बिहार का गया इन दिनों खूब चर्चा में है। दरअसल अभी श्राद्ध चल रहे हैं और इन दिनों लोग गया जाकर अपने पूर्वजों का श्राद्ध कर्म और पिंडदान करते हैं। वैसे गया की पहचान महज धार्मिक और ऐतिहासिक शहर भर की नहीं है। यहां की पहचान यहां का समृद्ध खान-पान भी है। तिल और गुड़ की खुशबू से सात्विक भोजन की सादगी तक, गया की रसोई में परंपरा और स्वाद का अनोखा मेल दिखाई देता है। यहां का खाना स्थानीय संस्कृति और सदियों पुरानी परंपराओं का हिस्सा है।
हथौड़ों की चोट से बनने वाले तिलकुट
गया का नाम आते ही सबसे पहले जिस मिठाई का ख्याल आता है, वह है तिलकुट। खासकर सर्दियों में इसकी मांग बढ़ जाती है। इसे भुने हुए तिल और चीनी या गुड़ से तैयार किया जाता है। इसकी खासियत इसे बनाने के पारंपरिक तरीके में भी है।
तिल और चाशनी को मिलाने के बाद इसे लगातार कूटा और फैलाया जाता है। कारीगरों की यही मेहनत तिलकुट को खास बनाती है। अच्छी तरह तैयार तिलकुट हल्का और खस्ता होता है और मुंह में रखते ही टूटने लगता है। गया के कई पुराने इलाकों में आज भी इसे पारंपरिक तरीके से तैयार करने वाले कारीगर मिल जाते हैं।
अनरसा और लाई भी हैं खास
अनरसा भी गया की पारंपरिक मिठाइयों में शामिल है। चावल, गुड़ और तिल से तैयार होने वाला अनरसा बाहर से कुरकुरा और अंदर से नरम होता है। कुछ जगहों पर इसमें मावे या दूसरी सामग्री की स्टफिंग भी की जाती है, जिससे इसका स्वाद और अलग हो जाता है।
इसके अलावा लाई भी यहां का लोकप्रिय पारंपरिक स्नैक है। रामदाना, मखाने या दूसरे अनाज और बीजों से बनने वाली लाई हल्की और कुरकुरी होती है। लंबे समय से यह स्थानीय खान-पान का हिस्सा रही है।
पितृपक्ष की सात्विक थाली
गया में पितृपक्ष के दौरान खान-पान की परंपरा का महत्व और बढ़ जाता है। इस दौरान श्रद्धालुओं और उनके साथ आने वाले परिवारों के लिए सादा और सात्विक भोजन तैयार किया जाता है। इसमें आमतौर पर अरवा चावल, दाल और मौसमी सब्जियों का इस्तेमाल होता है।
लहसुन और प्याज से परहेज इस भोजन की एक खास पहचान है। कद्दू, लौकी, अरबी और सूरन जैसी सब्जियां भी पारंपरिक भोजन का हिस्सा बनती हैं। भोजन को बहुत ज्यादा मसालेदार बनाने के बजाय सादा रखा जाता है। इसका एक फायदा यह है कि सफर और धार्मिक अनुष्ठानों के बीच हल्का भोजन पचने में अपेक्षाकृत आसान हो सकता है।
सादगी में छिपा स्वाद
इस भोजन में सेंधा नमक और देसी घी का इस्तेमाल भी कई घरों में किया जाता है। हालांकि सेंधा नमक को सामान्य नमक से ज्यादा स्वास्थ्यवर्धक मानने के दावे को लेकर सावधानी जरूरी है। दोनों में मुख्य रूप से सोडियम ही होता है, इसलिए मात्रा महत्वपूर्ण है। इसी तरह घी ऊर्जा और वसा का स्रोत है, लेकिन इसका सेवन भी संतुलित मात्रा में ही बेहतर माना जाता है।
गया के खान-पान की खूबसूरती यही है कि यहां मिठाइयों की समृद्ध परंपरा और सात्विक भोजन की सादगी दोनों साथ दिखाई देती हैं। तिलकुट और अनरसा कारीगरों के हुनर की कहानी कहते हैं, तो पितृपक्ष की थाली धार्मिक परंपरा और लोकल लाइफस्टाइल को सामने लाती है।
