अध्यात्म

बछ बारस की कथा हिंदी में, बछ बरस की कहानी से जानें क्यों इस दिन दूध-दही का सेवन नहीं होता, बछ बारस की कथा लिरिक्स

Bach Baras Ki katha kahani hindi mein: बछ बारस व्रत भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि को किया जाता है। इसे गोवत्स द्वादशी भी कहते हैं। यहां जानें बछ बारस की कथा हिंदी में। पढ़ें बच्छ बारस की कहानी लिखित। बच्छ बारस पर दूध और दही का सेवन क्यों नहीं होता है। देखें बछ बारस की कथा लिरिक्स।

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बछ बारस की कथा लिरिक्स (Pic: AI Image)

Bach Baras Ki katha kahani hindi mein: भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि पर बछ बारस व्रत होता है। यह व्रत गोवत्स द्वादशी के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन गौ माता और उनके बछड़े की पूजा का विशेष महत्व है। बच्छ बारस की व्रत कथा बताती है कि कैसे गौ माता की पूजा से भगवान की कृपा पाई जा सकती है। यहां देखें बछ बारस की कथा हिंदी में, बच्छ बारस की कहानी लिखित, बछ बारस की कथा लिरिक्स।

Bachh Baras Ki Katha in Hindi | बच्छ बारस की कहानी

प्राचीन समय में एक व्यापारी था। उसके घर में बहुत धन-संपत्ति थी, लेकिन संतान नहीं थी। उसकी पत्नी ने संतान प्राप्ति के लिए कठोर तप किया। गोमाता की कृपा से उसे पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई।

जब पुत्र बड़ा हुआ, एक दिन व्यापारी की पत्नी ने घर में पकवान बनाए। उसी समय गोमाता अपने बछड़े के साथ घर के दरवाजे पर आई। व्यापारी की पत्नी ने उन्हें अनदेखा कर दिया और बछड़े को भगा दिया। इससे गोमाता रुष्ट हो गईं।

कुछ समय बाद व्यापारी का पुत्र अचानक बीमार पड़ गया और मृत्यु को प्राप्त हुआ। पत्नी दुखी होकर गोमाता के चरणों में गिर पड़ी और क्षमा माँगने लगी। गोमाता ने करुणा कर पुत्र को पुन जीवित कर दिया। तब से यह नियम बना कि इस दिन महिलाएं व्रत रखकर गोमाता और बछड़े की पूजा करें। इस व्रत से संतान की रक्षा होती है, और घर में सुख-शांति एवं समृद्धि बनी रहती है।

बच्छ बारस व्रत कथा साहूकार की कहानी

एक साहूकार था जिसके सात बेटे थे। एक बार साहूकार ने एक तालाब बनवाया लेकिन बारह वर्षों तक भी वह तालाब नहीं भर सका। इससे परेशान होकर साहूकार कुछ विद्वान पंडितों के पास गया और उसने पूछा कि इतने दिन हो गए लेकिन मेरा तालाब क्यों नहीं भरता है? तब पंडितों ने कहा कि तुम्हें तुम्हारे बड़े बेटे या बड़े पोते की बलि देनी होगी तब ही यह तालाब भरेगा।

साहूकार ने पंडित की बात मानकर अपनी बड़ी बहू को पीहर भेज दिया। साहूकार की बड़ी बहू हमेशा बछ बारस का व्रत करती थी। बड़ी बहू के पीहर जाने के बाद साहूकार ने अपने बड़े पोते की बलि चढ़ा दी। तब घनघोर मेघ बरसने लगे और तालाब भर गया। जब साहूकार अपने तालाब की पूजा करने जाने लगा तो अन्य लोग भी उसके साथ उसकी तालाब की पूजा करने जाने लगे। जाते समय साहूकार ने अपनी दासी से कहा कि गेऊंला धानुला (चने, मोठ) बना लेना।

साहूकार की गाय के बच्चे का नाम भी गीऊंला धानुला था। उस दासी ने गाय के बच्चे को ही गीऊंला धानुला समझकर पका दिया। साहूकार व साहूकारनी गाजे-बाजे के साथ तालाब को पूजने लगे। साहूकार के पूजन कर लेने के बाद वहां आए लोग भी तालाब का पूजन करने लगे। उसी समय जिस पोते की बलि दी गई थी वह वहां गोबर में लिपटा हुआ मिला और आकर कहने लगा कि मैं भी तालाब में कूदूंगा।

उस बच्चे को देखकर साहूकार ने कहा कि मैंने तो इसकी बलि दे दी थी जिससे ही ये तालाब भरा था। लेकिन गाय माता ने हमारी लाज रख ली और हमें हमारा पोता वापस लौटा दिया। अपने बेटे को वापस देखकर बहू भी बहुत खुश हुई। तब साहूकार दौड़ा-दौड़ा घर वापस आया और दासी से कहने लगा कि गाय का बच्चा कहां है। तब दासी बोली कि आपने गेऊंला धनुला को पकाने के लिए कहा था तो मैंने उसे पका लिया।

यह सुनते ही साहूकार क्रोधित हो उठा और अपनी दासी से कहने लगा। अरे पापिनी तूने यह क्या अनर्थ कर दिया। अभी हम एक पाप उतार कर आए हैं उससे पहले ही तूने दूसरा पाप हमारे लगा दिया। साहूकार अपना सिर पकड़ कर बैठ गया। साहूकार और साहूकारनी सोचने लगे कि अब गाय आएगी तो उसको क्या जवाब देंगे। साहूकार ने एक हांडी में गाय के बच्चे को डालकर खड्डे में दबा दिया।

जब शाम को जंगल से गाय वापस घर आई तो अपने बच्चे को ना पाकर चिल्लाने लगी और खड्डे में दबी हुई हंडिया को खोदने लगी। जब गाय ने हांडी को खोदकर निकाला तो उसमें बछड़ा निकल आया। जब साहूकार को पता चला तो वह भी बछड़े को देखने के लिए गया तो उसने देखा कि बछड़ा तो अपनी मां यानि गाय का दूध पीने में व्यस्त था। तब साहूकार ने पूरे गांव में ढिंढोरा पिटवाया कि सभी स्त्रियों को बछ बारस का व्रत करना चाहिए। हे बछबारस माता जैसे साहूकार की बहू को दिया वैसे हम सबको देना।

बच्छ बारस व्रत का महत्व

बच्छ बारस का व्रत विशेषकर माताओं द्वारा संतान की लंबी आयु और अच्छे स्वास्थ्य के लिए किया जाता है। मान्यता है कि गोमाता की पूजा करने से घर में ऐश्वर्य और सुख-समृद्धि आती है। इस दिन बछड़े और गाय की सेवा का विशेष महत्व है।

Medha Chawla
मेधा चावलाauthor

मेधा चावला टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में सीनियर एसोसिएट एडिटर हैं और लाइफस्टाइल सेक्शन की लीड हैं। लाइफस्टाइल पत्रकारिता में 20 वर्षों का अनुभव रखने वाली मेधा की विशेषज्ञता हेल्थ, वेलनेस, फिटनेस, मेंटल हेल्थ, डेली लाइफ इम्प्रूवमेंट, ह्यूमन-इंटरेस्ट फीचर्स और रिसर्च-बेस्ड स्टोरीज तक फैली है। उनकी लेखन शैली पाठकों को जटिल स्वास्थ्य और जीवनशैली संबंधी विषयों को आसान, समझने योग्य और व्यवहारिक रूप में प्रस्तुत करती है, जिससे उनका कंटेंट व्यापक पाठक समूह से जुड़ता है। अबतक 30,000 से अधिक कंटेंट पीस लिख चुकी मेधा की कई एक्सक्लूसिव स्टोरीज डिजिटल प्लेटफॉर्म पर ट्रेंड सेट कर चुकी हैं।

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