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सच या सिर्फ दिमाग का वहम? हार्वर्ड एक्सपर्ट से जानिए कैसे हमारी मान्यताएं तय करती हैं हमारी हकीकत

हार्वर्ड से शिक्षित मनोचिकित्सक डॉ. कविता सन का मानना है कि हर इंसान अपनी एक अलग हकीकत गढ़ता है और इसी हकीकत को आकार देने में सबसे बड़ी भूमिका निभाती हैं हमारी बुनियादी मान्यताएं

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क्या हकीकत जैसा कुछ नहीं होता? (Photo: iStock)

हम सब बचपन से यही मानते आए हैं कि दुनिया वैसी ही है जैसी हमें दिखती है। जो हम सुनते हैं, देखते हैं या महसूस करते हैं, वही सच्चाई या वास्तविकता है। लेकिन क्या हो अगर आपसे कहा जाए कि आपकी दुनिया की सच्चाई आपकी अपनी ही सोच और मान्यताओं का एक भ्रम मात्र है?

हार्वर्ड से शिक्षित मनोचिकित्सक डॉ. कविता सन का मानना है कि ऑब्जेक्चिव रियालिटी जैसा कुछ नहीं होता। हर इंसान अपनी एक अलग हकीकत गढ़ता है और इसी हकीकत को आकार देने में सबसे बड़ी भूमिका निभाती हैं हमारी बुनियादी मान्यताएं (Core Beliefs)।

क्या होती हैं 'कोर बिलीव्स' और ये कैसे बनती हैं?

डॉ. कविता सन कहती हैं कि कोर बिलीव्स वे गहरे विचार और विश्वास हैं जो हम अपने बचपन के अनुभवों, माता-पिता के व्यवहार, समाज और जीवन की शुरुआती घटनाओं से अनजाने में बना लेते हैं। ये मान्यताएं हमारेसब कॉन्शियस माइंड में इतनी गहरी बैठी होती हैं कि हम बिना सवाल किए इन्हें ही अंतिम सच मान लेते हैं।

हमारा दिमाग कैसे रचता है हमारी अपनी रियलिटी?

डॉ. कविता सन बताती हैं कि हमारी कोर बिलीव्स हमारे दिमाग के लिए एक फिल्टर या चश्मे की तरह काम करती हैं। हमारा दिमाग हर सेकंड लाखों जानकारियों में से केवल उन्हीं बातों को चुनता है और सच मानता है, जो हमारी पहले से बनी मान्यताओं से मेल खाती हैं। इसे मनोविज्ञान में 'कन्फर्मेशन बायस'कहा जाता है।

एक ही स्थिति, दो अलग दुनिया

मान लीजिए दो लोग एक पार्टी में जाते हैं। पहला व्यक्ति, जिसकी कोर बिलीव है कि लोग मुझे पसंद करते हैं, वह किसी अनजान व्यक्ति की मुस्कान को गर्मजोशी समझेगा। वहीं दूसरा व्यक्ति, जिसकी कोर बिलीव है कि मैं हर जगह अजीब लगता हूं, वह उसी मुस्कान को अपना मजाक उड़ाना मान लेगा। परिस्थिति एक ही थी, लेकिन दोनों के लिए 'वास्तविकता' बिल्कुल अलग बन गई।

कोर बिलीव्स का मानसिक स्वास्थ्य पर असर

मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि जब हमारी बुनियादी मान्यताएं नकारात्मक होती हैं, तो यह चिंता, तनाव और अवसाद का कारण बनती हैं। हम असल दुनिया से नहीं, अपने दिमाग द्वारा रचे गए डर और आशंकाओं से लड़ रहे होते हैं।

अपनी 'रियलिटी' को बेहतर कैसे बनाएं?

एकस्पर्ट्स के मुताबिक अच्छी खबर यह है कि हम अपनी मान्यताओं के गुलाम नहीं हैं। न्युरोप्लास्टिसिटी के कारण हमारा दिमाग पुरानी मान्यताओं को बदलकर नई आदतें सीख सकता है। जब भी कोई नकारात्मक विचार आए, खुद से पूछें- क्या यह सच है या यह सिर्फ मेरी सोच का एक नजरिया है? अपने दिमाग के डर को बिना सबूत के स्वीकार न करें। समझें कि सामने वाला व्यक्ति भी अपनी ही मान्यताओं और अनुभवों के चश्मे से दुनिया को देख रहा है।

डॉ. कविता कहती हैं कि दुनिया वैसी नहीं है जैसी वह है, बल्कि दुनिया वैसी है जैसे हम हैं। जिस दिन आप अपनी गहरी मान्यताओं को पहचानकर उन्हें बदलना शुरू कर देते हैं, उसी दिन से आपकी दुनिया और आपकी 'वास्तविकता' भी बदलने लगती है।

Suneet Singh
सुनीत सिंहauthor

सुनीत सिंह टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में डिप्टी न्यूज एडिटर के रूप में कार्यरत हैं और लाइफस्टाइल सेक्शन में स्पेशल स्टोरीज प्रोजेक्ट का नेतृत्व कर रहे हैं। टीवी और डिजिटल पत्रकारिता में 13 वर्षों के अनुभव के साथ, सुनीत उन बहुमुखी पत्रकारों में शामिल हैं जिन्होंने न्यूजरूम और फील्ड—दोनों मोर्चों पर खुद को साबित किया है। माइक, कैमरा और एडिटिंग डेस्क तीनों से उनकी सहज जुगलबंदी ने उन्हें एक संतुलित और विश्वसनीय मीडिया प्रोफेशनल के रूप में स्थापित किया है। पिछले 10 वर्षों से सुनीत लाइफस्टाइल, लिटरेचर, सिनेमा और संस्कृति से जुड़ी गहन व विश्लेषणात्मक स्टोरीज लिखते रहे हैं और अबतक 12,000 से अधिक आर्टिकल पब्लिश कर चुके हैं। उनकी लेखन शैली गहराई, मौलिक दृष्टिकोण और रिसर्च-आधारित प्रस्तुति से पहचानी जाती है। वे विषयों की बारीकियों को पकड़कर उन्हें सरल, प्रभावी और पाठकों से जुड़ने वाली भाषा में ढालने में दक्ष हैं।

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