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बिल्डर ने लटकाया फ्लैट, तो पजेशन के बाद भी मांगा जा सकता ब्याज : इलाहबाद हाईकोई

अगर बिल्डर ने आपको फ्लैट समय पर नहीं दिया और आपने देरी के बाद भी फ्लैट का पजेशन ले लिया है, तो इसका यह मतलब नहीं है कि आप देरी पर ब्याज नहीं मांग सकते हैं।

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फ्लैट में देरी बिल्डर को पड़ी भारी

Allahabad High Court Interest Claim Against Delayed Possession : अगर बिल्डर ने फ्लैट की डिलीवरी में देरी की है आप उस फ्लैट का पजेशन ले लेते हैं, तो इसका यह मतलब नहीं होता है कि आप देरी के खिलाफ बिल्डर से ब्याज की मांग नहीं कर सकते हैं। PTI की रिपोर्ट के मुताबिक इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि घर खरीदने वाला सिर्फ इसलिए पजेशन में देरी के लिए ब्याज का दावा करने का कानूनी अधिकार नहीं खो देता है, क्योंकि उसने बाद में फ्लैट स्वीकार कर लिया था। कोर्ट की लखनऊ बेंच ने बुधवार को एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि रियल एस्टेट (रेगुलेशन एंड डेवलपमेंट) एक्ट (RERA) में पजेशन में देरी के कारण ब्याज का दावा करने के लिए कोई खास लिमिटेशन पीरियड तय नहीं किया गया है।

क्या पूरा था मामला?

जस्टिस प्रशांत कुमार ने यह टिप्पणी अंतरिक्ष डेवलपर्स एंड प्रमोटर्स प्राइवेट लिमिटेड की अपील खारिज करते हुए कही। यह अपील नोएडा के सेक्टर 78 में उसके अंतरिक्ष गोल्फ व्यू प्रोजेक्ट से जुड़े विवाद को लेकर थी। खरीदार श्याम सुंदर अग्रवाल ने 2010 में इस प्रोजेक्ट में एक फ्लैट बुक किया था, जिसका पजेशन नवंबर 2012 तक मिलना था। लेकिन, डेवलपर ने मई 2017 में पजेशन दिया और कोर्ट के मुताबिक, उसने ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट और दूसरे जरूरी डॉक्यूमेंट्स के बिना ही ऐसा किया।

रेरा ने बिल्डर के खिलाफ दिया आदेश

RERA अपीलेट ट्रिब्यूनल ने डेवलपर को निर्देश दिया था कि वह दिसंबर 2012 से मई 2017 तक श्याम सुंदर अग्रवाल की तरफ से जमा की गई रकम पर मार्जिनल कॉस्ट ऑफ फंड बेस्ड लेंडिंग रेट (MCLR) से एक परसेंट ज्यादा ब्याज दे। डेवलपर ने इस आदेश को चुनौती देते हुए कहा कि देरी नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) के उस आदेश की वजह से हुई, जिसमें ओखला बर्ड सैंक्चुअरी के 10 km के दायरे में कंस्ट्रक्शन और ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट देने पर रोक लगाई गई थी।

हाईकोर्ट ने खारिज की बिल्डर की दलील

हाई कोर्ट ने बिल्डर की इस दलील को खारिज कर दिया और कहा कि डेवलपर ने खुद ही दावा किया था कि प्रोजेक्ट 2014 में पूरा हो गया था और उसी साल ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट के लिए अप्लाई भी किया गया था। इसलिए, वह एक ही समय में यह दावा नहीं कर सकता था कि प्रोजेक्ट पूरा हो गया था और NGT की रोक की वजह से इसे पूरा होने से रोका गया था। इसके साथ ही कोर्ट ने आगे कहा कि NGT की रोक असल में अगस्त 2013 में लागू हुई थी। जबकि, पजेशन देने की कॉन्ट्रैक्ट की डेडलाइन नवंबर 2012 थी। ऑर्डर के मुताबिक, डेवलपर का डिफॉल्ट रोक लागू होने से पहले ही हो चुका था।

क्यों नहीं मिला जीरो पीरियड का फायदा?

बेंच ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की तरफ से दी गई व्यवस्था के तहत "जीरो पीरियड" का फायदा सिर्फ उस समय तक बढ़ाया जा सकता है, जब प्रोजेक्ट पर असल में रोक का असर पड़ा हो और इससे NGT के आदेश से पहले हुई देरी पर इसका फायदा नहीं दिया जा सकता है। इसलिए कोर्ट ने देरी वाले समय के लिए ब्याज देने के निर्देश को बरकरार रखा और डेवलपर की अपील खारिज कर दी।

Yateendra Lawaniya
यतींद्र लवानियाauthor

प्रिंट और डिजिटल मीडिया में बिजनेस एवं इकोनॉमी कैटेगरी में 10 वर्षों से अधिक का अनुभव। पिछले 7 वर्षों से शेयर बाजार, कॉरपोरेट सेक्टर और आर्थिक नीतियों से जुड़ी खबरों पर विशेष पकड़। लेखन में केवल हेडलाइन तक सीमित न रहकर आंकड़ों, नीतिगत फैसलों और कॉरपोरेट दावों के पीछे की वास्तविक तस्वीर को बैलेंस्ड और आसान शब्दों में पाठकों तक पहुंचाने का प्रयास। वर्तमान में Times Now Hindi के लिए बाजार की हर हलचल और आर्थिक घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं।

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