Bajrang Baan Rules: बजरंग बाण भगवान हनुमान जी का एक शक्तिशाली स्तोत्र माना जाता है। इसे विशेष रूप से संकट, भय, शत्रु बाधा और नकारात्मक ऊर्जा को दूर करने के लिए पढ़ा जाता है। हनुमान चालीसा की तुलना में बजरंग बाण अधिक प्रभावशाली और ‘आह्वानात्मक’ माना जाता है, यानी इसमें भगवान से तुरंत सहायता की प्रार्थना की जाती है।
यही कारण है कि इसे पढ़ने के कुछ विशेष नियम बताए गए हैं और हर किसी को इसे बिना समझे पढ़ने की सलाह नहीं दी जाती है। यह पाठ इतना ज्यादा शक्तिशाली है कि नामुमकिन काम को भी मुमकिन बना सकता है, लेकिन इसके लिए पाठ करने वाले का मन पवित्र और सच्चा होना चाहिए। तुलसीदास जी ने खुद मारण प्रयोग से बचने के लिए इसकी रचना की थी। हालांकि मार्केट में मिलने वाली किताबों में पूर्ण बजरंगबाण नहीं मिलता है।
बजरंग बाण पढ़ने के नियम
बजरंग बाण का पाठ हमेशा नियम और अनुशासन के साथ करना चाहिए। इसे सामान्य पाठ की तरह हल्के में नहीं लेना चाहिए। सबसे पहले सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें और मन को शांत रखें। पूजा स्थान पर हनुमान जी की मूर्ति या चित्र के सामने घी या सरसों के तेल का दीपक जलाएं। इसके बाद सिंदूर, चमेली का तेल और लाल फूल अर्पित करें।
पाठ करने से पहले संकल्प लें और अपनी कामना प्रभु से कहें कि आप किस प्रयोजन से इस पाठ को शुरू कर रहे हैं। पाठ करते समय मन में पूर्ण श्रद्धा और विश्वास होना चाहिए। बीच में उठना, बात करना या ध्यान भटकाना उचित नहीं माना जाता है। कोशिश करें कि एक निश्चित समय और स्थान पर नियमित रूप से इसका पाठ करें। मंगलवार और शनिवार को बजरंग बाण पढ़ना विशेष रूप से शुभ माना जाता है। जितने दिनों तक पाठ करना हो, उतने दिनों तक सात्विक जीवन का पालन करें।
किन लोगों को बजरंग बाण नहीं पढ़ना चाहिए
बजरंग बाण एक ‘उग्र’ प्रार्थना मानी जाती है, इसलिए इसे हर व्यक्ति के लिए उपयुक्त नहीं माना जाता है। जो लोग मानसिक रूप से अस्थिर हैं या जिनका मन बहुत अधिक डर या नकारात्मक सोच से भरा रहता है, उन्हें बिना मार्गदर्शन के इसका पाठ नहीं करना चाहिए। इसके अलावा जो लोग नियम और अनुशासन का पालन नहीं कर सकते, या जिनका मन श्रद्धा से जुड़ा नहीं है, उन्हें भी बजरंग बाण पढ़ने से बचना चाहिए।
गर्भवती महिलाओं और बहुत छोटे बच्चों को भी इसे नियमित रूप से पढ़ने की सलाह नहीं दी जाती है, क्योंकि यह स्तोत्र ऊर्जावान और तीव्र प्रभाव वाला माना जाता है। इसके साथ ही मांस-मदिरा का सेवन और व्यभिचार करने वालों को भी इस स्तोत्र का पाठ नहीं करना चाहिए। मान्यता यह भी है कि अगर आप संकल्प लेकर किसी कार्य सिद्धि या परेशानी में इसके पाठ को करते हैं तो प्याज, लहसुन और अन्य तामसिक भोजन से भी दूरी बनाकर रखनी चाहिए।
कौन लोग पढ़ सकते हैं बजरंग बाण
यह पाठ नियमित पढ़ने के लिए नहीं है। किसी विशेष संकट और परेशानी में ही इसका प्रयोग करना चाहिए। यह पाठ बेहद शक्तिशाली है। मान्यता है कि आग या जल में फंस जाने, जीवन संकट, नौकरी जाने का संकट, काला जादू या नकारात्मक शक्ति के प्रभाव, शत्रु द्वारा नुकसान पहुंचाए जाने की आशंका, कोर्ट-कचहरी के गंभीर मामले, अदृश्य भय हो तब ही इसका पाठ करना चाहिए।
इस पाठ में भगवान हनुमान जी को कार्य के लिए उनके सबसे प्रिय भगवान श्रीराम की शपथ दी जाती है। इस कारण वे तुरंत कार्य करने के लिए उपस्थित हो जाते हैं। वहीं, गलत भावना या प्रयोजन से अगर इस स्तोत्र का पाठ किया जाए तो व्यक्ति को हनुमान जी दंड भी देते हैं। इस कारण बिना भारी संकट के इस पाठ को करने से बचना चाहिए।
बजरंग बाण पढ़ने के लाभ
बजरंग बाण का ही तरीके से पाठ करने से कई लाभ मिलते हैं। सबसे बड़ा लाभ यह माना जाता है कि इससे जीवन के बड़े से बड़े संकट दूर होने लगते हैं। शत्रु बाधा कम होती है और व्यक्ति को मानसिक शक्ति मिलती है। इसका पाठ करने से डर, चिंता और नकारात्मक विचार धीरे-धीरे खत्म होने लगते हैं। व्यक्ति के अंदर साहस और आत्मविश्वास बढ़ता है। ऐसा भी माना जाता है कि बजरंग बाण का पाठ करने से बुरी शक्तियों और नकारात्मक ऊर्जा से रक्षा होती है और जीवन में सकारात्मकता आती है।
श्री बजरंग बाण
(दोहा)
निश्चय प्रेम प्रतीति ते, विनय करैं सनमान।
तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्ध करैं हनुमान।।
(चौपाई)
जय हनुमन्त संत-हितकारी। सुन लीजै प्रभु अरज हमारी।।
जन के काज विलंब न कीजै। आतुर दौरि महा सुख दीजै।।
जैसे कूदि सिन्धु बहि पारा। सुरसा बदन पैठि विस्तारा।।
आगे जाय लंकिनी रोका। मारेहु लात गई सुर लोका।।
जाय विभीषण को सुख दीन्हा। सीता निरखि परम पद लीन्हा।।
बाग उजारि सिन्धु मंह बोरा। अति आतुर यम कातर तोरा।।
अक्षय कुमार को मारि संहारा। लूम लपेटि लंक को जारा।।
लाह समान लंक जरि गई। जय-जय धुनि सुरपुर में भई।।
अब विलंब केहि कारण स्वामी। कृपा करहु प्रभु अन्तर्यामी।।
जय जय लक्ष्मण प्राण के दाता। आतुर होइ दुःख करहु निपाता।।
जय गिरधर जय-जय सुख सागर। सुर समूह समरथ भट नागर।।
ॐ हनु-हनु-हनु हनुमंत हठीले। वैरहिं मारु वज्र सम कीले।।
गदा वज्र तै बैरिहीं मारो। महाराज निज दास उबारो।।
सुनि हुंकार हुंकार दै धावो। वज्र गदा हनि विलंब न लावो।।
ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं हनुमंत कपीसा। ॐ हुँ हुँ हुँ हनु अरि उर सीसा।।
सत्य होहु हरि सत्य पाय कै। रामदूत धरु मारु धाय कै।।
जय हनुमंत अनंत अगाधा। दुःख पावत जन केहि अपराधा।।
पूजा जप तप नेम अचारा। नहिं जानत है दास तुम्हारा।।
वन उपवन जल-थल गृह माहीं। तुम्हरे बल हम डरपत नाहीं।।
पाय परौं कर जोरि मनावौं। अपने काज लागि गुण गावौं।।
जय अंजनी कुमार बलवंता। शंकर स्वयं वीर हनुमंता।।
बदन कराल दनुज कुल घालक। भूत पिशाच प्रेत उर शालक।।
भूत प्रेत पिशाच निशाचर। अग्नि बैताल वीर मारी मर।।
इन्हहिं मारु तोहि शपथ राम की। राखु नाथ मर्यादा नाम की।।
जनकसुता पति दास कहाओ। ता की शपथ विलंब न लाओ।।
जय जय जय ध्वनि होत अकाशा। सुमिरत होत दुसह दुःख नाशा।।
शरण शरण परि जोरि मनावौं। यहि अवसर अब केहि गोहरावौं।।
उठु उठु चल तोहि राम दोहाई। पाय परौं कर जोरि मनाई।।
ॐ चं चं चं चं चपल चलंता। ॐ हनु हनु हनु हनु हनुमंता।।
ॐ हं हं हांक देत कपि चंचल। ॐ सं सं सहमि पराने खल दल।।
अपने जन को कस न उबारो। सुमिरत होत आनंद हमारो।।
ताते विनती करौं पुकारि। हरहु सकल दुःख विपति हमारी।।
ऐसो बल प्रभाव प्रभु तोरा। कस न हरहु दुःख संकट मोरा।।
हे बजरंग बाण सम धावो। मेटि सकल दुःख दरस दिखावो।।
हे कपिराज काज कब ऐहौ। अवसर चूक अंत पछतैहौ।।
जनकी लाज जात एहि बारा। धावहु हे कपि पवन कुमारा।।
जयति जयति जय जय हनुमाना। जयति जयति गुण ज्ञान निधाना।।
जयति जयति जय जय कपिराई। जयति जयति जय जय सुखदाई।।
जयति जयति जय राम पियारे। जयति जयति जय सिया दुलारे।।
जयति जयति मुद मंगलदाता। जयति जयति जय त्रिभुवन विख्याता।।
ऐहि प्रकार गावत गुण शेषा। पावत पार नहिं लवलेशा।।
राम रूप सर्वत्र समाना। देखत रहत सदा हर्षाना।।
विधि शारदा सहित दिन-राति। गावत कपि के गुण बहु भांति।।
तुम सम नहीं जगत बलवाना। करि विचार देखौं विधि नाना।।
यह जिय जानि शरण तब आई। ताते विनय करौं चित लाई।।
सुनि कपि आरत वचन हमारे। मेटहु सकल दुःख भ्रम भारे।।
ऐहि प्रकार विनती कपि केरी। जो जन करै लहै सुख ढेरी।।
याके पढ़त वीर हनुमाना। धावत बाण तुल्य बलवाना।।
मेटत आए दुःख क्षण माहीं। दै दर्शन रघुपति ढिग जाहीं।।
पाठ करै बजरंग बाण की। हनुमत रक्षा करै प्राण की।।
डीठ मूठ टोनादिक नासै। परकृत यंत्र मंत्र नहिं त्रासै।।
भैरवादि सुर करै मिताई। आयुस मानि करै सेवकाई।।
प्रण कर पाठ करै मन लाई। अल्प मृत्यु ग्रह दोष नसाई।।
आवृत ग्यारह प्रति दिन जापै। ता के छाह काल नहिं चापै।।
दै गुग्गुल की धूप हमेशा। करै पाठ तन मिटै कलेशा।।
यह बजरंग बाण जेहि मारै। ताहि कहौ फिर कौन उबारै।।
शत्रु समूह मिटै सब आपै। देखत ताहि सुरासुर कांपै।।
तेज प्रताप बुद्धि अधिकाई। रहै सदा कपिराज सहाई।।
(दोहा)
प्रेम प्रतीतिहिं कपि भजै, सदा धरै उर ध्यान।
तेहि के कारज तुरत ही, सिद्ध करैं हनुमान।।
