Somnath Temple Timeline Attack History : गुजरात के काठियावाड़ क्षेत्र में अरब सागर के किनारे स्थित सोमनाथ मंदिर केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि सनातन आस्था, संघर्ष, पुनर्निर्माण और भारतीय सभ्यता की अद्भुत जीवटता का प्रतीक माना जाता है। यह मंदिर 12 ज्योतिर्लिंगों में पहला ज्योतिर्लिंग माना जाता है। पौराणिक ग्रंथों जैसे महाभारत, श्रीमद्भागवत और स्कंद पुराण में इसकी महिमा का विस्तार से वर्णन मिलता है।
साल 2026 में यह मंदिर फिर इतिहास रचने जा रहा है। 11 मई 2026 को मंदिर के पुनर्निर्माण के 75 वर्ष पूरे होने के अवसर पर पहली बार 90 मीटर ऊंचे शिखर पर भव्य कुंभाभिषेक (Kumbhabhishek) होगा। इस आयोजन को ‘सोमनाथ अमृत पर्व-2026’ नाम दिया गया है, लेकिन इस मंदिर की कहानी केवल भव्यता की नहीं, बल्कि बार-बार टूटकर फिर खड़े होने की कहानी भी है। यह मंदिर 1300 साल में कई बार तोड़ा गया और यह फिर से जीवंत हुआ है। आइए जानते हैं सोमनाथ मंदिर पर कब-कब आक्रमण हुए और कैसे तमाम कोशिशों के बावजूद भी यह मंदिर आज भी अस्तित्व में है।
कैसे पड़ा सोमनाथ नाम?
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार चंद्रदेव यानी 'सोम' ने भगवान शिव को अपना नाथ मानकर प्रभास क्षेत्र में कठोर तपस्या की थी। इसी कारण इस स्थान का नाम 'सोमनाथ' पड़ा। मान्यता के अनुसार, चंद्रदेव को दक्ष प्रजापति के श्राप से मुक्ति भी यहीं भगवान शिव की आराधना से मिली थी। इसी वजह से इस ज्योतिर्लिंग को अत्यंत पवित्र माना जाता है।

सोमनाथ मंदिर इतिहास
ईसा पूर्व से था इस मंदिर का अस्तित्व
इतिहासकारों और प्राचीन ग्रंथों के अनुसार सोमनाथ मंदिर का अस्तित्व ईसा पूर्व से माना जाता है। हालांकि उस समय के मंदिर की संरचना कैसी थी, इसकी स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं है। माना जाता है कि शुरुआती मंदिर लकड़ी और पत्थरों से बना हुआ था। समुद्र किनारे स्थित होने के कारण यह व्यापारिक और धार्मिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण केंद्र था।
649 ईस्वी में हुआ दूसरा पुनर्निर्माण
इतिहास के अनुसार 649 ईस्वी में वैल्लभी के मैत्रिक राजाओं ने मंदिर का पुनर्निर्माण कराया। यह सोमनाथ मंदिर के बड़े पुनर्निर्माणों में शुरुआती महत्वपूर्ण चरण माना जाता है।
725 ईस्वी में पहली बार टूटा सोमनाथ मंदिर
सोमनाथ मंदिर पर पहला बड़ा हमला 725 ईस्वी में हुआ। सिंध के मुस्लिम सूबेदार अल-जुनैद ने मंदिर पर आक्रमण कर इसे तुड़वा दिया। यह सोमनाथ मंदिर के विध्वंस का पहला बड़ा दर्ज इतिहास माना जाता है।
815 ईस्वी में प्रतिहार राजा नागभट्ट ने कराया पुनर्निर्माण
मंदिर टूटने के बाद प्रतिहार राजा नागभट्ट ने 815 ईस्वी में इसका पुनर्निर्माण कराया। इस समय मंदिर फिर से धार्मिक गतिविधियों का बड़ा केंद्र बन गया और यहां श्रद्धालुओं की भारी भीड़ आने लगी।
1024 से 1026 ईस्वी के लगभग महमूद गजनवी ने किया था हमला
सोमनाथ मंदिर के इतिहास की सबसे चर्चित घटना 1024 ईस्वी से 1026 के करीब मानी जाती है। गजनवी शासक महमूद गजनवी ने करीब 5,000 सैनिकों के साथ मंदिर पर हमला किया। कहा जाता है कि उसने मंदिर की अपार संपत्ति लूट ली और मंदिर को बुरी तरह नष्ट कर दिया। इतिहासकारों के अनुसार, उस समय हजारों श्रद्धालु मंदिर में मौजूद थे। मंदिर की रक्षा के लिए स्थानीय लोग भी निहत्थे ही लड़ने पहुंच गए थे। इस हमले में बड़ी संख्या में लोगों की मृत्यु हुई। सोमनाथ पर गजनवी का हमला भारतीय इतिहास की सबसे चर्चित लूट घटनाओं में गिना जाता है।
राजा भोज और भीमदेव ने फिर खड़ा किया मंदिर
महमूद गजनवी के हमले के बाद गुजरात के राजा भीमदेव और मालवा के राजा भोज ने मिलकर मंदिर का पुनर्निर्माण कराया। इसके बाद भी कई राजाओं ने मंदिर के विस्तार और सौंदर्यीकरण में योगदान दिया। इसमें 1093 ईस्वी में सिद्धराज जयसिंह, 1168 ईस्वी में विजयेश्वर कुमारपाल, सौराष्ट्र के राजा खंगार ने भी मंदिर को और भव्य बनाने में भूमिका निभाई।
1297 ईस्वी में अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति का हमला
1297 ईस्वी में दिल्ली सल्तनत के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति नुसरत खान ने गुजरात पर हमला किया। इस दौरान सोमनाथ मंदिर को फिर से तोड़ दिया गया और यहां की धन-संपत्ति लूट ली गई। हलांकि बाद में हिंदू राजाओं ने एक बार फिर मंदिर का पुनर्निर्माण कराया।
1395 और 1412 ईस्वी में गुजरात सल्तनत के हमले
1395 ईस्वी में गुजरात के सुल्तान मुजफ्फर शाह ने मंदिर पर हमला किया और मंदिर को नुकसान पहुंचाया। इसके बाद 1412 ईस्वी में उसके पुत्र अहमद शाह ने भी सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण किया। इन हमलों के दौरान मंदिर की संपत्ति लूटी गई और धार्मिक गतिविधियां बाधित हुईं।
औरंगजेब के काल में दो बार टूटा मंदिर
मुगल शासक औरंगजेब के शासनकाल में सोमनाथ मंदिर को दो बार नुकसान पहुंचाया गया। इसमें पहली बार 1665 ईस्वी में और दूसरी बार 1706 ईस्वी में मंदिर को नुकसान पहुंचाया गया। इतिहासकारों के अनुसार मंदिर तोड़े जाने के बाद भी हिंदू श्रद्धालु वहां पूजा करने पहुंचते थे। इसके बाद वहां सैन्य कार्रवाई भी करवाई गई।
1783 ईस्वी में अहिल्याबाई होल्कर ने बनवाया नया मंदिर
जब मराठा शक्ति मजबूत हुई, तब इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने 1783 ईस्वी में मूल मंदिर से कुछ दूरी पर नया सोमनाथ मंदिर बनवाया। इस मंदिर में नियमित पूजा-अर्चना शुरू हुई और सोमनाथ की धार्मिक परंपरा फिर जीवित हुई।
आजादी के बाद सरदार पटेल ने कराया पुनर्निर्माण
भारत की स्वतंत्रता के बाद लौहपुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेलl ने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का संकल्प लिया। कहा जाता है कि उन्होंने समुद्र का जल हाथ में लेकर मंदिर को फिर भव्य रूप में बनाने की प्रतिज्ञा की थी। उनके प्रयासों के बाद मंदिर पुनर्निर्माण का काम शुरू हुआ।
11 मई 1951 में प्राण प्रतिष्ठा और नए युग की शुरुआत
सोमनाथ मंदिर का वर्तमान स्वरूप कैलाश महामेरू प्रासाद शैली में बनाया गया। 11 मई 1951 को भारत के प्रथम राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा की। यही दिन आधुनिक सोमनाथ मंदिर के पुनर्जन्म का प्रतीक माना जाता है। कहा जाता है कि यह मंदिर छह बार टूटने के बाद सातवीं बार फिर खड़ा हुआ।

1995 में हुआ राष्ट्र को समर्पित
1995 में राष्ट्र को समर्पित
1 दिसंबर 1995 को तत्कालीन राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने सोमनाथ मंदिर को राष्ट्र को समर्पित किया। इसके बाद से यह मंदिर भारत के सबसे महत्वपूर्ण तीर्थ स्थलों में शामिल हो गया।
2026 में 75 वर्ष पूरे होने पर हो रहा है ऐतिहासिक कुंभाभिषेक
11 मई 2026 को आधुनिक सोमनाथ मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के 75 वर्ष पूरे हो रहे हैं। इसी अवसर पर 'सोमनाथ अमृत पर्व-2026' आयोजित किया जा रहा है। इस दौरान पहली बार मंदिर के 90 मीटर ऊंचे शिखर पर विशेष कुंभाभिषेक होगा। इसमें 11 तीर्थों के जल से अभिषेक, 51 ब्राह्मणों द्वारा अति रुद्र पाठ, 1.25 लाख आहुतियों वाला महा रुद्र यज्ञ, भारतीय वायुसेना की सूर्यकिरण टीम का एयर शो, 350 टन क्षमता वाली ऑल-टेरेन क्रेन का उपयोग किया जाएगा। इस आयोजन की सबसे खास बात यह है कि पूरा काम 'जीरो लोड सिद्धांत' के तहत किया जाएगा, ताकि मंदिर की मूल संरचना पर कोई भार न पड़े।
क्यों खास है सोमनाथ मंदिर?
सोमनाथ मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता की जिजीविषा का प्रतीक माना जाता है। यह मंदिर कई बार टूटा, लूटा गया, नष्ट किया गया, लेकिन हर बार फिर खड़ा हुआ। यही कारण है कि सोमनाथ को केवल ज्योतिर्लिंग नहीं, बल्कि 'सनातन आस्था के पुनर्जन्म' का प्रतीक भी कहा जाता है।
