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क्या है Shefali Jariwala के नाम में जरीवाला का मतलब, लोगों ने क्यों चुना यह सरनेम, जानें इस उपनाम का मुगल कनेक्शन

एक्ट्रेस शेफाली जरीवाला (Shefali Jariwala) का 42 साल की उम्र में दिल का दौरा पड़ने से निधन (Shefali Jariwala Death) हो गया है। कांटा लगा (Kaanta Laga Song) के रीमिक्स से फेमस होने वाली शेफाली के निधन के बाद बहुत से लोग इंटरनेट पर उनके सरनेम जरीवाला का मतलब ढूंढ़ रहे हैं।

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क्या है शेफाली जरीवाला के नाम में जरीवाला का मतलब (History and Origin of Jariwala Surname)

90 के दशक में रीमेक सॉन्ग कांटा लगा से रातों रात शोहरत पाने वालीं एक्ट्रेस शेफाली जरीवाला का निधन हो गया है। वह 42 साल की थीं। उनके मौत की वजह दिल का दौरा पड़ना बताया जा रहा है। हालांकि पुलिस जांच कर रही है। शेफाली जरीवाला कई फिल्मों और टीवी सीरियल्स में भी नजर आ चुकी थीं। जब कांटा लगा के रीमिक्स से शेफाली ने सुर्खियां बटोरीं तो उनका सरनेम बहुत से लोगों के लिए जिज्ञासा का विषय था। लोग सोचते थे कि ये जरीवाला कौन सी जाति होती है। ये सरनेम क्यों लगाते हैं लोग। आज जब शेफाली इस दुनिया को अलविदा कह गई हैं तो एक बार फिर से इंटरनेट पर उनके सरनेम को लेकर लोग कई तरह के सवालों के जवाब ढूंढ़ रहे हैं। आइए विस्तार से जानते हैं इस सरनेम से जुड़ी कुछ जरूरी बातें:

किस धर्म की थीं शेफाली जरीवाला

शेफाली जरीवाला को लेकर लोगों के मन में सवाल है कि क्या वह पारसी धर्म से हैं। तो ऐसे लोगों को हम बता दें कि शेफाली हिंदू धर्म से थीं। उनका अंतिम संस्कार भी हिंदू रीति रिवाजों से ही होगा। उनके पिता एक व्यापारी हैं और मां स्टेट बैंक ऑफ इंडिया से रिटायर हो चुकी हैं।

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Shefali Jariwala Death

क्या है जरीवाला का मतलब

जरीवाला के बारे में जानने से पहले हमें यह जानना होगा कि इसकी जड़ें गुजरात के पारंपरिक कारीगर वर्ग और विशेष रूप से ज़री शिल्प से जुड़ी हैं। अब आपके मन में सवाल उठ रहा होगा कि ये ज़री क्या होती है। तो पहले समझ लिजिए ज़री का मतलब:

क्या होता है ज़री?

ज़री एक विशेष प्रकार का धातु युक्त धागा होता है, जो आमतौर पर सोने या चांदी से बनाया जाता है। भारत में खासतौर पर लखनऊ, बनारस, सूरत और हैदराबाद जैसे शहरों में ज़री कढ़ाई की परंपरा सदियों पुरानी है। कपड़ों को शाही लुक देने के लिए जो चमकदार और महीन धागों से कढ़ाई की जाती है, वही ज़री कहलाती है। इस पारंपरिक कला में निपुण लोग ही 'जरीवाला' कहलाए।

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Zari

अब आते हैं जरीवाला पर। जरीवाला दो शब्दों से मिलकर बना है ‘ज़री’ और ‘वाला’। इस उपनाम की उत्पत्ति उन परिवारों से मानी जाती है जो पीढ़ियों से ज़री का काम करते आए। खासतौर पर गुजरात के सूरत शहर में, जो मुगल काल से ज़री के व्यापार और उत्पादन का बड़ा केंद्र रहा है, वहीं से इस उपनाम की पहचान शुरू हुई।

यह नाम न केवल पेशे की पहचान बन गया बल्कि एक समय में यह शिल्प भारत के विदेशी व्यापार का हिस्सा भी था। अरब देशों से लेकर यूरोप तक भारतीय ज़री की मांग थी। ऐसे में जरीवाला सरनेम वाले लोग समाज में सम्मानजनक शिल्पकार और व्यापारी माने जाते थे।

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Zari Designs

जरीवाला उपनाम की खास पहचान

जरीवाला उपनाम ने उन परिवारों को समाज में एक खास पहचान दी, जो अपनी मेहनत,क्रिएटिविटी और कलात्मकता के लिए जाने जाते थे। वे केवल कपड़ों को सजाने वाले नहीं थे, बल्कि संस्कृति को बुनने वाले थे। उनके बनाए कपड़े राजाओं, नवाबों, दुल्हनों से लेकर मंदिरों तक की शोभा बढ़ाते थे। अगर कहें कि ज़री की बुनाई में न केवल तकनीक बल्कि भावनाएं और परंपरा भी बुनी जाती थी, तो कहीं से गलत ना होगा।

अब क्या करते हैं जरीवाला

समय के साथ ज़री उद्योग में बदलाव आया। मशीनों के आने से पारंपरिक कारीगरों की मांग घटने लगी। बहुत से जरीवाला परिवारों ने अपने पुश्तैनी धंधे को छोड़ दिया और दूसरे व्यापार, शिक्षा, चिकित्सा या किसी और तरह का काम करने लगे। फिर भी जरीवाला सरनेम आज भी उनके पूर्वजों की कला और परंपरा की एक गौरवशाली याद बनकर जिंदा है।

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Zari Work

गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान और दिल्ली में रहने वाले जरीवाला परिवार आज भी इस उपनाम को गर्व से इस्तेमाल करते हैं। वहीं कुछ संस्थाएं और समाज संगठन आज भी इस उपनाम से जुड़ी विरासत को सहेजने का प्रयास कर रहे हैं।

..और अंत में

जरीवाला सरनेम एक शिल्प, परंपरा और विरासत का प्रतिनिधित्व करता है। यह केवल एक पेशा नहीं, बल्कि भारतीय कारीगरी की उस चमक का प्रतीक है जो समय की धूल में कहीं खोती जा रही है। ऐसे उपनाम हमें याद दिलाते हैं कि हर नाम के पीछे एक कहानी होती है। कभी धागों से बुनी हुई, तो कभी इतिहास की किताबों में दर्ज। जरीवाला भी ऐसी ही एक कहानी है..कला, श्रम और आत्मगौरव की।

Suneet Singh
सुनीत सिंहauthor

सुनीत सिंह टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में डिप्टी न्यूज एडिटर के रूप में कार्यरत हैं और लाइफस्टाइल सेक्शन में स्पेशल स्टोरीज प्रोजेक्ट का नेतृत्व कर रहे हैं। टीवी और डिजिटल पत्रकारिता में 13 वर्षों के अनुभव के साथ, सुनीत उन बहुमुखी पत्रकारों में शामिल हैं जिन्होंने न्यूजरूम और फील्ड—दोनों मोर्चों पर खुद को साबित किया है। माइक, कैमरा और एडिटिंग डेस्क तीनों से उनकी सहज जुगलबंदी ने उन्हें एक संतुलित और विश्वसनीय मीडिया प्रोफेशनल के रूप में स्थापित किया है। पिछले 10 वर्षों से सुनीत लाइफस्टाइल, लिटरेचर, सिनेमा और संस्कृति से जुड़ी गहन व विश्लेषणात्मक स्टोरीज लिखते रहे हैं और अबतक 12,000 से अधिक आर्टिकल पब्लिश कर चुके हैं। उनकी लेखन शैली गहराई, मौलिक दृष्टिकोण और रिसर्च-आधारित प्रस्तुति से पहचानी जाती है। वे विषयों की बारीकियों को पकड़कर उन्हें सरल, प्रभावी और पाठकों से जुड़ने वाली भाषा में ढालने में दक्ष हैं।

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