हम में से शायद हर किसी को बचपन में पापा की डांट से डर लगता था। मां की एक आवाज पर हम दौड़े चले आते थे। उस समय हमें लगता था कि काश, मम्मी-पापा हमें थोड़ा और खुला छोड़ दें। जैसे-जैसे हम बड़े होते हैं, एक दिन अचानक महसूस होता है कि पापा अब डांटते नहीं हैं और मां फोन करने से पहले पूछती हैं - दो मिनट फ्री हो? बस, यही एहसास अंदर तक हिला देता है।
हाल ही में फेमस रैपर बादशाह ने भी इसी एहसास को बयां किया। एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि "अपने माता-पिता को बूढ़ा होते देखना बहुत दर्द देता है। यह एहसास डराने वाला है। कई बार तो मां फोन करती तो पहले पूछती है कि दो मिनट फ्री है तू?" उनकी यह बात लाखों लोगों के दिल को छू गई, क्योंकि लगभग हर वयस्क कभी न कभी इस दौर से गुजरता है।
क्यों होता है इतना दर्द?
मनोवैज्ञानिकों के मुताबिक, बचपन से ही हम अपने माता-पिता को मजबूत, आत्मविश्वासी और हर समस्या का हल निकालने वाले इंसान के रूप में देखते हैं। हमारे लिए वे सुरक्षा का दूसरा नाम होते हैं। लेकिन जब वही माता-पिता सलाह मांगने लगते हैं, थकने लगते हैं या हम पर निर्भर होने लगते हैं, तो हमारे भीतर कुछ बदलने लगता है। यह सिर्फ दुख नहीं होता। इसमें डर, अपराधबोध, प्यार और एक अनकहा शोक सब कुछ मिला होता है।
हम उस इंसान के लिए दुखी होते हैं, जो अभी हमारे सामने है
मनोवैज्ञानिक इस भावना को 'एंबिग्युअस लॉस' यानी अस्पष्ट शोक कहते हैं। इसका मतलब है कि जिस व्यक्ति के लिए आप दुख महसूस कर रहे हैं, वह अभी आपके सामने मौजूद है, लेकिन उसका एक रूप धीरे-धीरे बदल रहा है।
आपके पिता वही हैं, लेकिन अब पहले की तरह फुर्तीले नहीं हैं। मां वही हैं, लेकिन अब उन्हें चीजें याद रखने में पहले से ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है। यह बदलाव धीरे-धीरे होता है, इसलिए उसे स्वीकार करना और भी कठिन हो जाता है।
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डांट की याद क्यों आने लगती है?
दिलचस्प बात यह है कि बड़े होने पर हमें अपने माता-पिता की डांट भी याद आने लगती है। जिस डांट से कभी चिढ़ होती थी, वही बाद में प्यार की निशानी लगने लगती है।
दरअसल, हम अब महसूस करते हैं कि पिता की डांट इस बात का सबूत थी कि कोई हमें देख रहा है, हमारी चिंता करता है और हमारी जिंदगी में शामिल है। जब यह सब कम होने लगता है, तो हमें लगता है कि कुछ बहुत कीमती चीज धीरे-धीरे हाथ से फिसल रही है।
इस एहसास के साथ क्या करें?
सच तो यह है कि समय को रोका नहीं जा सकता। माता-पिता हमेशा वैसे नहीं रह सकते, जैसे वे हमारे बचपन में थे। लेकिन हम उनके साथ बिताए समय को जरूर बेहतर बना सकते हैं। उनके फोन का जवाब दें। उनके साथ बैठकर चाय पिएं। उनकी पुरानी कहानियां फिर से सुनें, भले ही वे आपको सौवीं बार सुना रहे हों। उनसे पूछें कि वे कैसा महसूस कर रहे हैं।
इस बात को कभी ना भूलें कि जिंदगी की सबसे बड़ी सच्चाइयों में से एक यह भी है कि माता-पिता का बूढ़ा होना तय है, लेकिन उनके साथ हमारे पास कितना समय है, यह कभी तय नहीं होता।
