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Shayari on Men: लोग कहते हैं बदलता है जमाना सब को, मर्द वो हैं जो जमाने को बदल देते हैं.., पढ़ें मर्द पर शायरी

Shayari on Men in Hindi, Mard Par Shayari: आज अंतरराष्ट्रीय पुरुष दिवस है। पुरुष सिर्फ एक बेटा, पति, पिता या भाई नहीं होता। वह एक ऐसा इंसान भी है जो अपने परिवार के लिए हर दिन नई चुनौतियों से जूझता है। अपनी परेशानियों को दिल में दबाकर दूसरों के लिए हिम्मत बनता है। समाज उन्हें रोना मत और कमजोर मत बनो कहकर बांधता है, पर सच यह है कि पुरुष भी टूटते हैं, डरते हैं और सहारे की तलाश करते हैं।

Mard Shayari

International Men's Day 2025 पर पढ़ें मर्द पर शायरी (Photo: iStock)

Shayari on Men in Hindi: पुरुष..कहने को एक शब्द है, लेकिन इसके अंदर जिम्मेदारियों, संघर्षों और भावनाओं का पूरा संसार छिपा होता है। समाज अकसर पुरुषों को सिर्फ शक्तिशाली, कमाने वाले, निर्णय लेने वाले रूप में देखता है, लेकिन सच यह है कि पुरुष भी उतने ही संवेदनशील, भावनाओं से भरे और समझ की जरूरत रखने वाले होते हैं। उनकी मुस्कान के पीछे कई बार थकावट, उनकी चुप्पी के पीछे कई बार चिंता और उनके मजबूत कंधों पर कई अनकही जिम्मेदारियां होती हैं। मर्दों पर शायद उतना नहीं लिखा या कहा गया जितना स्त्रियों के लिए लिखा गया है। हालांकि बहुत से शायरों ने मर्द का इस्तेमाल तमाम तरह के जज्बात बयां करने के लिए इस्तेमाल जरूर किये हैं। आइए पढ़ते हैं मर्द शायरी:

1. लोग कहते हैं बदलता है ज़माना सब को

मर्द वो हैं जो ज़माने को बदल देते हैं

- अकबर इलाहाबादी

2. किस से अब आरज़ू-ए-वस्ल करें

इस ख़राबे में कोई मर्द कहाँ

- फ़हमीदा रियाज़

3. नाज़ क्या इस पे जो बदला है ज़माने ने तुम्हें

मर्द हैं वो जो ज़माने को बदल देते हैं

- अकबर इलाहाबादी

4. तमाम पैकर-ए-बदसूरती है मर्द की ज़ात

मुझे यक़ीं है ख़ुदा मर्द हो नहीं सकता

- फ़रहत एहसास

5.औरतें काम पे निकली थीं बदन घर रख कर

जिस्म ख़ाली जो नज़र आए तो मर्द आ बैठे

- फ़रहत एहसास

6. तुम भी आख़िर हो मर्द क्या जानो

एक औरत का दर्द क्या जानो

- सय्यदा अरशिया हक़

7. मुफ़लिसी सब बहार खोती है

मर्द का ए'तिबार खोती है

- वली दकनी

8.फूल की पत्ती से कट सकता है हीरे का जिगर

मर्द-ए-नादां पर कलाम-ए-नर्म-ओ-नाज़ुक बे-असर

- अल्लामा इक़बाल

9. हयात आज भी कनीज़ है हुज़ूर-ए-जब्र में

जो ज़िंदगी को जीत ले वो ज़िंदगी का मर्द है

- बशीर बद्र

10. ये लाश-ए-बे-कफ़न 'असद'-ए-ख़स्ता-जां की है

हक़ मग़फ़िरत करे अजब आज़ाद मर्द था

- मिर्ज़ा ग़ालिब

11. तू मर्द-ए-मोमिन है अपनी मंज़िल को आसमानों पे देख नादाँ

कि राह-ए-ज़ुल्मत में साथ देगा कोई चराग़-ए-अलील कब तक

- एहतिशामुल हक़ सिद्दीक़ी

12. पीर-ए-मुग़ां के पास वो दारू है जिस से 'ज़ौक़'

नामर्द मर्द मर्द-ए-जवां-मर्द हो गया

- शेख़ इब्राहीम ज़ौक़

13. 'अल्वी' ख़्वाहिश भी थी बाँझ

जज़्बा भी ना-मर्द मिला

- मोहम्मद अल्वी

14. बहती नहीं है मर्द की आँखों से जू-ए-अश्क

लेकिन हमें बताओ कि हम किस लिए हँसें

- ओवेस अहमद दौरां

15. ख़ुदी में डूबते हैं फिर उभर भी आते हैं

मगर ये हौसला-ए-मर्द-ए-हेच-कारा नहीं

- अल्लामा इकबाल

बतौर समाज हम सबको समझना चाहिए कि पुरुष सिर्फ एक बेटा, पति, पिता या भाई नहीं होता। वह एक ऐसा इंसान भी है जो अपने परिवार के लिए हर दिन नई चुनौतियों से जूझता है। अपनी परेशानियों को दिल में दबाकर दूसरों के लिए हिम्मत बनता है। समाज उन्हें रोना मत और कमजोर मत बनो कहकर बांधता है, पर सच यह है कि पुरुष भी टूटते हैं, डरते हैं और सहारे की तलाश करते हैं।

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Suneet Singh
Suneet Singh Author

सुनीत सिंह टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में डिप्टी न्यूज एडिटर के रूप में कार्यरत हैं और लाइफस्टाइल सेक्शन में स्पेशल स्टोरीज प्रोजेक्ट का नेतृत्व कर रहे ... और देखें

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