लाइफस्टाइल

कंकाल और कद्दू से कहीं आगे है हेलोवीन की कहानी, जानिए पितृपक्ष और Halloween में क्या है कॉमन

Happy Halloween 2026: हैलोवीन का नाम अंग्रेजी के ऑल हैलोज ईव से निकला है। इसका मतलब है ऑल सेंट्स डे यानी सभी संतों के दिन से ठीक पहले की शाम।

Image

हौलोवीन और पितृपक्ष में क्या है कॉमन?

Halloween 2026: अजीब से कपड़े, डरावने मुखौटे, कद्दू पर बनी आंखें और बच्चों का घर-घर जाकर मिठाई मांगना...हैलोवीन का नाम सुनते ही आंखों के पहले कुछ ऐसी ही तस्वीर उभरकर आती है। हर साल 31 अक्टूबर को मनाया जाने वाला यह विदेशी फेस्टिवल दुनिया के कई देशों में खूब पॉपुलर है। भारत में भी स्कूल, क्लब, रेस्तरां और पार्टियों में इसकी धूम दिखाई देने लगी है।

वैसे आपको शायद ही पता हो कि जिस हैलोवीन को आज हम मस्ती और डरावने खेलों से जोड़कर देखते हैं, उसकी जडें हजारों साल पुरानी एक ऐसी परंपरा से जुड़ी हैं, जिसमें मृत लोगों और पूर्वजों को याद किया जाता था। दिलचस्प बात यह है कि इस परंपरा का एक भाव भारत के पितृपक्ष से भी मिलता-जुलता है।

क्या है हैलोवीन और क्यों मनाया जाता है यह त्योहार?

हैलोवीन का नाम अंग्रेजी के ऑल हैलोज ईव से निकला है। इसका मतलब है ऑल सेंट्स डे यानी सभी संतों के दिन से ठीक पहले की शाम। पश्चिमी ईसाई परंपरा में 1 नवंबर को ऑल सेंट्स डे और 2 नवंबर को ऑल सोल्स डे मनाया जाता है। इन दिनों में संतों और दिवंगत लोगों को याद किया जाता है।

दुनिया के कई देशों में मनाया जाता है हैलोवीन (Photo: iStock)

दुनिया के कई देशों में मनाया जाता है हैलोवीन (Photo: iStock)

वैसे हैलोवीन की कहानी ईसाई परंपरा से भी पुरानी है। लोग इसका संबंध प्राचीन सेल्टिक त्योहार ‘साम्हेन’ से भी बताते हैं। साम्हेन फसल के मौसम के खत्म होने और सर्दियों की शुरुआत से जुड़ा था। पुराने समय में आयरलैंड, स्कॉटलैंड और यूरोप के कुछ दूसरे हिस्सों में रहने वाले सेल्टिक समुदाय इसे मनाते थे।

क्या था सेल्टिक त्योहार साम्हेन?

सेल्टिक समुदायों के लिए साम्हेन साल के सबसे अहम मौकों में से एक हुआ करता था। यह 31 अक्टूबर की शाम से शुरू होकर 1 नवंबर तक मनाया जाता था। खेती-किसानी पर निर्भर लोगों के लिए यह फसल समेटने और सर्दियों की तैयारी का समय था। पशुओं को सुरक्षित जगहों पर लाया जाता था और आने वाले ठंडे मौसम के लिए इंतजाम किए जाते थे।

सेल्टिक लोककथाओं में ऐसा भी माना जाता था कि इस समय जीवित लोगों और आत्माओं की दुनिया के बीच की दूरी कम हो जाती है। यानी मृत लोगों की आत्माएं इस दौरान अपने परिवारों और पुरानी जगहों के आसपास लौट सकती हैं। यह एक धार्मिक-सांस्कृतिक मान्यता थी, कोई प्रमाणित घटना नहीं।

सेल्टिक समुदाय का पर्व था साम्हेन (Photo: iStock)

सेल्टिक समुदाय का पर्व था साम्हेन (Photo: iStock)

इसी विश्वास के कारण लोग अलाव जलाते थे, दावतें करते थे और कुछ जगहों पर मृत परिजनों के लिए भोजन भी रखते थे। माना जाता था कि ऐसा करने से आत्माओं का सम्मान होगा और बुरी शक्तियों से बचाव भी मिलेगा।

साम्हेन से कैसे बना आज का हैलोवीन?

समय के साथ साम्हेन की परंपराओं का मेल ईसाई धार्मिक आयोजनों से होने लगा। पश्चिमी ईसाई परंपरा में 1 नवंबर को ऑल सेंट्स डे मनाया जाने लगा। इससे एक शाम पहले का दिन ऑल हैलोज ईव कहलाया, जो आगे चलकर हैलोवीन के नाम से मशहूर हुआ।

इसके बाद इस त्योहार में कई तरह की परंपराएं जुड़ती चली गईं। आयरलैंड और स्कॉटलैंड के लोग जब 19वीं सदी में बड़ी संख्या में अमेरिका पहुंचे, तो वे अपने साथ हैलोवीन से जुड़ी रस्में भी ले गए। अमेरिका में इन परंपराओं का नया रूप बना। धीरे-धीरे यह त्योहार पार्टियों, बच्चों के खेल, मिठाइयों और डरावने कॉस्ट्यूम का उत्सव बन गया।

साम्हेन से जुड़ा हैलोवीन(Photo: iStock)

साम्हेन से जुड़ा हैलोवीन(Photo: iStock)

डरावने कपड़े पहनने और मुखौटे लगाने की परंपरा क्यों शुरू हुई?

आज लोग हैलोवीन पर भूत, चुड़ैल, कंकाल, वैम्पायर और दूसरे डरावने किरदारों के कपड़े पहनते हैं। इसकी एक पुरानी वजह है। साम्हेन से जुड़ी मान्यताओं के अनुसार, इस समय आत्माएं और दूसरी अलौकिक शक्तियां धरती पर आ सकती हैं। उनसे बचने के लिए लोग मुखौटे और भेष बदलने वाले कपड़े पहनते हैं। कुछ मान्यताओं में ऐसा माना जाता है कि इस तरह वे आत्माओं के बीच घुल-मिल सकते हैं और उनकी नजरों से बच सकते हैं।

समय के साथ यह परंपरा डर से निकलकर मनोरंजन का हिस्सा बन गई। अब लोग अपनी पसंद के किरदारों की तरह सजते हैं और कॉस्ट्यूम प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेते हैं।

कद्दू पर डरावना चेहरा बनाने की कहानी

हैलोवीन से जुड़ी सबसे पॉपुलर चीज है कद्दू से बना लालटेन, जिसे जैक ओ लैंटर्न कहा जाता है। इसके अंदर मोमबत्ती या रोशनी रखी जाती है और बाहर डरावना चेहरा बनाया जाता है।

दिलचस्प बात यह है कि शुरुआत में कद्दू नहीं, बल्कि शलजम जैसी जड़ वाली सब्जियों को खोखला करके उनमें चेहरे बनाए जाते थे। आयरलैंड के लोग इन लालटेनों का इस्तेमाल करते थे। जब वे अमेरिका पहुंचे, तो वहां कद्दू आसानी से उपलब्ध था और उसे काटना भी आसान था। इस तरह कद्दू हैलोवीन के साथ जुड़ गया।

ट्रिक ऑर ट्रीट (Photo: iStock)

ट्रिक ऑर ट्रीट (Photo: iStock)

क्या है ट्रिक ऑर ट्रीट की परंपरा?

हैलोवीन पर बच्चे डरावने या मजेदार कपड़े पहनकर आसपास के घरों में जाते हैं और मिठाइयां मांगते हैं। इसे ट्रिक ऑर ट्रीट कहा जाता है। इसका मतलब है कि मिठाई दो, वरना कोई शरारत हो सकती है।

पहले आयरलैंड और स्कॉटलैंड में लोग भेष बदलकर घर-घर जाते थे। वे गाना गाते, कोई खेल दिखाते या मनोरंजन करते और बदले में खाना या मिठाई लेते थे। कुछ परंपराओं में मृत लोगों की आत्माओं के लिए प्रार्थना करने के बदले सोल केक दिए जाते थे। समय के साथ यह रस्म बच्चों के मिठाई मांगने वाले खेल में बदल गई।

पितृपक्ष और हैलोवीन में क्या है कॉमन?

आपको जानकर हैरानी होगी कि हैलोवीन का कनेक्शन भारतीय संस्कृति के पितृपक्ष से भी है। दरअसल इन दोनों ही मौकों पर अपने मृत परिजनों को याद किया जाता है और सम्मान दिया जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार पितृपक्ष में परिवार अपने दिवंगत पूर्वजों के प्रति सम्मान जताते हैं। इस दौरान लोग श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान जैसे कर्म करते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इन रस्मों के जरिए पितरों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जाती है और उनकी शांति की कामना की जाती है।

पितरों को याद करने का दिन है पितृपक्ष (Photo: iStock)

पितरों को याद करने का दिन है पितृपक्ष (Photo: iStock)

वहीं, साम्हेन में भी मृत परिजनों की याद और आत्माओं से जुड़ी मान्यताएं महत्वपूर्ण थीं। कुछ समुदायों में मृत लोगों के लिए भोजन रखा जाता था और परिवार के साथ दावत की जाती थी। दोनों परंपराओं में यह विचार दिखाई देता है कि इंसान का रिश्ता अपने पूर्वजों से मृत्यु के बाद भी सांस्कृतिक और भावनात्मक रूप से बना रहता है।

दोनों में कुछ असमानताएं भी हैं। पितृपक्ष की तिथियां चंद्र पंचांग से तय होती हैं। साम्हेन सेल्टिक समुदायों का मौसमी त्योहार था, जो फसल और सर्दियों के आगमन से जुड़ा था। इसकी मान्यताएं, रीति-रिवाज और कैलेंडर अलग हैं।

Suneet Singh
सुनीत सिंहauthor

सुनीत सिंह टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में डिप्टी न्यूज एडिटर के रूप में कार्यरत हैं और लाइफस्टाइल सेक्शन में स्पेशल स्टोरीज प्रोजेक्ट का नेतृत्व कर रहे हैं। टीवी और डिजिटल पत्रकारिता में 13 वर्षों के अनुभव के साथ, सुनीत उन बहुमुखी पत्रकारों में शामिल हैं जिन्होंने न्यूजरूम और फील्ड—दोनों मोर्चों पर खुद को साबित किया है। माइक, कैमरा और एडिटिंग डेस्क तीनों से उनकी सहज जुगलबंदी ने उन्हें एक संतुलित और विश्वसनीय मीडिया प्रोफेशनल के रूप में स्थापित किया है। पिछले 10 वर्षों से सुनीत लाइफस्टाइल, लिटरेचर, सिनेमा और संस्कृति से जुड़ी गहन व विश्लेषणात्मक स्टोरीज लिखते रहे हैं और अबतक 12,000 से अधिक आर्टिकल पब्लिश कर चुके हैं। उनकी लेखन शैली गहराई, मौलिक दृष्टिकोण और रिसर्च-आधारित प्रस्तुति से पहचानी जाती है। वे विषयों की बारीकियों को पकड़कर उन्हें सरल, प्रभावी और पाठकों से जुड़ने वाली भाषा में ढालने में दक्ष हैं।

और पढ़ें
End of Article