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क्यों मेघालय के इस गांव में बच्चों के 'नहीं' रखे जाते नाम, मां बनाती है धुन वही बन जाती है पहचान

Meghalaya Whistling Village: यहां दिलचस्प बात यह है कि गांव में सैकड़ों लोग हैं, लेकिन किसी दो व्यक्तियों की धुन एक जैसी नहीं होती।

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भारत के इस गांव में नाम से नहीं, खास धुन से पुकारते हैं लोग (AI Image)

Meghalaya Whistling Village: किसी भी इंसान का पहला सामाजिक परिचय उसका नाम होता है। नाम से ही रिश्ते बनते हैं, दस्तावेज तैयार होते हैं और इतिहास लिखा जाता है। दुनिया की लगभग हर संस्कृति में नामकरण एक औपचारिक संस्कार है। कहीं धर्म इसका आधार बनता है, कहीं परिवार की परंपरा तो कहीं ज्योतिष। लेकिन भारत के उत्तर-पूर्व में एक छोटा सा गांव इस पूरी अवधारणा को उलट देता है।

मेघालय के ईस्ट खासी हिल्स जिले में बसा कोंगथोंग गांव अपने बच्चों का नाम किसी शब्द या अक्षर से नहीं रखता। यहां हर बच्चे की पहचान एक धुन होती है। यह धुन उसकी मां रचती है और वही धुन उसका नाम बन जाती है। इस परंपरा को 'जिंग्रवाई इआवबेई' कहा जाता है। जी हां, कोंगथोंग के लोगों के पास दो तरह की पहचान होती है। एक सामान्य नाम, जो सरकारी दस्तावेजों में दर्ज रहता है और दूसरा वही धुन जो उनकी मां बनाती है।

इस धुन के भी दो रूप होते हैं। छोटा सुर घर या आसपास के लोगों के बीच इस्तेमाल किया जाता है, जबकि लंबी धुन पहाड़ियों और खेतों के पार किसी को बुलाने के लिए गाई या सीटी में बजाई जाती है। दिलचस्प बात यह है कि गांव में सैकड़ों लोग हैं, लेकिन किसी दो व्यक्तियों की धुन एक जैसी नहीं होती।

इस परंपरा का एक और रोचक नियम है। यदि किसी व्यक्ति को उसकी धुन से बुलाया जाए, तो उसकी जगह कोई दूसरा जवाब नहीं देता। मान लीजिए किसी पुरुष को बुलाया गया है, तो उसकी पत्नी भी उसकी ओर से उत्तर नहीं देगी। यह धुन केवल उसी व्यक्ति की निजी पहचान मानी जाती है।

फोटो सोर्स - Incredible India

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आखिर एक धुन इंसान की पहचान कैसे बन जाती है? मनोविज्ञान क्या कहता है

मनोविज्ञान में एक अवधारणा है - ऑडिटरी मेमोरी यानी श्रवण स्मृति। इंसानी दिमाग केवल शब्दों के मुकाबले ध्वनियों, लय और सुरों को भी लंबे समय तक याद रखता है। यही वजह है कि कई बार बचपन की कोई लोरी या दशकों पुराना गीत सुनते ही हम अचानक अपने अतीत में पहुंच जाते हैं।

प्रसिद्ध न्यूरोसाइंटिस्ट ओलिवर सैक्स ने अपनी चर्चित पुस्तक Musicophilia: Tales of Music and the Brain में लिखा है कि संगीत मस्तिष्क के उन हिस्सों को सक्रिय करता है, जहां यादें, इमोशन्स और पहचान एक-दूसरे से जुड़ती हैं। कई ऐसे मरीज, जिन्हें अपने परिवार के लोगों के नाम याद नहीं रहते थे, वे पुराने गीतों और धुनों को पहचान लेते थे। सैक्स के अनुसार, संगीत स्मृति का सबसे गहरा माध्यम बन सकता है।

इसी बात को कनाडाई मनोवैज्ञानिक डैनियल लेविटिन अपनी किताब दिस इज योर ब्रेन ऑन म्युजिक (This Is Your Brain on Music) में और आगे बढ़ाते हैं। उनका कहना है कि जब कोई धुन बार-बार किसी खास व्यक्ति या अनुभव के साथ जुड़ती है, तो मस्तिष्क उस धुन और उस व्यक्ति के बीच एक पर्मानेंट न्यूरल एसोसिएशन बना लेता है। यही सिद्धांत कोंगथोंग के व्यावहार में दिखाई देता है।

यहां किसी व्यक्ति की धुन उसके जन्म के तुरंत बाद से ही लगातार दोहराई जाती है। मां उसे उसी धुन के साथ दुलारती है, परिवार उसी धुन से बुलाता है और गांव वाले भी उसी सुर में उसे पुकारते हैं। धीरे-धीरे वह धुन उस व्यक्ति के लिए उतनी ही निजी पहचान बन जाती है, जितना किसी दूसरे समाज में उसका नाम होता है।आधुनिक मनोविज्ञान की भाषा में कहें तो कोंगथोंग के लोग अपनी सामाजिक पहचान का बड़ा हिस्सा 'साउंड आइडेंटिटी' के रूप में जीते हैं।

(फोटो सोर्स: Wikipedia)

(फोटो सोर्स: Wikipedia)

आखिर क्यों नाम की जगह खास धुन से पुकारते हैं यहां के लोग?

आपके मन में ये सवाल आ रहा होगा कि आखिर ये लोग ऐसा क्यों करते हैं। आखिर क्यों नाम की जगह खास तरह की धुन या सीटी से लोगों को पुकारा जाता है। दरअसल इस परंपरा के पीछे भूगोल, संस्कृति और विश्वास, तीनों की भूमिका रही है।

शोधकर्ताओं ने पाया कि इसके पीछे सबसे व्यावहारिक कारण गांव की भौगोलिक बनावट है। कोंगथोंग चारों ओर से पहाड़ियों, गहरी घाटियों और घने जंगलों से घिरा हुआ है। पहले जब लोग दूर-दूर खेतों में काम करते थे, तब सामान्य आवाज इतनी दूर तक नहीं पहुंच पाती थी। इसके विपरीत, सीटी या सुर में गाई गई धुन हवा के साथ लंबी दूरी तक साफ सुनाई देती थी। यही वजह है कि गांव वालों ने हर व्यक्ति के लिए अलग-अलग धुनें विकसित कर लीं, ताकि दूर से भी किसी खास व्यक्ति को आसानी से बुलाया जा सके।

दूसरा ये कि खासी समुदाय की मान्यता है कि धुन से पुकारना मां और बच्चे के बीच का भावनात्मक रिश्ता है। शोधकर्ताओं की मानें तो इस धुन के जरिए समुदाय अपनी मातृवंशीय परंपरा और पूर्वज माताओं का सम्मान भी व्यक्त करता है। यानी यह वहां की सांस्कृतिक विरासत भी है।

कब से शुरू हुई ये परंपरा

कोंगथोंग में लोगों को धुन या सीटी से पुकारने की परंपरा आखिर कब शुरू हुई, इसका कोई लिखित ऐतिहासिक प्रमाण आज तक नहीं मिला है। यही वजह है कि इतिहासकार इसकी सटीक उम्र बताने से बचते हैं। हालांकि स्थानीय खासी समुदाय का मानना है कि यह परंपरा सदियों पुरानी है और पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक रूप से चली आ रही है। कुछ शोधकर्ता तो यह भी मानते हैं कि इसकी जड़ें संभवतः औपनिवेशिक काल से भी पहले की हैं।

इस परंपरा की उत्पत्ति को लेकर कई लोककथाएं भी प्रचलित हैं। राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता फिल्मकार ओइनाम डोरेन, जिन्होंने कोंगथोंग पर चर्चित डॉक्यूमेंट्री My Name is Eeooow बनाई, बताते हैं कि एक लोककथा के अनुसार कभी एक ग्रामीण हमलावरों से बचने के लिए पेड़ पर चढ़ गया। अगर वह अपने साथियों को नाम लेकर पुकारता, तो हमलावर भी सतर्क हो जाते। इसलिए उसने अपनी खास धुन बजाई, जिसे पहचानकर गांव वाले उसकी मदद के लिए पहुंच गए। यह कहानी भले ऐतिहासिक रूप से सिद्ध न हो, लेकिन बताती है कि यह परंपरा कभी जीवन बचाने का व्यावहारिक तरीका भी रही होगी।

भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय ने भी संसद में स्वीकार किया है कि कोंगथोंग की 'जिंग्रवाई इआवबेई' परंपरा देश की एक अनूठी सांस्कृतिक विरासत है। इसके संरक्षण के लिए ही CCRT ने My Name is Eeooow नाम से डॉक्यूमेंट्री भी तैयार करवाई थी। हालांकि अभी तक इस परंपरा को यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत (Intangible Cultural Heritage) सूची में शामिल नहीं किया गया है, लेकिन इसे वहां तक पहुंचाने की मांग वर्षों से उठती रही है।

Suneet Singh
सुनीत सिंहauthor

सुनीत सिंह टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में डिप्टी न्यूज एडिटर के रूप में कार्यरत हैं और लाइफस्टाइल सेक्शन में स्पेशल स्टोरीज प्रोजेक्ट का नेतृत्व कर रहे हैं। टीवी और डिजिटल पत्रकारिता में 13 वर्षों के अनुभव के साथ, सुनीत उन बहुमुखी पत्रकारों में शामिल हैं जिन्होंने न्यूजरूम और फील्ड—दोनों मोर्चों पर खुद को साबित किया है। माइक, कैमरा और एडिटिंग डेस्क तीनों से उनकी सहज जुगलबंदी ने उन्हें एक संतुलित और विश्वसनीय मीडिया प्रोफेशनल के रूप में स्थापित किया है। पिछले 10 वर्षों से सुनीत लाइफस्टाइल, लिटरेचर, सिनेमा और संस्कृति से जुड़ी गहन व विश्लेषणात्मक स्टोरीज लिखते रहे हैं और अबतक 12,000 से अधिक आर्टिकल पब्लिश कर चुके हैं। उनकी लेखन शैली गहराई, मौलिक दृष्टिकोण और रिसर्च-आधारित प्रस्तुति से पहचानी जाती है। वे विषयों की बारीकियों को पकड़कर उन्हें सरल, प्रभावी और पाठकों से जुड़ने वाली भाषा में ढालने में दक्ष हैं।

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