navratri ke jaware ka kya karen: चैत्र और शारदीय नवरात्र में घर-घर माता रानी की स्थापना के साथ ज्वारे (जौ) बोने की परंपरा बेहद शुभ मानी जाती है। नौ दिनों तक पूजा, आरती और उपवास के बीच ये हरे-भरे ज्वारे देवी शक्ति की कृपा, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा के प्रतीक बन जाते हैं। लेकिन जैसे ही नवरात्र समाप्त होते हैं, लोगों के मन में सबसे बड़ा सवाल यही होता है कि अब इन ज्वारों का क्या किया जाए। धार्मिक दृष्टि से ज्वारों का विसर्जन भी उतना ही महत्वपूर्ण माना जाता है जितना उनकी स्थापना।
ज्वारे क्यों बोए जाते हैं
नवरात्र में बोए गए ज्वारे केवल पूजा की परंपरा नहीं हैं, बल्कि यह प्रकृति और जीवन के पुनर्जन्म का प्रतीक भी माने जाते हैं। मान्यता है कि जिस घर में ज्वारे अच्छी तरह उगते हैं, वहां माता रानी की विशेष कृपा बनी रहती है। हरे, लंबे और घने ज्वारे आने वाले समय में सुख-समृद्धि और उन्नति का संकेत माने जाते हैं।
ज्वारे किस मां का रूप माने जाते हैं
नवरात्र में बोए जाने वाले ज्वारे केवल पूजा की सजावट नहीं होते, बल्कि इन्हें देवी स्वरूप माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार नवरात्र के ज्वारे मां अन्नपूर्णा का प्रतीक माने जाते हैं। मां अन्नपूर्णा को अन्न, समृद्धि और जीवन पालन की देवी कहा जाता है, इसलिए ज्वारों का संबंध सीधे घर की सुख-समृद्धि और भंडार से जोड़ा जाता है।
नौ दिनों तक पूजा के बीच अंकुरित होकर हरे होने वाले ज्वारे इस बात का संकेत माने जाते हैं कि माता की कृपा से घर में अन्न और धन की कभी कमी नहीं होगी। यही कारण है कि नवरात्र समाप्त होने के बाद सभी ज्वारों का विसर्जन नहीं किया जाता, बल्कि उनमें से कुछ ज्वारे श्रद्धा के साथ संभालकर रखे जाते हैं।
भंडार और तिजोरी में क्यों रखे जाते हैं ज्वारे
परंपरा के अनुसार नवरात्र के ज्वारों में से थोड़े से ज्वारे घर के अनाज भंडार में रखे जाते हैं। मान्यता है कि इससे घर में अन्नपूर्णा माता का स्थायी वास बना रहता है और कभी अन्न संकट नहीं आता। वहीं एक या दो ज्वारे घर की तिजोरी में मां के आशीर्वाद स्वरूप रखे जाते हैं, जिससे धन वृद्धि और आर्थिक स्थिरता बनी रहती है।
गाय को क्यों खिलाए जाते हैं नवरात्र के ज्वारे
शेष ज्वारों को सम्मानपूर्वक आटे में मिलाकर गाय को खिलाने की परंपरा भी कई स्थानों पर निभाई जाती है। शास्त्रों में गाय को अत्यंत पवित्र माना गया है और उसमें 33 कोटि देवी-देवताओं का वास बताया गया है। इसलिए जब ज्वारे गाय को अर्पित किए जाते हैं, तो यह माना जाता है कि सभी देवताओं को एक साथ भोग लग जाता है। यह परंपरा दान, सेवा और कृतज्ञता की भावना को भी दर्शाती है।
घर में ज्वारे घुमाने की परंपरा
कुछ क्षेत्रों में नवरात्र समाप्ति के दिन ज्वारों के पात्र या कलश को सिर पर रखकर पूरे घर में घुमाया जाता है। इसे अत्यंत शुभ माना जाता है। मान्यता है कि ऐसा करने से माता की सकारात्मक ऊर्जा पूरे घर में फैलती है और नकारात्मकता दूर होती है। यह प्रक्रिया देवी के आशीर्वाद को घर के हर कोने तक पहुंचाने का प्रतीक मानी जाती है।
ज्वारे के कलश और मिट्टी का क्या करें
नवरात्र स्थापना में उपयोग की गई मिट्टी और कलश भी पवित्र माने जाते हैं। मिट्टी को किसी पौधे या बगीचे में डाल देना शुभ होता है। वहीं कलश के जल को पूरे घर में छिड़कने से वातावरण शुद्ध माना जाता है। यह प्रक्रिया घर में नकारात्मक ऊर्जा को दूर करने का प्रतीक मानी जाती है।
ज्वारे विसर्जन करते समय रखें ये सावधानियां
ज्वारों को सम्मानपूर्वक दोनों हाथों से उठाएं और मन में माता रानी का स्मरण करते रहें। विसर्जन के समय धन्यवाद भाव रखना महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि यह देवी शक्ति के विदा होने का प्रतीक होता है। जल्दबाजी या लापरवाही से ज्वारों को हटाना धार्मिक दृष्टि से उचित नहीं माना जाता।
