क्या कहूँ क्योंकि तूने तो एक बार भी भगवान् का भजन नहीं किया।
2. सुनि परमित पिय प्रेम की, चातक चितवति पारि।
घन आशा सब दुख सहै, अंत न याँचै वारि॥
अर्थ- प्रिय के प्रेम के या परिणाम की महत्ता को जानकर या सुनकर पपीहा बादल की ओर निरंतर देखता रहता है। उसी मेघ की आशा से सब दु:ख सहता है पर मरते दम तक भी पानी के लिए प्रार्थना नहीं करता। सच्चा प्रेम अपने प्रेमी से कभी कुछ नहीं माँगता या चाहता।
3. सदा सूँघती आपनो, जिय को जीवन प्रान।
सो तू बिसर्यो सहज ही, हरि ईश्वर भगवान्॥
अर्थ- जो ईश्वर सदा अपने साथ रहने वाला है, प्राणों का भी प्राण है, उस प्रभू को तूने अनायास ही बातों ही बातों में भुला दिया है।
4. कह जानो कहँवा मुवो, ऐसे कुमति कुमीच।
हरि सों हेत बिसारिके, सुख चाहत है नीच॥
अर्थ- यह मनुष्य जाने कैसा दुष्ट बुद्धि वाला है, और न जाने कहाँ कैसी बुरी मौत मरेगा जो यह भगवान् से प्रेम या भक्ति को छोड़कर भी सुख चाहता है।
5.दीपक पीर न जानई, पावक परत पतंग।
तनु तो तिहि ज्वाला जरयो, चित न भयो रस भंग॥
अर्थ- पतंगा दिये की लौ पर जलकर भस्म हो जाता है पर दीपक इसकी पीड़ा को नहीं जानता। पतंग का शरीर तो दीपक की ज्वाला में जलकर भस्म हो जाता है पर इसका प्रेम नष्ट नहीं होता।
6. मीन वियोग न सहि सकै, नीर न पूछै बात।
देखि जु तू ताकी गतिहि, रति न घटै तन जात॥
अर्थ- चाहे पानी मछली की बात भी नहीं पूछता फिर भी मछली तो पानी का वियोग नहीं सह सकती। तुम मछली के प्रेम की निराली गति को देखो कि इसका शरीर चला जाता है तो भी उसका पानी के प्रति प्रेम रत्ती-भर भी कम नहीं होता।
7. प्रभु पूरन पावन सखा, प्राणनहू को नाथ।
परम दयालु कृपालु प्रभु, जीवन जाके हाथ॥
अर्थ- वह प्रभु परिपूर्ण है, पवित्र मित्र है, प्राणों का स्वामी है। अत्यंत दयालु है और सभी प्राणियों का जीवन उसी के हाथ में है।
8. जिन जड़ ते चेतन कियो, रचि गुण तत्व विधान।
चरन चिकुर कर नख दिए, नयन नासिका कान॥
अर्थ- जिस ईश्वर ने सत्व, रज, तम—इन तीन गुणों तथा पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश—इन पाँच तत्वों के द्वारा जड़ से चेतन बना दिया और हाथ, पाँव, आँख, नाक, बाल और नाखून दिए (बड़े दु:ख की बात है मनुष्य उसके गुणों का स्मरण नहीं करता)।
9. असन बसन बहु बिधि दये, औसर-औसर आनि।
मात पिता भैया मिले, नई रुचहि पहिचानि॥
अर्थ- उसी ईश्वर ने अनेक प्रकार के भोजन वस्त्रादि समय-समय पर लाकर दिए। और साथ ही नई-नई पहचान वाले माता, पिता, भाई आदि प्रियजन भी लाकर मिलाए।
10. देखो करनी कमल की, कीनों जल सों हेत।
प्राण तज्यो प्रेम न तज्यो, सूख्यो सरहिं समेत॥
अर्थ- कमल के इस महान् कार्य को देखो कि उसने जल से प्रेम किया था तो प्राण दे दिए, पर प्रेम को नहीं छोड़ा। यहाँ तक कि पानी के साथ कमल भी सूख गया।
