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Neurowellness: क्या है 'न्यूरोवेलनेस'? क्यों मॉडर्न लाइफस्टाइल में तेजी से ट्रेंड कर रहा है ये पुराना कॉन्सेप्ट

What is Neurowellness: भले ही कॉर्पोरेट वेलनेस की दुनिया में इसे न्यूरोवेलनेस जैसा मॉडर्न और चमकदार नाम दे दिया गया हो, लेकिन इसे पाने के तरीके बिल्कुल वही पुराने और आजमाए हुए हैं।

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क्या होता है न्यूरोवेलनेस, सुकून के लिए इसकी शरण में क्यों जा रहे लोग (Photo: iStock)

सुबह शाम जिम में वर्कआउट, स्ट्रिक्ट डाइट प्लान और रोजा के 10 हजार स्टेप्स का टारगेट..फिटनेस के इस दौर में हमने अपने शरीर को पटरी पर लाने की पूरी कोशिश कर ली है। लेकिन इन सबके बीच उस दिमाग का क्या, जो सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक और कई बार तो सपनों में भी लगातार दौड़ता रहता है?

आजकल लगभग हर दूसरे इंसान की एक ही शिकायत है कि रात भर सोया, फिर भी सुबह उठकर थकान महसूस हो रही है या फोन हाथ में न हो तब भी लगता है बज रहा है, काम पर ध्यान ही नहीं टिकता। अगर आपके साथ भी ऐसा हो रहा है, तो समझ लीजिए कि थकान शरीर की नहीं, आपके नर्वस सिस्टम और दिमाग की है।

वेलनेस की दुनिया में इसी मानसिक थकान और दिमाग के सुकून के लिए एक नया शब्द ट्रेंड कर रहा है- न्यूरोवेलनेस। क्या है यह बला, यह कितना काम का है और कैसे बिना एक रुपया खर्च किए आप अपने दिमाग को रीसेट कर सकते हैं? आइए इसे आसान और सीधी भाषा में समझते हैं।

न्यूरोवेलनेस क्या है? (What is Neurowellness)

चौंकिए मत, यह कोई नई बीमारी नहीं है और न ही डॉक्टर के पर्चे पर लिखी जाने वाली कोई दवा। सरल शब्दों में कहें तो न्यूरोवेलनेस आपकी उस सोच का नाम है, जो कहती है कि जैसे डोले-शोले और सिक्स पैक एब्स के लिए शरीर को ट्रेन करते हैं, वैसे ही दिमाग और नर्वस सिस्टम को भी शांति और न्यूट्रिशन की जरूरत होती है। इसका असली मकसद है-

- रात को चैन की और गहरी नींद आना।

- तनाव और गुस्से के बाद खुद को जल्दी शांत कर पाना।

- किसी एक काम पर बिना भटके ध्यान लगा पाना।

- अंदर से मानसिक रूप से तरोताजा महसूस करना।

दिमाग को दुरुस्त करने का तरीका है न्यूरोवेलनेस(Photo: iStock)

दिमाग को दुरुस्त करने का तरीका है न्यूरोवेलनेस(Photo: iStock)

क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स

क्लिनिकल साइकोलॉजी एक्सपर्ट डॉ. नमिता शर्मा कहती हैं कि आज की लाइफस्टाइल में हम दिमाग को सिर्फ बचा हुआ समय ही देते हैं। सुबह उठने से रात को सोने तक हमारा दिमाग दिन के करीब 16 घंटे लगातार अलग-अलग तरह की सूचनाएं निगल रहा है। परिणाम क्या होता है? बाहर से तो इंसान सब कुछ ठीक-ठाक कर रहा होता है, लेकिन अंदर से उसका दिमाग बिल्कुल खाली और थका हुआ महसूस करता है। यही वह मोड़ है जहाँ आपको न्यूरोवेलनेस की सबसे ज्यादा जरूरत होती है।

नर्वस सिस्टम रेगुलेशन

न्यूरोवेलनेस के साथ-साथ एक और भारी-भरकम शब्द बहुत सुनने में आता है- नर्वस सिस्टम रेगुलेशन। न्यूरोलॉजी एक्सपर्ट डॉ. राशिद सैफी इसे बहुत ही आसान भाषा में समझाते हैं। मान लीजिए रास्ते में अचानक आपके सामने एक आवारा कुत्ता भौंकने लगे। आपका दिल तेजी से धड़कने लगेगा, हाथ-पैर पैनिक होने लगेंगे। यह तनाव में शरीर की स्वाभाविक प्रतिक्रिया है, लेकिन जब कुत्ता दूर चला जाए, तो कुछ मिनटों बाद आपका दिल सामान्य रूप से धड़कने लगता है और आप शांत हो जाते हैं।

बस! तनाव के बाद शरीर और दिमाग का वापस अपनी सामान्य, शांत अवस्था में लौट आना ही नर्वस सिस्टम रेगुलेशन है। आज दिक्कत यह है कि कुत्ता तो सामने नहीं है, लेकिन मोबाइल की नोटिफिकेशन, रोज के अर्जेंट काम या भविष्य की चिंताएं हमारे दिमाग को 24 घंटे उसी खतरे वाली स्थिति में रखती हैं। हमारा नर्वस सिस्टम कभी शांत अवस्था में लौट ही नहीं पाता।

बहुत जरूरी है नर्वस सिस्टम को रेगुलेट करना (Photo: iStock)

बहुत जरूरी है नर्वस सिस्टम को रेगुलेट करना (Photo: iStock)

नाम नया, लेकिन नुस्खे वही दादी-नानी वाले

भले ही कॉर्पोरेट वेलनेस की दुनिया में इसे न्यूरोवेलनेस जैसा मॉडर्न और चमकदार नाम दे दिया गया हो, लेकिन इसे पाने के तरीके बिल्कुल वही पुराने और आजमाए हुए हैं। सदियों से हमारे यहां योग, प्राणायाम, श्वांस क्रिया, नंगे पैर घास पर चलना, हल्का संगीत सुनना और अपनों के साथ बैठकर चाय पीना सिखाया गया है।

फर्क सिर्फ इतना है कि पहले हम इसे 'मन की शांति' कहते थे और आज का साइंस इसे 'नर्वस सिस्टम को रिलैक्स करना' कहता है।आज लोग महंगे स्पा या बॉडी मसाज से ज्यादा मानसिक सुकून और अच्छी नींद की तलाश में भटक रहे हैं।

दिमाग को 'रीसेट' करने के 5 आसान और मुफ्त तरीके

अच्छी बात यह है कि न्यूरोवेलनेस के लिए आपको किसी महंगे गैजेट, ऐप या रिट्रीट सेंटर में जाने की बिल्कुल जरूरत नहीं है। इसकी शुरुआत आपकी रोजमर्रा की बहुत छोटी-छोटी आदतों से होती है:

1. नींद को दिन का 'बचा हुआ काम' न समझें

अक्सर हम दिनभर के सारे काम खत्म करने के बाद जो समय बचता है, उसमें सोते हैं। नींद को बैकअप प्लान नहीं, बल्कि अपनी प्राथमिकता बनाएं। रात को 7-8 घंटे की निर्बाध नींद दिमाग की सबसे बड़ी टॉनिक है।

2. वर्कआउट सिर्फ बॉडी के लिए नहीं, मूड के लिए करें

रोजाना 20-30 मिनट की वॉक, रनिंग या स्ट्रेचिंग कैलोरी बर्न करने के साथ ही दिमाग में फील गुड हार्मोंस रिलीज करती है, जिससे स्ट्रेस कम होता है।

लाइफस्टाल में शामल कर लें न्यूरोवेलनेस की आदत (Photo: iStock)

लाइफस्टाल में शामल कर लें न्यूरोवेलनेस की आदत (Photo: iStock)

3. थोड़ा 'बोर' होना भी सीखिए

हमारा दिमाग हर सेकंड नया मसाला ढूंढता है। रेड लाइट पर खड़े हैं तो फोन निकाल लिया, लिफ्ट का इंतजार कर रहे हैं तो रील स्क्रॉल कर ली। दिन में कम से कम 10 मिनट बिना किसी स्क्रीन, म्यूजिक या किसी तनाव के चुपचाप बैठना सीखें। दिमाग को थोड़ा बोर होने दीजिए, उसे आराम की बहुत जरूरत है।

4. किसी भी तरह के नशे से बचें

जब भी लगे कि दिमाग बहुत ज्यादा चल रहा है, 2 मिनट के लिए रुकें और लंबी-गहरी सांसें लें। धीमी और नियंत्रित सांस लेने से नर्वस सिस्टम को तुरंत सिग्नल जाता है कि सब ठीक है, कोई खतरा नहीं है। साथ ही ज्यादा शराब, सिगरेट और बहुत ज्यादा चाय-कॉफी से बचें।

5. बिना किसी मकसद के काम करें

आज हर काम का कोई न कोई नतीजा होना जरूरी कर दिया गया है। कभी-कभी बिना किसी मकसद के सिर्फ पेड़-पौधों को पानी दीजिए, पुरानी पसंदीदा किताबें पढ़िए, अपनी बालकनी में बैठिए या किसी पुराने दोस्त से फोन पर गपशप मारिए।

चलते-चलते...

बाजार आपको महंगे वॉच, स्ट्रेस ट्रैकिंग रिंग्स और महंगे माइंडफुलनेस कोर्सेस बेचेगा। हालांकि असली न्यूरोवेलनेस बहुत ही साधारण और सीधी है- रात को अच्छी नींद लीजिए, शरीर को थोड़ा चलाइए, स्क्रीन से समय-समय पर दूरी बनाइए और अपने मन को यह छूट दीजिए कि उसे हर वक्त कुछ न कुछ प्रोडक्टिव करने की जरूरत नहीं है।

कभी-कभी दिमाग के लिए सबसे बेहतर काम यही होता है कि उसे थोड़ी देर के लिए बिल्कुल कुछ भी न करने दिया जाए। न्यूरोवेलनेस ठीक यही काम करता है।

Suneet Singh
सुनीत सिंहauthor

सुनीत सिंह टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में डिप्टी न्यूज एडिटर के रूप में कार्यरत हैं और लाइफस्टाइल सेक्शन में स्पेशल स्टोरीज प्रोजेक्ट का नेतृत्व कर रहे हैं। टीवी और डिजिटल पत्रकारिता में 13 वर्षों के अनुभव के साथ, सुनीत उन बहुमुखी पत्रकारों में शामिल हैं जिन्होंने न्यूजरूम और फील्ड—दोनों मोर्चों पर खुद को साबित किया है। माइक, कैमरा और एडिटिंग डेस्क तीनों से उनकी सहज जुगलबंदी ने उन्हें एक संतुलित और विश्वसनीय मीडिया प्रोफेशनल के रूप में स्थापित किया है। पिछले 10 वर्षों से सुनीत लाइफस्टाइल, लिटरेचर, सिनेमा और संस्कृति से जुड़ी गहन व विश्लेषणात्मक स्टोरीज लिखते रहे हैं और अबतक 12,000 से अधिक आर्टिकल पब्लिश कर चुके हैं। उनकी लेखन शैली गहराई, मौलिक दृष्टिकोण और रिसर्च-आधारित प्रस्तुति से पहचानी जाती है। वे विषयों की बारीकियों को पकड़कर उन्हें सरल, प्रभावी और पाठकों से जुड़ने वाली भाषा में ढालने में दक्ष हैं।

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