दूल्हा घोड़ी पर ही क्यों बैठता है, कैसे यह रिवाज बना भारतीय शादी की अनूठी परंपरा

भारतीय शादियों की जब भी बात होती है, तो एक दृश्य हमेशा मन में आता है – सजे-धजे दूल्हे का घोड़ी पर बैठकर बारात लेकर निकलना। ढोल-नगाड़ों की गूंज, रिश्तेदारों की नाचती टोली और बीच में सिर पर साफा बांधे, तलवार या तलवारनुमा छड़ी थामे दूल्हा – यह दृश्य आज भी शादी का अहम हिस्सा है। पर क्या आपने कभी सोचा है कि दूल्हा घोड़ी पर ही क्यों बैठता है? आखिर इस परंपरा की शुरुआत कब और कैसे हुई?

Authored by: सुनीत सिंहUpdated Jun 30 2025, 15:10 IST
घोड़ी पर दूल्हा: शौर्य और सामर्थ्य का प्रतीक​Image Credit : Freepik01 / 07

घोड़ी पर दूल्हा: शौर्य और सामर्थ्य का प्रतीक​

दूल्हे की घोड़ी पर चढ़ने की परंपरा भारत में प्राचीन राजवंशों और क्षत्रिय परंपराओं से जुड़ी मानी जाती है। पुराने समय में जब राजाओं और योद्धाओं की शादियां होती थीं, तो वे अपनी दुल्हन को विजयी योद्धा की तरह लाने के लिए घोड़े पर चढ़कर निकलते थे। यह उनकी वीरता, शक्ति और सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक होता था।

​युद्धों और आक्रमणों का दौर​Image Credit : Freepik02 / 07

​युद्धों और आक्रमणों का दौर​

युद्धों और आक्रमणों के दौर में भी दूल्हा कई बार अपनी दुल्हन को बलपूर्वक या प्रेमपूर्वक लाने के लिए घोड़े पर सवार होकर निकलता था। कालांतर में यह प्रथा विवाह संस्कार का हिस्सा बन गई और इसका अर्थ शक्ति और पुरुषत्व के प्रदर्शन से जुड़ गया।

​घोड़ा क्यों नहीं, घोड़ी क्यों?​Image Credit : Freepik03 / 07

​घोड़ा क्यों नहीं, घोड़ी क्यों?​

अक्सर लोग पूछते हैं घोड़ा क्यों नहीं, घोड़ी क्यों? इसका उत्तर भी सांकेतिक है। कहा जाता है कि दूल्हा जब घोड़ी पर सवार होता है, तो यह नर-नारी के समन्वय और संतुलन का प्रतीक होता है। यह विवाह की उस भावना को दर्शाता है जिसमें दूल्हा और दुल्हन दोनों साथ चलने वाले हैं, ना कि कोई किसी पर हावी होने वाला है।

​सौभाग्य और शुभता का प्रतीक​Image Credit : Freepik04 / 07

​सौभाग्य और शुभता का प्रतीक​

कुछ मान्यताएं यह भी हैं कि घोड़ी पर चढ़ना सौभाग्य और शुभता का प्रतीक होता है। युद्ध के समय घोड़े का प्रयोग होता था। इसलिए विवाह जैसे मंगल अवसर पर घोड़ी को चुना गया।

​सांस्कृतिक और धार्मिक मान्यताएं​Image Credit : Freepik05 / 07

​सांस्कृतिक और धार्मिक मान्यताएं​

वेदों और पुराणों में विवाह को यज्ञ के समान पवित्र माना गया है। दूल्हा जब घोड़ी पर सवार होकर आता है, तो यह मान्यता है कि वह इंद्र की तरह तेजस्वी, विष्णु की तरह पालनकर्ता और राम की तरह मर्यादित पति बनने का व्रत लेकर विवाह स्थल पहुंचता है।

​आधुनिकता में भी कायम है परंपरा​Image Credit : Freepik06 / 07

​आधुनिकता में भी कायम है परंपरा​

आज भले ही कारों, हेलीकॉप्टरों और लग्जरी साधनों की भरमार हो गई हो, लेकिन अधिकांश भारतीय शादियों में दूल्हे की घोड़ी पर चढ़ाई आज भी रस्मों और रीति-नीतियों का अहम हिस्सा बनी हुई है।

​जिम्मेदारी का एहसास​Image Credit : Freepik07 / 07

​जिम्मेदारी का एहसास​

यह एक तरह से परंपरा, गर्व और आत्मीयता की उस डोर से जुड़ा है, जो दूल्हे को सिर्फ एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक नई जिम्मेदारी और सामाजिक भूमिका निभाने वाले व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत करता है।

End of Photo Gallery
Subscribe to our daily Newsletter!