Dalidar kab khela jayega 2026 mein (Dalidar 2026 Date): दिवाली का त्योहार रोशनी, खुशियों और मां लक्ष्मी के स्वागत का पर्व है। इस दिन लोग अपने घरों को दीपों से सजाते हैं। साफ-सफाई करते हैं और सुख-समृद्धि की कामना के साथ पूजा-पाठ करते हैं। लेकिन दिवाली का उत्सव सिर्फ लक्ष्मी पूजन तक सीमित नहीं है। कई इलाकों में दिवाली के अगले दिन सुबह एक खास लोकपरंपरा निभाई जाती है, जिसे दलिदर खेलना या दरिद्र भगाना कहते हैं।
इस रस्म में लोग सुबह-सुबह सूपड़े को डंडे से पीटते हैं और आवाज लगाते हुए दरिद्रता को घर से बाहर निकालते हैं। मान्यता है कि ऐसा करने से घर की नकारात्मकता और अभाव दूर होते हैं। आइए जानते हैं कि 2026 में दलिदर कब खेला जाएगा और इसे करने का पारंपरिक तरीका क्या है।
दलिदर 2026 में कब खेला जाएगा (Dalidar 2026 Date)
साल 2026 में दिवाली 8 नवंबर, रविवार को मनाई जाएगी। इसलिए दिवाली के अगले दिन यानी 9 नवंबर 2026, सोमवार की सुबह दलिदर खेलने की परंपरा निभाई जाएगी। इस दिन सुबह उठकर लोग सूपड़े को डंडे से पीटते हैं। इसे घर के अंदर से बाहर की ओर ले जाते हैं। लोकमान्यता है कि ऐसा करने से घर में मौजूद दरिद्रता विदा होती है और मां लक्ष्मी के आगमन का रास्ता साफ होता है।
ध्यान रखें कि दलिदर के लिए कोई सर्वमान्य शास्त्रीय मुहूर्त तय नहीं है। अलग-अलग परिवारों और क्षेत्रों में इसका समय अलग हो सकता है।
दरिद्र को घर से बाहर कब निकालते हैं
लोकपरंपरा के अनुसार, दलिदर दिवाली की अगली सुबह निकाला जाता है। कई परिवार सूर्योदय से पहले यह रस्म निभाते हैं। कुछ जगहों पर सुबह उजाला होने के बाद भी सूप पीटने की परंपरा है। इस रस्म का उद्देश्य प्रतीकात्मक रूप से घर से गरीबी, अभाव और परेशानियों को विदा करना है। लोग चाहते हैं कि नए साल की शुरुआत अच्छी हो और परिवार में सुख-शांति बनी रहे।
दलिदर भगाने का तरीका क्या है, जानें सूप पीटने की विधि
दलिदर निकालने की रस्म बहुत आसान है। इसे निभाने के लिए कुछ पारंपरिक चीजों की जरूरत होती है। हालांकि, हर क्षेत्र में इसका तरीका थोड़ा अलग हो सकता है।
- सबसे पहले घर में इस्तेमाल होने वाला सूप या पुराना सूपड़ा लें।
- इसके बाद एक छोटी लकड़ी या डंडा लें।
- सुबह घर के लोग सूपड़े को डंडे से पीटते हैं।
- इसे बजाते हुए घर के अलग-अलग कमरों और कोनों से मुख्य दरवाजे की ओर ले जाते हैं।
- इस दौरान लोकभाषा में दरिद्रता को घर से बाहर जाने के लिए कहा जाता है।
- आखिर में सूपड़े को घर से बाहर ले जाकर रख दिया जाता है। कुछ इलाकों में इसे घर से दूर छोड़ने की परंपरा भी है।
इस पूरी रस्म में सबसे अहम बात यह है कि दरिद्रता को घर से बाहर निकालने और सुख-समृद्धि को आमंत्रित करने की भावना रखी जाती है।
दलिदर खेलते समय क्या बोलते हैं
दलिदर निकालते समय अलग-अलग इलाकों में अलग-अलग लोकगीत और बोल बोले जाते हैं। कहीं लोग सूप पीटते हुए कहते हैं, 'दलिदर भाग, लक्ष्मी घर आ।' तो कहीं 'दरिदर निकल, सुख-समृद्धि आ' जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया जाता है। इन बोलों का भाव एक ही है। लोग अपने घर से गरीबी और परेशानियों को दूर करने की कामना करते हैं। यह पीढ़ियों से चली आ रही लोकभाषा और परंपरा का हिस्सा है।
दिवाली के बाद क्यों निकाला जाता है दरिद्र
इसके पीछे एक सुंदर लोकमान्यता है। दिवाली की रात मां लक्ष्मी का स्वागत किया जाता है। घर को दीपों से सजाया जाता है और धन-धान्य की कामना की जाती है। ऐसे में अगली सुबह दलिदर निकालने की रस्म को घर से अभाव और नकारात्मकता को विदा करने का प्रतीक माना जाता है।
सूप का भी इस परंपरा में खास महत्व है। पुराने समय में सूप का इस्तेमाल अनाज से भूसी और कचरा अलग करने के लिए किया जाता था। इसी काम से जोड़कर इसे बुरी चीजों को अलग करने का प्रतीक माना जाने लगा।
क्या दलिदर निकालना जरूरी होता है
दलिदर निकालना कोई अनिवार्य धार्मिक पूजा या शास्त्रीय विधान नहीं है। यह कुछ क्षेत्रों में प्रचलित लोकपरंपरा है। जो परिवार इसे मानते हैं, वे अपनी रीति के अनुसार निभाते हैं। इसका उद्देश्य नए साल में सुख, शांति और खुशहाली की कामना करना है।
