सोशल मीडिया पर यह दावा किया जाता है कि एथेनॉल में चीनी होने के कारण वाहन के आसपास चींटियां और मधुमक्खियां आकर्षित होती हैं, हालांकि यह दावा पूरी तरह गलत है। फ्यूल-ग्रेड एथेनॉल में किसी भी प्रकार की शर्करा नहीं होती। इसलिए इसका चींटियों या मधुमक्खियों से कोई संबंध नहीं है।
यह भी एक आम धारणा है कि E20 ईंधन के इस्तेमाल से माइलेज में भारी गिरावट आती है, लेकिन ऑटोमोटिव रिसर्च एसोसिएशन ऑफ इंडिया (ARAI) के परीक्षणों के अनुसार माइलेज पर इसका प्रभाव बेहद मामूली है और सामान्य उपयोग में लगभग महसूस नहीं होता। इसके अलावा, एथेनॉल का उच्च ऑक्टेन स्तर ईंधन के बेहतर दहन में मदद करता है, जिससे इंजन की परफॉर्मेंस और स्मूथनेस बेहतर हो सकती है।
E20 ईंधन को लेकर सबसे बड़ा सवाल इंजन की सुरक्षा का है। ARAI, इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOCL) और सोसाइटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स (SIAM) के व्यापक परीक्षणों में इंजन, धातु या प्लास्टिक के हिस्सों पर कोई गंभीर नकारात्मक प्रभाव नहीं पाया गया, हालांकि कुछ पुराने वाहनों में रबर के कुछ हिस्सों जैसे होज, सील या गैस्केट को अपेक्षाकृत जल्दी बदलने की जरूरत पड़ सकती है।
इस दावे को भी तथ्यों के आधार पर गलत बताया गया है। आधुनिक एथेनॉल संयंत्र पर्यावरणीय मंजूरी, भूजल संरक्षण मानकों और Zero Liquid Discharge (ZLD) जैसी तकनीकों के साथ संचालित किए जाते हैं, जिससे पर्यावरण पर प्रभाव को कम किया जा सके।
यह दावा भी पूरी तरह फर्जी है। ईंधन में इस्तेमाल होने वाला एथेनॉल सीधे गन्ने का रस नहीं होता, बल्कि इसे औद्योगिक प्रक्रिया के जरिए तैयार किया जाता है। गुणवत्ता के सभी निर्धारित मानकों पर खरा उतरने के बाद ही इसे पेट्रोल में मिलाया जाता है।
कुछ लोगों का कहना है कि एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल में पानी आ जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार, पानी किसी भी प्रकार के ईंधन के लिए नुकसानदायक होता है। इसलिए आधुनिक पेट्रोल पंपों और वाहनों में पानी को ईंधन में जाने से रोकने के लिए पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था मौजूद रहती है।
कुछ लोगों का मानना है कि E20 भारत में बिना पर्याप्त परीक्षण के लागू किया गया है। जबकि वास्तविकता यह है कि अमेरिका, ब्राजील, कनाडा, जापान, थाईलैंड और कई यूरोपीय देशों में वर्षों से एथेनॉल मिश्रित ईंधन का सफलतापूर्वक उपयोग किया जा रहा है। भारत में भी E20 कार्यक्रम को व्यापक वैज्ञानिक परीक्षण और विशेषज्ञों की मंजूरी के बाद लागू किया गया है।
यह दावा भी भ्रामक है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, एथेनॉल संयंत्र में एक लीटर एथेनॉल के उत्पादन के लिए केवल 3 से 5 लीटर प्रोसेस्ड पानी का उपयोग होता है। आधुनिक डिस्टिलरी ZLD तकनीक के जरिए पानी का पुनर्चक्रण करती हैं। इसके अलावा, एथेनॉल उत्पादन में मुख्य रूप से अधिशेष अनाज और मक्का का इस्तेमाल किया जाता है।