अध्यात्म

भगवान जगन्नाथ क्यों बन गए थे भिखारी, किस कारण उनसे रूठ गई थीं माता लक्ष्मी

Mata Lakshmi Curse To Lord Jagannath : भगवान जगन्नाथ और उनके भाई बलभद्र ने एक बार ऐसी गलती कर दी थी, कि उनसे माता लक्ष्मी रूठ गई थीं। इसके साथ ही माता ने उनको श्राप तक दे दिया था।

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भगवान जगन्नाथ से क्यों रूठी थीं माता लक्ष्मी

Mata Lakshmi Curse To Lord Jagannath : भगवान जगन्नाथ और माता लक्ष्मी से जुड़ी अनेक कथाएं ओडिशा की धार्मिक परंपराओं में प्रचलित हैं। इनमें सबसे प्रसिद्ध कथा 'लक्ष्मी पुराण' की मानी जाती है। यह केवल भगवान जगन्नाथ और माता लक्ष्मी के बीच हुए एक प्रसंग की कहानी नहीं है, बल्कि समानता, करुणा, स्त्री सम्मान और जातिगत भेदभाव के विरोध की भी कहानी है। इस कथा के अनुसार, एक बार ऐसा समय भी आया, जब स्वयं जगत के पालनहार भगवान जगन्नाथ और उनके बड़े भाई बलभद्र को भोजन के लिए दर-दर भटकना पड़ा और अंततः उन्हें माता लक्ष्मी से क्षमा मांगनी पड़ी। आइए जानते हैं कि आखिर माता लक्ष्मी भगवान जगन्नाथ से क्यों रूठ गई थीं और उन्हें ऐसा श्राप क्यों देना पड़ा।

क्यों रूठ गई थीं माता लक्ष्मी

ओडिशा में मार्गशीर्ष महीने के प्रत्येक गुरुवार को 'मानबसा गुरुवार' के रूप में मनाया जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इन दिनों माता महालक्ष्मी स्वयं वैकुंठ से उतरकर पृथ्वी पर अपने भक्तों के घर जाती हैं।

एक बार माता लक्ष्मी ने वृद्धा का रूप धारण किया और नगर में भ्रमण करने निकलीं। सबसे पहले वे एक संपन्न व्यापारी के घर पहुंचीं। वहां उन्होंने देखा कि घर में गंदगी फैली हुई है, लोग आलस्य में सो रहे हैं और देवी पूजा का कोई ध्यान नहीं है। इस पर उन्होंने घर की बुजुर्ग महिला को स्वच्छता और पूजा का महत्व समझाया, लेकिन उसने उनकी बात को गंभीरता से नहीं लिया। माना जाता है कि इससे माता लक्ष्मी अप्रसन्न हो गईं और उस घर से अपनी कृपा वापस ले ली। धीरे-धीरे वह समृद्ध परिवार निर्धन हो गया और उसे जीवनयापन के लिए भी संघर्ष करना पड़ा।

श्रीया चांडालिनी के घर पहुंची माता

इसके बाद माता लक्ष्मी एक ऐसे गांव पहुंचीं जहां समाज के उस समय अछूत माने जाने वाले चांडाल समुदाय के लोग रहते थे। वहां उनकी भेंट श्रीया चांडालिनी नाम की एक महिला से हुई। श्रीया ने पूरे नियम-विधान से व्रत रखा था। उसने प्रातःकाल उठकर घर की सफाई की, पूजा स्थल सजाया और अत्यंत श्रद्धा से माता लक्ष्मी की आराधना की। उसकी भक्ति, पवित्रता और समर्पण देखकर माता लक्ष्मी अत्यंत प्रसन्न हुईं। उन्होंने उसे धन, वैभव और सुख-समृद्धि का आशीर्वाद दिया।

क्रोधित हो गए बलभद्र

उसी दिन भगवान जगन्नाथ और उनके बड़े भाई बलभद्र बाहर से लौट रहे थे। उन्होंने माता लक्ष्मी को श्रीया चांडालिनी के घर से वापस आते देखा। यह देखकर बलभद्र क्रोधित हो उठे। उन्होंने भगवान जगन्नाथ से कहा कि देवी को चांडाल के घर नहीं जाना चाहिए था। यदि वे ऐसे घर से लौटकर सीधे मंदिर आएंगी तो मंदिर की पवित्रता भंग होगी। बलभद्र ने स्पष्ट कह दिया कि यदि लक्ष्मी मंदिर में प्रवेश करेंगी तो वे स्वयं मंदिर छोड़ देंगे। भगवान जगन्नाथ ने अपने बड़े भाई को बहुत समझाया कि माता लक्ष्मी तो अपने भक्तों को आशीर्वाद देने गई थीं और यह परंपरा पहले से चली आ रही है, लेकिन बलभद्र अपने निर्णय पर अडिग रहे।

माता लक्ष्मी हुईं नाराज

अपने बड़े भाई का सम्मान करते हुए भगवान जगन्नाथ ने माता लक्ष्मी से मंदिर छोड़ने का आग्रह किया। यह सुनकर माता लक्ष्मी अत्यंत आहत हुईं। उन्होंने भगवान जगन्नाथ को स्मरण कराया कि विवाह के समय उन्होंने वचन दिया था कि वे पत्नी की भूलों को क्षमा करेंगे औ फिर उन्होंने कोई अपराध भी नहीं किया था। वे तो केवल अपने भक्तों को आशीर्वाद देने गई थीं। केवल जाति के आधार पर किसी भक्त का अपमान करना उन्हें स्वीकार नहीं था। इस अन्यायपूर्ण व्यवहार से दुखी होकर माता लक्ष्मी ने भगवान जगन्नाथ को श्राप दिया कि जब तक वे समानता का महत्व नहीं समझेंगे, तब तक उन्हें तृप्ति से भोजन नहीं मिलेगा और वे केवल उनके हाथों से बने भोजन से ही संतुष्ट हो सकेंगे। इतना कहकर माता लक्ष्मी मंदिर छोड़कर चली गईं।

खाली हो गया भगवान जगन्नाथ का भंडार

जैसे ही माता लक्ष्मी मंदिर से बाहर गईं, मंदिर की सारी समृद्धि भी उनके साथ चली गई। भंडारगृह खाली हो गया, रसोई सूनी पड़ गई और भोजन बनाने वाले सेवक भी वहां नहीं रहे। अगली सुबह भगवान जगन्नाथ और बलभद्र भोजन की प्रतीक्षा करते रहे, लेकिन कोई भोजन नहीं आया। जब दोनों स्वयं रसोई में पहुंचे तो देखा कि चूल्हे टूटे हुए हैं और अन्न का एक दाना भी शेष नहीं है, तब उन्हें पहली बार यह एहसास हुआ कि समृद्धि का वास्तविक आधार माता लक्ष्मी ही हैं।

भिखारी बन गए भगवान जगन्नाथ

भूख से व्याकुल होकर भगवान जगन्नाथ और बलभद्र ने ब्राह्मणों का वेश धारण किया और नगर में भिक्षा मांगने निकल पड़े। किंतु आश्चर्य की बात यह थी कि किसी ने भी उन्हें भोजन नहीं दिया। ऐसे में जहां वे जल पीने जाते, वहां का जल सूख जाता। जहां भोजन मिलने की आशा होती, वहां कोई न कोई बाधा उत्पन्न हो जाती। यहां तक कि एक महिला जब उन्हें मुरमुरे देने लगी तो तेज हवा चलने से वे भी उड़ गए। करीब 12 सालों तक भगवान को ऐसे ही भटकना पड़ा। इसके बाद दोनों भाइयों को अपनी भूल का अहसास हुआ और उन्होंने माता लक्ष्मी से क्षमा मांगी। इस पर माता लक्ष्मी ने कहा कि यदि भविष्य में किसी भी भक्त के साथ जाति, जन्म या सामाजिक स्थिति के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाएगा, तभी वे मंदिर लौटेंगी। भगवान जगन्नाथ ने यह वचन स्वीकार कर लिया। इसके बाद माता लक्ष्मी पुनः श्रीमंदिर लौटीं और मंदिर की समृद्धि भी वापस आ गई।

आज भी चालू है यह परंपरा

पुरी मंदिर के परिसर में स्थित 'आनंद बाज़ार' में मिलने वाले महाप्रसाद (कूडुआ या मिट्टी के बर्तनों में पका हुआ भोजन) को लेकर आज भी यह नियम है कि यहां कोई छुआछूत नहीं होती है। पुरी में एक ब्राह्मण और एक दलित समाज का व्यक्ति आनंद बाज़ार में एक ही मिट्टी के पात्र से एक साथ महाप्रसाद ग्रहण कर सकते हैं। महाप्रसाद के सामने हर कोई समान है।

Mohit Tiwari
मोहित तिवारी author

मोहित तिवारी को पत्रकारिता के क्षेत्र में 10 साल का अनुभव है। इन्होंने अपने करियर की शुरुआत प्रतिष्ठित न्यूजपेपर में फील्ड रिपोर्टिंग से की थी। मोहित ... और देखें

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