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Kargil Vijay Diwas: कारगिल के शहीदों के वो अधूरे खत, जो उनकी शहादत के बाद ही पढ़े जा सके

कुछ चिठ्ठियां ऐसी भी थीं जो कभी पोस्ट ही नहीं हो सकीं। सैनिकों के बैग, जैकेट या जेब से मिलीं। वो अधूरे खत थे। किसी खत पर स्याही फैल गई थी, तो किसी पर लिखने वाले के खून के धब्बे।

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कारगिल विजय दिवस 2026

साल था 1999। पड़ोसी मुल्क से आए दुश्मनों की आंखों में आंखे डाल भारतीय सैनिक उनकी इस हिमाकत का मुंहतोड़ जवाब दे रहे थे। कारगिल की शांत पहाड़ियों पर बिना रुके गोले-बारूद चल रहे थे। बम-बंदूक की उन्हीं तेज आवाजों के बीच कुछ सैनिकों की कलमें भी चल रही थीं। उन कलमों से लिखे जा रहे थे ऐसे खत, जिनमें जंग की रणनीति नहीं, घर की याद थी। उनमें दुश्मन का जिक्र कम और मां के हाथ के खाने, पत्नी की मुस्कान, पिता की उम्मीद और बच्चों के भविष्य की चिंता ज्यादा थी।

हर जंग के इतिहास में जीत और हार तो दर्ज होती है, लेकिन उन चिट्ठियों का इतिहास अकसर फुटनोट बनकर रह जाता है, जिन्हें सैनिकों ने आखिरी बार लिखा था। कुछ खत अपने घर तक पहुंच गए। कुछ डाक की थैलियों में ही रह गए। कुछ सैनिकों के सामान के साथ तब मिले, जब उनके शव तिरंगे में लिपटकर लौटे। कागज के यही वो टुकड़े हैं, जो बताते हैं कि जंग के मैदान में खड़ा सैनिक एक योद्धा होने के साथ ही किसी का बेटा, पति, पिता और भाई भी होता है।

भरोसे की स्याही से लिखे खत

कारगिल युद्ध के दौरान संचार के साधन आज जितने सुलभ नहीं थे। मोबाइल फोन आम नहीं थे। हमारे वीर जवान बस चिट्ठियों के जरिए ही अपनों से बात कर सकते थे। कई सैनिकों को यह भी नहीं पता होता था कि उनका लिखा खत परिवार तक कब पहुंचेगा। फिर भी वे लिखते थे, क्योंकि उन्हें भरोसा था कि शब्द शायद उनसे ज्यादा लंबा सफर तय कर सकते हैं।

इन चिट्ठियों की सबसे अलहदा बात ये होती थी इनमें कोई सैनिक खुद को नायक साबित करने की कोशिश नहीं करता। उल्टा, वह घरवालों को यह भरोसा दिलाता है कि सब ठीक है। जबकि उसे खुद मालूम होता है कि अगले कुछ घंटे उसकी जिंदगी का आखिरी अध्याय भी हो सकते हैं।

कुछ खत अधूरे ही रह गए..

कैप्टन विजयंत थापर का अपनी मां और पिता के नाम लिखा गया अंतिम खत आज भी पढ़ने वालों की आंखें नम कर देता है। उनके परिवार द्वारा सार्वजनिक की गई चिट्ठियों में जो लिखा था वो एक अपनी मिट्टी के लिए मर मिटने वाला कोई जांबाज ही लिख सकता है। उन्होंने लिखा था- जब यह चिट्ठी तुम्हारे हाथों में पहुंचेगा, तब मैं आसमान से तुम्हें देख रहा होऊंगा। मेरे लिए दुखी मत होना। इस बात पर गर्व करना कि मैंने देश के लिए अपना कर्तव्य निभाया।

इसी चिट्ठी में शहीद विजयंत थापर ने कश्मीर की एक बच्ची रुखसाना की पढ़ाई की जिम्मेदारी उठाने का अनुरोध भी अपने परिवार से किया था। इस चिट्ठी को समझेंगे तो पाएंगे कि ये किसी सैनिक बेटे का अपने परिवार के लिए अंतिम संदेश नहीं था। यह इंसानियत का ऐसा दस्तावेज था, जो युद्ध की क्रूरता के बीच भी करुणा को जिंदा रखता है।

कैप्टन मनोज कुमार पांडेय के बारे में उनके साथियों मे लोगों को बताया कि वो हमेशा घरवालों के लिए चिठ्ठियां लिखा करते थे। उन खतों में अपनी बहादुरी का नहीं, मां को चिंता न करने का बातें ज्यादा होती था। शायद हर सैनिक जानता है कि युद्ध का सबसे कठिन मोर्चा सीमा पर नहीं, घर के भीतर होता है, जहां उसका परिवार हर दिन अनिश्चितता से लड़ रहा होता है।

शहादत के बाद मिली कलेजे के टुकड़ों की चिठ्ठियां

कारगिल में शहीद हुए भारतीय सैनिकों के कई परिवार बताते हैं कि शहादत की खबर आने के कुछ दिन बाद तक डाकिये चिठ्ठियां लेकर आते रहे। वो खत ऐसे समय लिखे गए थे, जब लिखना वाला उनका बेटा जिंदा था, लेकिन जब वह पढ़ा गया, तब वह हमेशा के लिए जा चुका था। ऐसे खतों को पढ़ना किसी परिवार के लिए कितना मुश्किल रहा होगा इसका अंदाजा हम और आप नहीं लगा सकते। उन खतों के हर अक्षर में उन्हें अपने लाल की आवाज सुनाई देती होगी। खून खराबे के माहौल में लिखे वो खत आंसुओं से भीग जाते होंगे।

कुछ चिठ्ठियां ऐसी भी थीं जो कभी पोस्ट ही नहीं हो सकीं। सैनिकों के बैग, जैकेट या जेब से मिलीं। वो अधूरे खत थे। किसी खत पर स्याही फैल गई थी, तो किसी पर लिखने वाले के खून के धब्बे। कहीं बस 'प्यारी मां...' लिखकर कलम थम गई थी। यही अधूरी चिठ्ठियां इस बात की सबसे बड़ी गवाह हैं कि युद्ध किसी कहानी की तरह पूरा नहीं होता। वह कई पन्ने अधूरे छोड़ देता है।

युद्ध का कौन सा मनोविज्ञान समझाते हैं ये खत

युद्ध मनोविज्ञान पर काम करने वालों के कई शोध बताते हैं कि मोर्चे पर तैनात सैनिकों के लिए खत लिखना अपना मानसिक संतुलन बनाए रखने का एक तरीका होता है। जब सैनिक कागज पर घर की बातें लिखते हैं, तब वह कुछ देर के लिए युद्ध से बाहर निकल आते हैं। अपनों को लिखे ये खत उनके भीतर उम्मीद को जिंदा रखते हैं। शायद यही वजह है कि सबसे कठिन मोर्चों पर भी सैनिक समय निकालकर चिट्ठियां लिखते थे।

26 जुलाई को हमने दुश्मन की छाती पर तिरंगा गाड़ कारगिल का युद्ध जीत लिया। जंग खत्म होने के बाद सेना के सरकारी आंकड़े बताते हैं कि कौन-सी चोटी कब जीती गई, कितने सैनिक शहीद हुए और किस दिन ऑपरेशन पूरा हुआ। लेकिन ये चिठ्ठियां ही हैं जो बताती हैं कि उसी चोटी पर खड़ा जवान किसे याद कर रहा था, उसे अपने बच्चे की कौन सी बात याद आई थी और उसने आखिरी बार अपनी मां से क्या कहना चाहा था।

कारगिल विजय के बाद कई परिवारों ने इन खतों को फ्रेम करवाकर घर में रखा। कुछ ने उन्हें किताबों में संभाल लिया। कुछ अब भी पुराने बक्सों में तह करके रखते हैं। उनके लिए ये चिठ्ठियां इतनी बेशकीमती इसलिए हैं कि उनमें आखिरी बार उनके बेटे ने लिखा था- मैं जल्दी लौटूंगा, अपना ध्यान रखना। लौटना तो किस्मत में नहीं लिखा था, लेकिन अपनों से किया उनका वो वादा हमेशा के लिए उस खत में जिंदा रह गया।

आज कारगिल विजय दिवस पर जब हम देश के उन तमाम शहीदों को सलाम करें जिन्होंने भारतभूमि के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिये, तो उन खतों को भी एक बार जरूर याद करें। कारगिल में दुश्मनों पर फतह की कुछ कुर्बानियां उन चिट्ठियों में भी बसती है, जिनके आखिरी शब्द तक पहुंचने से पहले ही एहसास हो जाता है कि युद्ध जीतने वाले सैनिक अकसर अपनी निजी जिंदगी की सबसे बड़ी लड़ाई हार चुके थे। उन्होंने घर लौटने का सपना पीछे छोड़ दिया था। उनके नाम से उनके घर या तो तिरंगे में लिपटा उनका शव पहुंचा या फिर उनकी लिखी वही अधूरी चिठ्ठियां..

कारगिल में शहीद हुए देश के उन सारे सच्चे सपूतों को टाइम्स नाउ नवभारत सलाम करता है। जय हिंद।

Suneet Singh
सुनीत सिंहauthor

सुनीत सिंह टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में डिप्टी न्यूज एडिटर के रूप में कार्यरत हैं और लाइफस्टाइल सेक्शन में स्पेशल स्टोरीज प्रोजेक्ट का नेतृत्व कर रहे हैं। टीवी और डिजिटल पत्रकारिता में 13 वर्षों के अनुभव के साथ, सुनीत उन बहुमुखी पत्रकारों में शामिल हैं जिन्होंने न्यूजरूम और फील्ड—दोनों मोर्चों पर खुद को साबित किया है। माइक, कैमरा और एडिटिंग डेस्क तीनों से उनकी सहज जुगलबंदी ने उन्हें एक संतुलित और विश्वसनीय मीडिया प्रोफेशनल के रूप में स्थापित किया है। पिछले 10 वर्षों से सुनीत लाइफस्टाइल, लिटरेचर, सिनेमा और संस्कृति से जुड़ी गहन व विश्लेषणात्मक स्टोरीज लिखते रहे हैं और अबतक 12,000 से अधिक आर्टिकल पब्लिश कर चुके हैं। उनकी लेखन शैली गहराई, मौलिक दृष्टिकोण और रिसर्च-आधारित प्रस्तुति से पहचानी जाती है। वे विषयों की बारीकियों को पकड़कर उन्हें सरल, प्रभावी और पाठकों से जुड़ने वाली भाषा में ढालने में दक्ष हैं।

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