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तपती गर्मी का सदियों पुराना साथी है शरबत, फारस से भारत तक कैसे पहुंचा शरबत का स्वाद

History Of Sharbat: जेठ के महीने में जब सूरज आग बरसा रहा होता है, तब एक गिलास ठंडा शरबत प्यास बुझाने के साथ ही शरीर को राहत और दिल को तसल्ली भी देता है। शा

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शरबता का इतिहास

History Of Sharbat: शरबत..यह नाम जुबां पर आते ही मानों चिलचिलाती गर्मी में बारिश की नर्फ फुहारें नसीब हो गई हों। दरअसल शरबत उस मिठास का नाम है जो तपती दोपहर में गले से उतरते ही मन तक ठंडक पहुंचा देती है। मिट्टी के घड़े का ठंडा पानी, गुलाब की खुशबू, खस की हरियाली, बेल की सोंधी महक या आम का खट्टा-मीठा स्वाद..हर शरबत अपने आप में अमृत समान है।

बचपन की गर्मियों में दादी के हाथ का बेल का शरबत, आंगन में रखे मटके का पानी और मेहमानों के स्वागत में परोसा गया गुलाब शरबत आज भी मन में ताजगी भर देता है। गुलाब का शरबत मानो फूलों की नरम खुशबू को घोलकर तैयार किया गया हो। वहीं खस का शरबत रेगिस्तान में चलती ठंडी हवा का एहसास कराता है। आम पन्ना अपनी हल्की खटास के साथ गर्मी की थकान चुरा लेता है, जबकि बेल का शरबत शरीर और मन दोनों को सुकून देता है।

शरबत की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह मौसम के साथ इंसान का रिश्ता जोड़ता है। जेठ के महीने में जब सूरज आग बरसा रहा होता है, तब एक गिलास ठंडा शरबत प्यास बुझाने के साथ ही शरीर को राहत और दिल को तसल्ली भी देता है। शायद यही वजह है कि शरबत सदियों से भारतीय रसोई और मेहमाननवाजी का हिस्सा बना हुआ है।

गर्मियों का अमृत है शरबत (Photo: iStock)

गर्मियों का अमृत है शरबत (Photo: iStock)

लेकिन क्या आप जानते हैं कि गर्मियों के मौसम का अमृत कहे जाने वाले इस शरबत का इतिहास क्या है। कैसे ये हिंदुस्तानी परंपरा और भारतीय रसोई का अहम हिस्सा बन गया। ये जानने के लिए हमें इतिहास में झांकना होगा। इसका इतिहास भी करीब 1000 साल पुराना है।

क्या है शरबत का इतिहास

इतिहास के पन्नों में शरबत का सबसे पुराना उल्लेख 12वीं शताब्दी की फारसी किताब "ज़खीरये ख्वारज्मशाही" में मिलता है। इसके लेखक इस्माइल गोरगानी ने उस दौर में ईरान में प्रचलित शरबतों के बारे में तसल्ली से लिखा है। उन्होंने बताया है कि तरह-तरह के अनूठी तासीर वाले शरबत उस समय लोगों की जिंदगी का हिस्सा हुआ करती थी।

रमजान के महीने में मुसलमान रोजा भी शरबत पीकर ही खोला करते थे। इस्लामिक देशों में शरबत के लोकप्रिय होने का एक कारण ये भी है कि वहां शराब पर पाबंदी है। रोचक बात ये है कि शराब और शरबत दोनों ही अरबी भाषा के शब्द शरीबा से बने हैं।

अजरबैजान में हमेशा से पानी के सबसे ज्यादा पीया जाने वाला पेय पदार्थ शरबत है। वहां के लोग इसे अनार, खुबानी, क्वींस, संतरा या चेरी जैसे फलों से बनाते थे। समय के साथ गुलाब की पत्तियों, तुलसी, पुदीना, केसर, समक, इलायची, अजवाइन और धनिया तक से बनाया जाने लगा।

एक ही शब्द से निकले हैं शराब और शरबत (Photo: iStock)

एक ही शब्द से निकले हैं शराब और शरबत (Photo: iStock)

फारस से भारत कैसे पहुंचा शरबत

भारतीय उपमहाद्वीप में शरबत की असली रौनक मुगल काल के साथ आई। कहा जाता है कि मुगल सम्राट बाबर को शरबत बेहद प्रिय था। बाबरनामा में इसका कई जगह पर जिक्र है। गर्म मौसम में ठंडक पाने के लिए बाबर हिमालय से बर्फ मंगवाता था और उसी बर्फ से शरबत तैयार करवाता था। कल्पना कीजिए, सदियों पहले जब न फ्रिज थे और न आधुनिक सुविधाएं, तब पहाड़ों की बर्फ और फलों की मिठास मिलकर शाही दरबारों में ठंडक घोलती थी।

बाद में सम्राट जहांगीर ने भी इस परंपरा को आगे बढ़ाया। उन्हें विशेष रूप से फालूदा शरबत बेहद पसंद था। मुगलिया दरबार में फुक्का नाम के शरबत की भी खूब धूम थी। यह खास शरबत जौ के रस से बनाया जाता था। यही वह दौर था जब शरबत प्यास बुझाने का साधन से आगे निकल शाही जीवनशैली, कला और मेहमाननवाजी का अहम हिस्सा बन गया।

मुगलों से पहले भी हिंदुस्तानी पीते थे शरबत

हालांकि ये कहना गलत होगा कि भारत में मुगलों के आने से पहले शरबत का चलन नहीं था। मुगल काल से पहले भी भारत में पनका नाम का खास शरबत बनाया जाता था। दक्षिण भारत में, खासतौर पर तमिलनाडु और केरल में आज भी यह शरबत पीया जाता है।

मशहूर फूड हिस्टोरियन सलमा यूसुफ हुसैन ने अपनी किताब 50 Great Recipes- Sharbat में बताया है कि वेदिक काल में गन्ने या गुड़ से बने शरबत पीये जाते थे। दक्षिण भारत में, इमली और आंवला को इलायची, अदरक और तरह तरह के साइट्रस फलों के साथ मिलाकर शरबत बनाना और पीना आम था।

भारत में वैदिक काल से था शरबत का चलन

भारत में वैदिक काल से था शरबत का चलन

बकौल सलमा यूसुफ हुसैन 200 ईसा पूर्व में शरबत हकीमों द्वारा औषधि के तौर पर बनाया जाता था। कई प्राचीन आयुर्वेदिक किताबों में इसका प्रमाण भी मौजूद है। इन किताबों में लिखा गया है कि खट्टे जामुन और शहतूत के शरबत को अपनी खांसी ठीक करने के लिए पी सकते हैं और नाशपाती का शरबत जिगर के स्वास्थ्य में सुधार के लिए। कुछ मसालों के साथ गन्ने का रस पित्त रोगों के इलाज के लिए उपयोग किया जाता था।

हां ये जरूर है कि मुगलों के आने के बाद कई तरह के नए शर्बतों से हिंदुस्तान का राबता हुआ। मुगलिया पाक कला ने शर्बतों को गुलाब, केवड़ा, पान और यहां तक कि कई तरह की जड़ी-बूटियों और खुशबूदार मसालों के साथ उसे स्वाद के एक अलग स्तर पर ले गए।

गर्मी में अमृत समान है शरबत

आज भारतीयों की जिंदगी में शरबत कई तरह के स्वाद में घुल चुका है। रूह अफजा और गुलाब शरबत सबसे ज्यादा पसंद किए जाने वाले शर्बतों में शामिल हैं। इसके अलावा खस का शरबत अपनी ठंडी तासीर के लिए मशहूर है। बेल का शरबत गर्मियों में शरीर को ठंडक देने और पाचन को बेहतर बनाने के लिए पिया जाता है। कच्चे आम, नींबू और सत्तू का शरबत उत्तर भारत में बेहद लोकप्रिय हैं, जबकि कोकम शरबत पश्चिमी भारत, खासकर महाराष्ट्र और गोवा में खूब पसंद किया जाता है। दक्षिण भारत में नन्नारी शरबत लगभग हर घर में पसंद किया जाता है।

गर्मी की दोपहर जब धरती तवे की तरह तपने लगती है, हवाएं अंगारों का एहसास कराती हैं और शरीर पसीने से तर हो जाता है, तब एक गिलास ठंडा शरबत किसी राहत भरी बारिश जैसा महसूस होता है। शरबत की एक घूंट गर्मी से थके शरीर और मन को जो सुकून देती है वो शब्दों में बयां मुश्किल है।

सदियों पुराना स्वाद आज भी है बरकरार (Photo: iStock)

सदियों पुराना स्वाद आज भी है बरकरार (Photo: iStock)

अपने स्वाद और गुणों के कारण ही शरबत गर्मियों का अमृत कहलाता है। सन् 1813 में मशहूर अंग्रेज कवि लॉर्ड बायरन ने शरबत की शान में लिखा था- "मुझे सूरज दे दो, चाहे वह कितना भी तपता हुआ क्यों न हो, और शरबत दे दो, चाहे वह कितना भी ठंडा क्यों न हो। मेरा जीवन आसानी से स्वर्ग बन जाएगा।"

लॉर्ड बायरन की ही तरह हिंदुस्तान समेत दक्षिण और मध्य एशिया के करोड़ों लोगों के लिए शरबत सदियों से गर्मी में स्वाद और सेहत का पर्याय बना हुआ है।

Suneet Singh
सुनीत सिंहauthor

सुनीत सिंह टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में डिप्टी न्यूज एडिटर के रूप में कार्यरत हैं और लाइफस्टाइल सेक्शन में स्पेशल स्टोरीज प्रोजेक्ट का नेतृत्व कर रहे हैं। टीवी और डिजिटल पत्रकारिता में 13 वर्षों के अनुभव के साथ, सुनीत उन बहुमुखी पत्रकारों में शामिल हैं जिन्होंने न्यूजरूम और फील्ड—दोनों मोर्चों पर खुद को साबित किया है। माइक, कैमरा और एडिटिंग डेस्क तीनों से उनकी सहज जुगलबंदी ने उन्हें एक संतुलित और विश्वसनीय मीडिया प्रोफेशनल के रूप में स्थापित किया है। पिछले 10 वर्षों से सुनीत लाइफस्टाइल, लिटरेचर, सिनेमा और संस्कृति से जुड़ी गहन व विश्लेषणात्मक स्टोरीज लिखते रहे हैं और अबतक 12,000 से अधिक आर्टिकल पब्लिश कर चुके हैं। उनकी लेखन शैली गहराई, मौलिक दृष्टिकोण और रिसर्च-आधारित प्रस्तुति से पहचानी जाती है। वे विषयों की बारीकियों को पकड़कर उन्हें सरल, प्रभावी और पाठकों से जुड़ने वाली भाषा में ढालने में दक्ष हैं।

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