मकर संक्रांति पर क्यों खाई जाती है खिचड़ी, जानिए क्या है इसके पीछे का धार्मिक और वैज्ञानिक कारण?
- Authored by: Mohit Tiwari
- Updated Jan 15, 2026, 01:12 PM IST
Makar Sankranti par khichdi kyon banai jati hai: ग्रहों के राजा सूर्य जब शनि की राशि मकर में गोचर करते हैं तो मकर संक्रांति का पर्व मनाया जाता है। इस दिन चावल और उड़द की दाल की खिचड़ी बनाई और खाना आवश्यक माना जाता है। इसी कारण इस पर्व पर खिचड़ी के नाम से जाना जाता है। इस दिन तिल-गुड़ का दान भी किया जाता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस दिन खिचड़ी खाना क्यों आवश्यक होता है, अगर नहीं तो आइए जानते हैं?
मकर संक्रांति पर खिचड़ी बनाने का कारण
Makar Sankranti par khichdi kyon banai jati hai: मकर संक्रांति का पर्व 14 जनवरी 2026 को उत्तर भारत में खिचड़ी पर्व के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन चावल और उड़द दाल से बनी खिचड़ी बनाना, खाना और दान करना बहुत शुभ माना जाता है। यह परंपरा न केवल स्वादिष्ट भोजन का प्रतीक है, बल्कि गहरी धार्मिक आस्था, ग्रह शांति और मौसमी स्वास्थ्य से जुड़ी हुई है। आइए जानते हैं इसके पीछे के मुख्य कारण क्या है।
शनिदेव को पसंद है खिचड़ी
मकर संक्रांति के दिन ग्रहों के राजा सूर्य अपने पुत्र न्यायाधीश शनि की राशि मकर में गोचर करते हैं। वैसे सूर्य और शनि के बीच शत्रुता रहती है, लेकिन इस दिन सूर्य देव अपने पुत्र शनि को माफ करते हुए उनके घर मकर में पहुंचते हैं। यहां वे एक महीने रहते हैं, इसके बाद वे शनि के दूसरे घर कुंभ में चले जाते हैं। इस दिन सूर्य उत्तर दिशा में गमन करने लगते हैं।
शनिदेव का सबसे पसंद भोग उड़द की दाल की खिचड़ी होता है। इसी कारण इस दिन उड़द की दाल की खिचड़ी बनाकर भोग लगाया जाता है। इससे शनि प्रसन्न होते हैं और खिचड़ी खाने व दान करने से शनि दोष शांत होता है। ग्रहों की अशुभता कम होती है और जीवन में स्थिरता, मेहनत का फल तथा सुख-समृद्धि मिलती है।
अन्य ग्रहों को भी संतुलित करती है खिचड़ी
इस दिन खिचड़ी खाने और दान से अन्य ग्रह भी संतुलित हो जाते हैं। इसमें पड़ने वाला चावल चंद्रमा का प्रतीक है। वहीं, हल्दी गुरु ग्रह का प्रतीक है। हरी सब्जियां बुध ग्रह और घी और अग्नि मंगल व सूर्य के प्रतीक हैं। इस कारण मकर संक्रांति के दिन खिचड़ी को खाने व दान करने से ये सभी ग्रह संतुलित हो जाते हैं।
बाबा गोरखनाथ से भी जुड़ी है पौराणिक कथा
एक लोकप्रिय कथा बाबा गोरखनाथ से जुड़ी है। माना जाता है कि आक्रमण काल अलाउद्दीन खिलजी और अन्य के समय में योगी और शिष्य भोजन नहीं बना पाते थे, क्योंकि संसाधन कम थे और समय नहीं मिलता था। बाबा गोरखनाथ ने अपने शिष्यों को सलाह दी कि चावल, दाल और उपलब्ध मौसमी सब्जियों को एक साथ पका लें।
यह भोजन जल्दी तैयार होता था, पौष्टिक था और ऊर्जा देता था। इसे खिचड़ी नाम दिया गया। उसी दिन से मकर संक्रांति पर खिचड़ी बनाने की परंपरा शुरू हुई। आज भी गोरखपुर के बाबा गोरखनाथ मंदिर में इस दिन खिचड़ी का भोग लगाया जाता है और विशाल मेला लगता है, जहां लाखों लोग खिचड़ी प्रसाद ग्रहण करते हैं।
क्या है इसका वैज्ञानिक कारण?
मकर संक्रांति जनवरी के मध्य में आती है, जब ठंड चरम पर होती है। इस समय पाचन शक्ति कमजोर हो जाती है और शरीर को हल्का, गर्म और पौष्टिक भोजन की जरूरत पड़ती है। चावल और दाल का मिश्रण पेट पर भारी नहीं पड़ता है और आसानी से पच जाता है। यह गैस-ब्लोटिंग जैसी समस्याओं से बचाता है। उड़द दाल गर्म तासीर वाली होती है, जो शरीर को अंदर से गर्म रखती है।
घी मिलाने से यह और पौष्टिक हो जाती है। चावल से कार्बोहाइड्रेट, दाल से प्रोटीन, सब्जियां से विटामिन-फाइबर और हल्दी से एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण मिलते हैं। यह इम्यूनिटी बढ़ाता है और मौसम बदलाव में बीमारियों से बचाता है। यह नई फसल का उत्सव है, इसलिए नए चावल और दाल से बनी खिचड़ी नए साल की शुरुआत का प्रतीक है।