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गोवत्स द्वादशी कब है 2025 में, गोवत्स द्वादशी की डेट क्या है अक्टूबर 2025, जानें गोवत्स द्वादशी क्यों मनाई जाती है

गोवत्स द्वादशी कब है 2025 में (Govatsa Dwadashi Date 2025 October):धनतेरस से एक दिन पहले गोवत्स द्वादशी का पर्व मनाया जाता है। इस दिन गौ माता और उनके बछड़ों की पूजन किया जाता है। इसे वसु बारस, नंदिनी व्रत या बछ बारस के नाम से भी जाना जाता है। माना जाता है कि इस दिन महिलाएं अपने बच्चों की दीर्घायु और परिवार की सुख-समृद्धि के लिए व्रत रखती हैं। आइए जानते हैं कि साल 2025 में गोवत्स द्वादशी कब पड़ेगी।

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गोवत्स द्वादशी कब है (Pic Credit- Canva)

गोवत्स द्वादशी कब है 2025 में (Govatsa Dwadashi Date 2025 October): दीपावली के उत्सवों की शुरुआत करने वाला पवित्र पर्व गोवत्स द्वादशी गौमाता और उनके बछड़ों को समर्पित है। हिंदू धर्म में गाय को माता और कामधेनु का दर्जा दिया गया है, जो सभी इच्छाओं को पूर्ण करने वाली मानी जाती है। यह पर्व संतान सुख, समृद्धि और परिवार की सुख-शांति का प्रतीक है। इस वर्ष गोवत्स द्वादशी 17 अक्टूबर 2025 को शुक्रवार के दिन मनाई जाएगी।

गोवत्स द्वादशी की तिथि और शुभ मुहूर्त 2025

गोवत्स द्वादशी कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि को मनाया जाता है, जो धनतेरस से एक दिन पहले आता है। हिंदू पंचांग के अनुसार, 2025 में यह पर्व 17 अक्टूबर को शुक्रवार के दिन मनाया जाएगा। द्वादशी तिथि 17 अक्टूबर को सुबह 11:12 बजे शुरू होगी और 18 अक्टूबर को दोपहर 12:18 बजे समाप्त होगी। इस दिन पूजन के लिए सबसे शुभ समय प्रदोष काल है, जो शाम 5:14 बजे से 7:43 बजे तक रहेगा, यानी लगभग 2 घंटे 29 मिनट का समय। इस दिन खासतौर पर विवाहित महिलाएं व्रत रखती हैं और गौमाता की पूजा कर संतान की लंबी आयु, स्वास्थ्य और परिवार की समृद्धि की कामना करती हैं।

क्या है गो द्वादशी का महत्व?

गोवत्स द्वादशी, जिसे वसु बारस, नंदिनी व्रत या बछ बारस के नाम से भी जाना जाता है, हिंदू धर्म में गौमाता के प्रति कृतज्ञता और श्रद्धा व्यक्त करने का विशेष अवसर है। शास्त्रों में गाय को कामधेनु का रूप माना गया है, जिसमें सभी देवताओं का वास होता है। इस पर्व का महत्व महाराष्ट्र में वसु बारस, गुजरात में वाघ बारस और उत्तर भारत में गोवत्स द्वादशी के रूप में मनाया जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन गौमाता की पूजा से जीवन में धन, स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।

यह पर्व विशेष रूप से संतान सुख से जुड़ा है। मान्यता है कि इस दिन व्रत और पूजन करने वाली महिलाओं को पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है और उनके बच्चों की रक्षा होती है। भविष्य पुराण में एक कथा के अनुसार एक राजा ने गौमाता की पूजा कर मृत बछड़े को जीवित किया था, जिसके बाद इस व्रत का प्रचलन बढ़ गया। यह पर्व दीपावली उत्सव की शुरुआत का प्रतीक है।

कैसे करें गो द्वादशी पर पूजन?

गोवत्स द्वादशी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। यदि संभव हो तो दूध देने वाली गाय और उसके बछड़े को स्नान करवाएं और उन्हें नए वस्त्र ओढ़ाएं। गाय को हल्दी और चंदन का तिलक लगाएं, गेंदे के फूलों की माला पहनाएं और धूप-दीप जलाएं। यदि असली गाय उपलब्ध न हो, तो पूजा स्थली पर गाय-बछड़े की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। गौमाता को फल, गुड़, दूध और हरा चारा अर्पित करें।

पूजन के दौरान गौमाता को अर्घ्य देते हुए यह मंत्र पढ़ें: 'क्षीरोदार्णवसम्भूते सुरासुरनमस्कृते। सर्वदेवमये मातर्गृहाणार्घ्य नमो नम:॥' इसके बाद गाय के चरण धोकर उसकी मिट्टी से तिलक लगाएं और आरती उतारें। व्रत रखने वाले इस दिन उपवास करें और दूध या गेहूं से बनी वस्तुओं का त्याग करें। शाम को गोधूलि बेला में गौमाता की आरती करें और पौराणिक कथा सुनें। अंत में ब्राह्मणों या गौशाला को वस्त्र, अनाज या धन दान दें। गाय को गुड़ और चना खिलाना विशेष रूप से शुभ माना जाता है। जैन और वैष्णव समुदाय में यह पूजन संतान सुख और स्वास्थ्य लाभ के लिए विशेष रूप से किया जाता है।

डिस्क्लेमर: यहां दी गई जानकारी ज्योतिष शास्त्रों पर आधारित है तथा केवल सूचना के लिए दी जा रही है। Times Now Navbharat इसकी पुष्टि नहीं करता है।

Mohit Tiwari
मोहित तिवारीauthor

मोहित तिवारी को पत्रकारिता के क्षेत्र में 10 साल का अनुभव है। इन्होंने अपने करियर की शुरुआत प्रतिष्ठित न्यूजपेपर में फील्ड रिपोर्टिंग से की थी। मोहित ने प्रिंट, टीवी और डिजिटल तीनों प्लेटफॉर्म पर काम किया है। देश-विदेश, लाइफस्टाइल, धर्म और आध्यात्मिक विषयों में गहरी रुचि रखने वाले मोहित ने ज्योतिष का भी व्यापक अध्ययन किया है। मोहित के आलेख लाइफस्टाइल, हेल्थ, न्यूज, धर्म, ज्योतिष आदि विषयों पर गहरी शोध और प्रामाणिकता पर आधारित होते हैं और इन विषयों पर वह 12,000 से अधिक आर्टिकल लिख चुके हैं।

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