World's First Marriage Bureau: भारतीय संस्कृति में ये माना जाता है कि जोड़ियां तो भगवान बनाता है। हम मानते हैं कि हमारी किस से शादी होगी ये सब पहले से तय है। बावजूद इसके हम अपने लिए जीवनसाथी तलाशते फिरते हैं। लोगों के लिए पहले ये काम बिचौलियो किया करते थे। इन बिचौलियो आमतौर पर अगुआ कहलाते थे।
अगुआ गांव-परिवार का ही कोई शख्स हुआ करता था जो किसी की बेटी या बेटे कि लिए रिश्ते लाया करता था। अगुआ एक तरह से किसी मैरिज ब्यूरो की तरह काम करते थे। आज यही काम मैट्रिमोनियल वेबसाइट या हाई प्रोफाइल मैरिज ब्यूरो करते हैं। वैसे क्या आप जानते हैं कि दुनिया का पहला मैरिज ब्यूरो करीब 376 साल पहले खुला था।
द ऑफिस ऑफ एड्रेसेज एंड एनकाउंटर्स
साल था 1650 और जगह थी लंदन की थ्रेडनीडल स्ट्रीट। पेशे से व्यापारी और शौक से लेखक हेनरी रॉबिन्सन ने 'द ऑफिस ऑफ एड्रेसेज एंड एनकाउंटर्स' नाम से दुनिया का पहला मैरिज ब्यूरो खोला था। इसने यूरोपियन समाज में शादी ब्याह की पूरी परिभाषा ही बदलकर रख दी थी। दरअसल यह मैरिज ब्यूरो उस दौर में खुला था जब इंसानी रिश्तों का सौदा जमीन के टुकड़ों और सिक्कों के ढेर पर हुआ करता था।
जब सिर्फ नफा नुकसान देखकर होती थी शादियां
17वीं सदी का इंग्लैंड गृहयुद्ध के बाद सामाजिक और राजनीतिक उथल-पुथल से गुजर रहा था। राजपरिवार और संसद की लड़ाई ने ज़मींदारों, कुलीनों और आम जनता की अर्थव्यवस्था को तोड़कर रख दिया था। ऐसे माहौल में शादी केवल तीन चीजों पर टिकी थी- लड़का या लड़की के पास कितनी संपत्ति है, उनका खून कितना कुलीन या ऊंचा है और इस रिश्ते से परिवार को क्या सामाजिक सुरक्षा मिलेगी?

प्रतीकात्मक तस्वीर(AI Generated and newsroom verified image)
उस दौर के समाज में लड़का या लड़की एक-दूसरे से प्यार करते हैं या नहीं, उनकी पसंद-नापसंद क्या है, इसका कोई वजूद नहीं था। शादियां घर के बड़े बुजुर्ग परिवार का नफा नुकसान देखते हुए तया करते थे। लड़की के पिता को दहेज के तौर पर जमीन या संपत्ति का बड़ा हिस्सा देना पड़ता था। बदले में लड़के का परिवार संपत्ति की सुरक्षा की गारंटी देता था।
और फिर खुला दुनिया का पहला मैरिज ब्यूरो
ऐसे घुटन भरे और सामंती माहौल में हेनरी रॉबिन्सन ने अपना मैरिज ब्यूरो खोला। रॉबिन्सन का यह ऑफिस उस जमाने के हिसाब से इतना दुस्साहसिक और अजीब था कि शुरू में लोगों ने उसे किसी पैसों की बर्बादी समझा। हालांकि हेनरी रॉबिन्सन का विजन एकदम साफ था। उन्होंने अपने मैरिज ब्यूरो के प्रचार में साफ कहा कि अगर कोई लड़का या लड़की अपने पारिवारिक दायरे से बाहर निकलकर अपनी पसंद का जीवनसाथी खोजना चाहता है, तो वह उसके दफ्तर आकर अपना नाम दर्ज कराए।
तब कैसे बनती थीं जोड़ियां
हेनरी के दफ्तर में एक बड़ा सा रजिस्टर रखा हुआ करता था। इस रजिस्टर में अपने लिए मनचाहा हमसफर तलाशने वाले को अपना नाम, उम्र, संपत्ति और हुनर के साथ साफ शब्दों में ये लिखना होता था कि उसे कैसा जीवनसाथी चाहिए। इसके लिए उन्हें कुछ फीस चुकानी पड़ती थी। समय-समय पर उस रजिस्टर में दर्ज ब्योरे देखे जाते और अगर दो लोग एक दूसरे की शर्तें और जरूरतों पर खरे उतरते तो उन्हें एक दूसरे से मिलवाया जाता था। अगर रिश्ता तय हो जाता, तो एक मोटा कमीशन देना पड़ता था।

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हेनरी रॉबिन्सन के द ऑफिस ऑफ एड्रेसेज एंड एनकाउंटर्स ने सदियों पुराने सामाजिक ढांचे को सीधी चुनौती दी थी। इतिहास में पहली बार, किसी संस्था ने शादी के फैसले को परिवार और चर्च की मुट्ठी से निकालकर सीधे उसी व्यक्ति के हाथ में सौंप दिया था। अब कोई भी बिना बाहरी दखल के अपने लिए अपनी ही शर्तों पर साथी तलाश सकता था।
कहां से आया था मैरिज ब्यूरो खोलने का आइडिया
17वीं सदी के गृहयुद्ध के बाद इंग्लैंड के गांवों से हजारों लोग रोजी-रोटी की तलाश में लंदन जैसे बड़े शहरों की तरफ भागे थे। पलायन ने उनके पुराने पारिवारिक नेटवर्क को पीछे छोड़ दिया था। शहर में नए अमीर व्यापारी पैदा हो रहे थे। उनके पास पैसा तो था लेकिन अपनी तरह रईस और बड़े परिवारों से कोई संपर्क नहीं था। दूसरी तरफ, युद्ध में बहुत से जमींदार मारे गए थे, जिससे कई विधवाएं ऐसी बची थीं जिनके पास जायदाद तो थी, लेकिन उनकी रक्षा करने वाला कोई बढ़िया परिवार नहीं था।
ऐसे लोग किसी ऐसे की तलाश में थे जिसके पास जाकर वो बिना किसी सामाजिक शर्मिंदगी के अपनी बराबरी का या अपनी जरूरत के हिसाब से साथी तलाशा जा सके। रॉबिन्सन ने लोगों के इसी खालीपन को पहचान लिया था।

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रॉबिन्सन द्वारा खोला गया दुनिया के पहले मैरिज ब्यूरो में लोगों की भीड़ जुटने लगी। अब उसके दफ्तर में आकर कोई विधवा महिला अपनी शर्तों पर ऐसा पुरुष चुन सकती थी जो उसका व्यापार संभाल सके। वहीं, एक युवा व्यापारी ऐसी लड़की से मिल सकता था जो शहर में नई-नई आई हो।
'सभ्य' समाज को नहीं आया रास
देखते-देखते इस मैरिज ब्यूरो और वहां लगने वाले लोगों की भीड़ की खबरें चर्च और तथाकथित समाज के ठेकेदारों तक भी पहुंची। इन लोगों वे हेनरी को अनैतिक, दलाल और पवित्र सामाजिक व्यवस्था को भ्रष्ट करने वाला बताते हुए कड़ा विरोध किया। 'सभ्य' समाज को डर सताने लगा कि अगर बच्चे खुद अपना जीवनसाथी चुनने लगे, तो संपत्ति का पारंपरिक बंटवारा बिखर जाएगा और परिवारों का अपनी संतानों पर से ही नियंत्रण खत्म हो जाएगा।
जब धोखेबाजों के जाल में फंसकर बंद हो गया ब्यूरो
दुनिया के पहले मैरिज ब्यूरो को भी उसी तरह की परेशानियां झेलनी पड़ी जैसा आमतौर पर किसी भी नए स्टार्टअप या इनोवेशन को झेलना पड़ता है। ये बात अलग है कि द हाउस ऑफ एड्रेस एंड एनकाउंटर इस चुनौती से पार ना पा सका।
दरअसल 17वीं सदी में पहचान पत्र या बैकग्राउंड वेरिफिकेशन का कोई तरीका नहीं था। इसका फायदा उठाकर कुछ चालबाजों की भीड़ भी झूठे दावों के साथ ब्यूरो में अपना रजिस्ट्रेशन करवाने लगी। ऐसे जालसाज खुद को अमीर लॉर्ड बताकर रजिस्टर में नाम लिखवाते और किसी धनी लड़की या विधवा से शादी करके उसकी जायदाद हड़प लेते।

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जब इस तरह के मामले बढ़ने और लोगों के बीच पहुंचने लगे तो 'द ऑफिस ऑफ एड्रेस एंड एनकाउंटर्स' की साख पर बुरी तरह से बट्टा लगा। कड़ा सामाजिक विरोध और चर्च का दबाव झेल रहे दुनिया के पहले मैरिज ब्यूरो के लिए धोखाधड़ी के ये बढ़ते मामले ताबूत में आखिरी कील साबित हुए। आखिरकार ना चाहते हुए भी हेनरी रॉबिन्सन को अपना यह दफ्तर कुछ सालों में ही बंद करना पड़ गया।
बंद होकर भी छेड़ दी क्रांति
हेनरी रॉबिन्सन ने 376 साल पहले जो रिश्तों के लिए जो क्रांतिकारी शुरुआत की थी उसने आगे चलकर एक बड़े व्यापार की शक्स अख्तियार कर ली। अखबारों में मैट्रिमोनियल कॉलम्स छपने लगे। इंटरनेट आया तो डेटिंग एप्स और मैट्रिमोनियल साइट्स की बाढ़ आ गई। इस क्रांति से दुनिया का कोई देश बच नहीं पाया। खुद भारत, जहां लोग मानते हैं कि जोड़ियां भगवान बनाता है आज इन डेटिंग एप्स और मैट्रिमोनिल साइट्स का बहुत बड़ा उपभोक्ता बन चुका है।
