हाइड्रोजन ट्रेन को चलाने के लिए इस्तेमाल होने वाली हाइड्रोजन गैस को कई तरीकों से तैयार किया जाता है। सबसे स्वच्छ तरीका ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन है। इसमें पानी (H₂O) को इलेक्ट्रोलिसिस प्रक्रिया के जरिए हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में अलग किया जाता है। इस प्रक्रिया में बिजली की मदद से पानी के अणुओं को तोड़ा जाता है। अगर यह बिजली सौर ऊर्जा या पवन ऊर्जा जैसे नवीकरणीय स्रोतों से आती है, तो बनने वाली हाइड्रोजन को ग्रीन हाइड्रोजन कहा जाता है। इसके अलावा प्राकृतिक गैस से भी हाइड्रोजन बनाई जाती है, लेकिन उसमें कार्बन उत्सर्जन होता है। रेलवे में इस्तेमाल के लिए ग्रीन हाइड्रोजन को ज्यादा बेहतर विकल्प माना जा रहा है।
हाइड्रोजन ट्रेन में फ्यूल सेल तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है। ट्रेन में मौजूद हाइड्रोजन सिलेंडर से हाइड्रोजन गैस फ्यूल सेल तक पहुंचती है। यहां हाइड्रोजन और हवा में मौजूद ऑक्सीजन के बीच रासायनिक प्रतिक्रिया होती है। इस प्रतिक्रिया से बिजली पैदा होती है, जो ट्रेन की मोटर को चलाने का काम करती है। इस पूरी प्रक्रिया में धुएं की जगह केवल पानी की भाप (Water Vapour) निकलती है। यही वजह है कि हाइड्रोजन ट्रेन को जीरो एमिशन यानी शून्य उत्सर्जन वाली ट्रेन कहा जाता है।
भारत की इस स्वदेशी हाइड्रोजन ट्रेन में आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किया गया है। 10 कोच वाली इस ट्रेन में दो हाइड्रोजन ड्राइविंग पावर कार लगाई गई हैं। दोनों पावर कार मिलकर करीब 2,400 किलोवाट बिजली पैदा करने की क्षमता रखती हैं। इसके अलावा ट्रेन में लिथियम आयरन फॉस्फेट बैटरियां और विशेष हाइड्रोजन सिलेंडर लगाए गए हैं। ये बैटरियां जरूरत के समय अतिरिक्त ऊर्जा उपलब्ध कराती हैं और ट्रेन के संचालन को ज्यादा बेहतर बनाती हैं।
हाइड्रोजन ट्रेन के संचालन के लिए भारतीय रेलवे ने जींद में देश की पहली समर्पित हाइड्रोजन भंडारण और ईंधन भरने की सुविधा तैयार की है। इस केंद्र में हाइड्रोजन को 500 Bar तक के दबाव पर सुरक्षित रखा जाता है। ट्रेन में ईंधन भरने के लिए 350 Bar दबाव वाली व्यवस्था बनाई गई है। इस सुविधा की कुल भंडारण क्षमता करीब 3,000 किलोग्राम है। यह स्टेशन भविष्य में भारत में हाइड्रोजन आधारित रेल नेटवर्क के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
हाइड्रोजन ट्रेन की लागत सामान्य डीजल ट्रेन की तुलना में ज्यादा होती है, क्योंकि इसमें फ्यूल सेल, हाइड्रोजन टैंक, बैटरी सिस्टम और विशेष सुरक्षा उपकरण लगाए जाते हैं। एक हाइड्रोजन ट्रेन तैयार करने में कई सौ करोड़ रुपये तक का खर्च आ सकता है। हालांकि, लंबे समय में इसके कई फायदे हैं। हाइड्रोजन ट्रेन में डीजल की जरुरत नहीं होती, जिससे ईंधन खर्च कम हो सकता है और प्रदूषण नियंत्रण पर होने वाला खर्च भी घट सकता है। इसके अलावा हाइड्रोजन का उत्पादन अगर नवीकरणीय ऊर्जा से किया जाए तो यह भविष्य में सस्ता और अधिक टिकाऊ विकल्प बन सकता है। हाइड्रोजन गैस बनाने की लागत (Production Cost per kg) उत्पादन के तरीके के आधार पर इसे तीन प्रमुख श्रेणियों में बांटा जाता है: ग्रे हाइड्रोजन (Grey Hydrogen): यह प्राकृतिक गैस (मेथेन) से बनाई जाती है, लागत: 150 से 225 रुपये प्रति किलोग्राम। ब्लू हाइड्रोजन (Blue Hydrogen): इसमें जीवाश्म ईंधन का उपयोग होता है, लेकिन कार्बन को कैप्चर किया जाता है, लागत: 160 से 300 रुपये प्रति किलोग्राम। ग्रीन हाइड्रोजन (Green Hydrogen): यह पानी के इलेक्ट्रोलीसिस (पानी तोड़ने) और नवीकरणीय ऊर्जा (सौर/पवन) से बनाई जाती है, लागत: 300 से 450 रुपये प्रति किलोग्राम।
हाइड्रोजन गैस ज्वलनशील होती है, इसलिए इस ट्रेन में सुरक्षा को सबसे ज्यादा प्राथमिकता दी गई है। ट्रेन में कई आधुनिक सेंसर और सुरक्षा प्रणालियां लगाई गई हैं। ये सिस्टम हाइड्रोजन रिसाव, अधिक तापमान, आग और धुएं का तुरंत पता लगा सकते हैं। किसी भी खतरे की स्थिति में स्वचालित शट-ऑफ सिस्टम सक्रिय हो जाता है। इसके अलावा ट्रेन में लगातार वेंटिलेशन की व्यवस्था की गई है और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा मानकों के अनुसार सभी जरूरी परीक्षण पूरे किए गए हैं।
भारत की हाइड्रोजन फ्यूल सेल ट्रेन केवल एक नई ट्रेन नहीं, बल्कि स्वच्छ ऊर्जा आधारित परिवहन की दिशा में बड़ा बदलाव है। इससे भारतीय रेलवे को कार्बन उत्सर्जन कम करने में मदद मिलेगी और देश में हाइड्रोजन आधारित तकनीक को बढ़ावा मिलेगा। जींद–सोनीपत रूट पर सफल संचालन के बाद इसे अन्य मार्गों पर भी शुरू करने की योजना है। हाइड्रोजन ट्रेन आने वाले समय में भारत के रेलवे नेटवर्क को ज्यादा आधुनिक, पर्यावरण अनुकूल और आत्मनिर्भर बनाने में अहम भूमिका निभा सकती है। यह कदम भारत को दुनिया के स्वच्छ परिवहन क्षेत्र में मजबूत पहचान दिलाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास है।