बारिश हो रही थी। मुंबई के शिवाजी पार्क के बाहर पुलिस की एक वैन धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी। भीतर वो छात्र थे जिन्हें प्रदर्शन के दौरान हिरासत में लिया गया था। तभी एक लड़की अचानक वैन के सामने आकर खड़ी हो गई। दोनों हाथ फैलाकर। बिना किसी हथियार के। बिना किसी राजनीतिक पद के। बिना इस भरोसे के कि अगले पल क्या होगा।
उस लड़की का नाम रिया अहिर है। वह न तो उस आंदोलन की नेता थी और न ही किसी छात्र संगठन की पदाधिकारी। लेकिन उस क्षण उसने सिर्फ एक सवाल पूछा- क्या नागरिक होने का मतलब केवल तमाशा देखना है? जब उसे संतोषजनक जवाब नहीं मिला, तो उसने रास्ता छोड़ने से इनकार कर दिया। कुछ देर के लिए एक युवती और राज्य की पूरी मशीनरी आमने-सामने खड़ी थी। यही तस्वीर कुछ ही घंटों में पूरे देश में प्रतिरोध की नई पहचान बन गई।
इसी तरह से दिल्ली के जंतर-मंतर पर भी छात्र आंदोलन की सबसे मजबूत तस्वीरें लड़कियों की हैं। वे नारे लगा रही हैं, लाठियां खा रही हैं, गिरफ्तारी दे रही हैं, पुलिस बैरिकेड्स के सामने बैठी हैं और अपने साथियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी हैं। यह महज़ संयोग नहीं है। भारतीय लोकतंत्र का इतिहास बताता है कि जब भी किसी जनआंदोलन को नैतिक ऊंचाई मिली है, उसकी पहली पंक्ति में ज्यादातर महिलाएं दिखाई दी हैं।
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प्रसिद्ध इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने इंडिया आफ्टर गांधी(India After Gandhi) में लिखा है कि आजाद भारत की सबसे बड़ी ताकत लोकतंत्र के साथ वे नागरिक भी रहे हैं जिन्होंने जरूरत पड़ने पर सत्ता से सवाल पूछने का साहस दिखाया। इस इतिहास को थोड़ा और ध्यान से पढ़िए तो एक और सच सामने आता है- इन सवालों की सबसे दृढ़ आवाज कई बार महिलाओं की रही है।
याद कीजिए दिसंबर 2019 का वह समय जब दिल्ली के शाहीन बाग में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के विरोध में धरना शुरू हुआ, तब किसी ने नहीं सोचा था कि वहां बैठी एक 80 से अधिक वर्ष की बुजुर्ग महिला दुनिया भर में प्रतिरोध का चेहरा बन जाएंगी। बिलकिस बानो, जिन्हें पूरा देश 'बिलकिस दादी' के नाम से जानने लगा, इस आंदोलन की एक बड़ी पहचान बन गईं। कड़ाके की ठंड, स्याह रात और दमन के डर के बावजूद वो रोज धरना स्थल पर पहुंचती रहीं।
2020 में टाइम मैगज़ीन ने उन्हें दुनिया के 100 सबसे प्रभावशाली लोगों की सूची में शामिल किया। उस समय लेखिका अरुंधति रॉय ने उनके बारे में लिखा था कि बिलकिस दादी ने यह साबित किया कि साधारण दिखने वाले लोग भी असाधारण लोकतांत्रिक हस्तक्षेप कर सकते हैं।
अब आप दिल्ली से हजारों मील दूर मणिपुर चलिए। साल 2000 में मणिपुर के मालोम में सुरक्षा बलों की कार्रवाई में दस नागरिकों की मौत के बाद एक लड़की ने फैसला किया कि वह तब तक अन्न ग्रहण नहीं करेगी, जब तक सशस्त्र बल (विशेष अधिकार) अधिनियम (AFSPA) हटाया नहीं जाता। उस लड़की का नाम था इरोम शर्मिला। उनका अनशन करीब 16 साल चला, जिसे दुनिया के सबसे लंबे लोकतांत्रिक भूख आंदोलनों में गिना जाता है। सरकार ने उन्हें आत्महत्या की कोशिश के आरोप में हिरासत में रखा और नाक के जरिए भोजन दिया जाता रहा, लेकिन उन्होंने अपना प्रतिरोध नहीं छोड़ा।
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इसी तरह से 1980 के दशक में मेधा पाटकर ने विकास और विस्थापन की बहस को राष्ट्रीय विमर्श का अहम मुद्दा बना दिया था। नर्मदा बचाओ आंदोलन के दौरान उन्होंने हजारों आदिवासी, किसान और ग्रामीण परिवारों की आवाज बनकर यह सवाल उठाया कि क्या विकास की कीमत हमेशा गरीबों को ही चुकानी चाहिए?
मेधा पाटकर ने अपने संघर्ष से विकास की उस सोच को चुनौती दी जिसमें आंकड़े तो दिखाई देते हैं, लेकिन इंसान नहीं। उन्होंने सत्याग्रह और जनसंगठन को अपना हथियार बनाया और देश को सिखाया कि लोकतंत्र में सवाल पूछना भी राष्ट्रनिर्माण का हिस्सा है।

जब बेटियों ने डर की लक्ष्मण रेखा लांघ खींच दी साहस की लकीर
जब भी जन आंदोलन में महिला प्रतिरोध की बात हो, तो वो तब तक पूरी नहीं हो सकती जब तक गौरा देवी का नाम लिया जाए। वो गौरा देवी जिनके लिए जंगल पहाड़ की महिलाओं का मायका था। इसीलिए जब चमोली जिले के रैणी गांव के जंगल में पेड़ों पर कुल्हाड़ियां चलीं तो वो आगे बढ़ीं और सीना ठोकर कर कहा- पहले मुझे काटो फिर पेड़ काटना।
समाजशास्त्री घनश्याम शाह अपनी चर्चित पुस्तक सोशल मूवमेंट्स इन इंडिया (Social Movements in India) में लिखते हैं कि किसी भी आंदोलन की असल ताकत उसकी सामाजिक मान्यता और नैतिक विश्वसनीयता में होती है। शायद यही वजह है कि जब-जब देश की बेटियों ने किसी आंदोलन को अपने प्रतिरोध से संवारा, उसने निर्णायक रुख ले लिया।
दिल्ली समेत देशभर के दूसरे हिस्सों में आज जो छात्राएं धरने पर बैठी हैं, वे शायद खुद को गौरा देवी, मेधा पाटकर या इरोम शर्मिला सरीखे प्रतिरोध और हिम्मत का हिस्सा ना मानती हों, लेकिन इतिहास हमेशा बाद में लिखा जाता है। आगे जब भी भारत में जन आंदोलनों का इतिहास लिखा जाएगा तो भारत की उन बेटियों का नाम जरूर सुनहरे अक्षरों में लिखा जाएगा।
