अध्यात्म

दशा माता व्रत कब है 2026 में? यहां से नोट करें तिथि, पूजा विधि और व्रत के नियम

  • Authored by: Srishti
  • Updated Mar 11, 2026, 01:29 PM IST

चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि पर दशा माता का व्रत रखा जाता है। ऐसी मान्यता है कि दशा माता का व्रत करने से घर-परिवार में सुख-समृद्धि आती है। तो साल 2026 में ये कब और किस दिन है, इसके बारे में आप यहां से जान सकते हैं।

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दशा माता व्रत कब है 2026 में (pc: pinterest)

हर साल चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि पर किए जाने वाला व्रत दशा माता व्रत कहलाता है। इस दिन दशा माता की पूजा होती है। इस दिन महिलाएं कच्चे सूत को 10 तार का डोरा बनाकर उसमें 10 गांठ लगाती हैं और पीपल के पेड़ की पूजा करते हुए इस डोरा को गले में बांधती हैं। कहते हैं कि ये व्रत महिलाएं घर की खराब दशा सुधारने के लिए करती हैं। कहते हैं कि दशा माता व्रत करने से घर की दरिद्रता खत्म होती है और अनिष्ट कारक ग्रहों की दशा शांत होती है। साल 2026 में दशा माता व्रत कब है, ये आप यहां से जान सकते हैं।

दशा माता व्रत 2026 कब है?

दशमी तिथि का प्रारम्भ 13 मार्च 2026 की सुबह 6 बजकर 28 मिनट से होगा और अगले दिन यानी 14 मार्च 2026 की सुबह 8 बजकर 10 मिनट पर ये तिथि समाप्त होगी। ऐसे में दशा माता का व्रत 13 मार्च, दिन शुक्रवार को ही किया जाएगा।

दशा माता पूजा विधि-

इस दिन सौभाग्यवती महिलाएं कच्चे सूत का 10 तार का डोरा बनाकर उसमें 10 गांठ लगाती हैं । फिर उसे हल्दी से रंगती हैं। इसके बाद पीपल वृक्ष की प्रदक्षिणा करते उसकी पूजा करती हैं। पूजा के बाद वृक्ष के नीचे बैठकर ही नल-दमयंती की कथा सुन जाती है। इसके बाद महिलाएं अपने परिवार के सुख-समृद्धि की कामना करते हुए डोरा गले में बांध लेती हैं। पूजा संपन्न करने के बाद महिलाएं घर आकर द्वार के दोनों तरफ हल्दी कुमकुम के छापे लगाती हैं। इस दिन के व्रत में नमक का सेवन नहीं किया जाता है।

दशा माता व्रत नियम-

दशा माता व्रत हमेशा किया जाता है। इसका उद्यापन नहीं किया जाता है। यानी एक बार दशा माता व्रत शुरू करने के बाद आपको इसे हमेशा करना होता है। दशा माता का व्रत रखने वाले व्रत वाले दिन सिर्फ एक ही समय भोजन कर सकते हैं। वो भी कथा सुनने के बाद ही भोजन किया जा सकता है। भोजन में नमक की मनाही है, लेकिन गेहूं का इस्तेमाल किया जा सकता है।

दशा माता व्रत कथा

संक्षेप में दशा माता की कथा जानना एवं व्रत, पूजन करना परम कल्याणकारी है। दशा माता की सबसे प्रचलित कथा राजा नल और रानी दमयंती की है। एक बार राजा नल और रानी दमयंती के राज्य में सुख-शांति थी। एक दिन एक ब्राह्मणी रानी के पास दशा का डोरा, कच्चा सूत लेकर आई। रानी ने विधि-विधान से पूजा कर वह डोरा अपने गले में बांध लिया। जब राजा ने वह डोरा देखा, तो उन्होंने इसे अंधविश्वास मानकर रानी के गले से निकालकर फेंक दिया। अपमानित होकर दशा माता, जो बुढ़िया के रूप में थीं वहां से चली गईं। इसके बाद राजा की ग्रहदशा बिगड़ गई। उनका राज-पाट छिन गया, उन्हें दर-दर भटकना पड़ा और यहाँ तक कि उन्हें दूसरों के यहाँ खाना बनाना पड़ा। अंत में राजा को अपनी गलती का एहसास हुआ। उन्होंने और रानी ने मिलकर पुनः चैत्र मास में दशा माता का कठिन व्रत किया। माता प्रसन्न हुईं, राजा की दशा सुधरी और उन्हें अपना खोया हुआ राज्य और सम्मान वापस मिला। दशा माता की अनेक कथाएं ग्रामीण अंचलों में प्रचलित हैं।

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Srishti
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सृष्टि टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल की फीचर डेस्क से जुड़ी कंटेंट राइटर हैं, जो मुख्य रूप से धर्म और लाइफस्टाइल सेक्शन के लिए लिखती हैं। सृष्टि को आध्यात्... और देखें

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