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कहानी पिनकोड की, कैसे 6 अंकों का यह खास PIN Code बन गया हमारा पता

आज विश्व डाक दिवस (World Post Day) है। इस खास दिन पर आइए समझने की कोशिश करते हैं कि बिना कंप्यूटर और इंटरनेट के दौर में गढ़े गए इन 6 अंकों ने कैसे पूरे भारत के भूगोल को एक सूत्र में पिरो दिया।

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कैसे 6 अंकों का एक कोड बन गया हमारे घर का पता (AI Generated and Newsroom Verified Image)

मान लिजिए कि आप लद्दाख की बर्फीली वादियों में बैठे हैं और आपको तमिलनाडु के एक छोटे से गांव में अपने किसी दोस्त को कोई पार्सल या चिट्ठी भेजनी है। दोनों राज्यों की भाषाएं अलग हैं, बोलियां अलग हैं, यहां तक कि लिखने की लिपि भी पूरी तरह जुदा है। गूगल मैप भी कई बार गांव की गलियों में जाकर हाथ खड़े कर देता है। बावजूद इसके आपका पार्सल बिना किसी रुकावट, आपके दोस्त के दरवाजे तक पहुंच जाता है। इसके पीछे छिपा है 6 डिजिट का एक बेहद सीधा-सादा नंबर, जिसे हम सब पिनकोड (PIN Code) कहते हैं।

आज विश्व डाक दिवस है। इस खास दिन पर आइए समझने की कोशिश करते हैं कि बिना कंप्यूटर और इंटरनेट के दौर में गढ़े गए इन 6 अंकों ने कैसे पूरे भारत के भूगोल को एक सूत्र में पिरो दिया।

जब घूम जाता था डाकियों का सिर

भारत यूं तो विविधताओं का देश है, लेकिन आज भी यहां दर्जनों गांवों के एक से नाम हैं। इसे यूं समझें रामपुर उत्तर प्रदेश का एक मशहूर जिला है। इसके साथ ही पूरे उत्तर प्रदेश में रामपुर नाम से ना जाने कितने गांव हैं। यही हाल सुल्तानपुर, फतेहपुर और सीतापुर का भी है। ये तो महज छोटा सा उदाहरण हैं, देशभर में इस तरह के ना जाने कितने ही गांव-कस्बे हैं जिनके नाम एक से हैं।

जब देश आजाद हुआ तो लोग काम धंधे की तलाश में अपने घर से दूर-दूर तक निकले। इससे चिट्ठियों का चलन भी तेजी से बढ़ा। ऐसे में अगर किसी ने सिर्फ रामपुर लिखकर चिट्ठी पोस्ट कर दी, तो डाक विभाग के कर्मचारी चक्कर में पड़ जाते थे कि इसे कौन से रामपुर भेजें।

एक से नाम और अलग-अलग भाषा देख उलझ जाता था डाक विभाग

एक से नाम और अलग-अलग भाषा देख उलझ जाता था डाक विभाग

दूसरी सबसे बड़ी समस्या थी लिपि। अगर दक्षिण भारत से किसी ने तमिल या तेलुगु भाषा में पता लिखा है, तो उत्तर भारत के सॉर्टिंग ऑफिस में बैठा डाकिया उसे पढ़ ही नहीं पाता था। नतीजतन, लाखों-करोड़ों चिट्ठियां महीनों तक अटका करती थीं और कई बार रद्दी के ढेर में दम तोड़ देती थीं। देश को एक ऐसे सिस्टम की जरूरत थी जो भाषा, लिखावट और नामों के कंफ्यूजन से पूरी तरह परे हो।

वो नायक जिसने भारत को दिया पिन कोड

इस जटिल समस्या का हल निकाला भारतीय डाक व तार विभाग के तत्कालीन अतिरिक्त सचिव श्रीराम भीकाजी वेलणकर ने। वेलणकर साहब कुशल प्रशासनिक अधिकारी होने के साथ ही संस्कृत के एक प्रकांड विद्वान और नाटककार भी थे। उन्हें बहुत जल्दी समझ आ गया था कि भारत जैसे विशाल और विविध देश में शब्दों और भाषाओं के भरोसे काम नहीं चल सकता। अगर पते को सुगम बनाना है, तो हमें अंकों की शरण में जाना होगा, क्योंकि गणित की भाषा पूरे देश के लिए एक जैसी होती है।

बिना किसी कंप्यूटर या डिजिटल डेटाबेस के, केवल नक्शों और रजिस्टरों के दम पर वेलणकर ने पूरे भारत को भौगोलिक आधार पर 6 डिजिट के कोड में विभाजित कर दिया। भारत की आजादी की 25वीं सालगिरह के दिन 15 अगस्त 1972 को इस पिनकोड व्यवस्था को आधिकारिक रूप से देशभर नमें लागू कर दिया गया।

कड़ी मशक्कत के बाद तैयार हुआ था पिनकोड

कड़ी मशक्कत के बाद तैयार हुआ था पिनकोड

कैसे काम करता है पिनकोड

पिनकोड कुछ 6 अंकों का होता है। पिनकोड का हर एक अंक अपने अंदर भारत के भूगोल का एक नक्शा समेटे हुए है। इसे बहुत ही वैज्ञानिक और लॉजिकल तरीके से डिजाइन किया गया था:

पहला अंक (रीजन/जोन): यह अंक भारत के बड़े हिस्से (जोन) को दर्शाता है। पूरे देश को 9 जोन में बांटा गया। 1 से 8 तक राज्यों के लिए हैं और 9वां अंक विशेष रूप से सेना की डाक सेवा यानी आर्मी पोस्टल सर्विस के लिए सुरक्षित है।

दूसरा अंक (सब-रीजन): यह उस जोन के अंदर के पड़ने वाले राज्य या केंद्र शासित प्रदेश को तय करता है।

तीसरा अंक (जिला): यह अंक उस राज्य के भीतर के मुख्य जिले या सॉर्टिंग हब को चिन्हित करता है, जहां सभी चिट्ठियां जमा होकर छांटी जाती हैं।

आखिरी के तीन अंक (001 से 999): यह उस जिले के उस खास डिलीवरी पोस्ट ऑफिस का नंबर होता है, जिसके क्षेत्र में आपका घर आता है।

पिनकोड के लिए पूरे देश को 9 जोन में बांटा गया था।

पिनकोड के लिए पूरे देश को 9 जोन में बांटा गया था।

एक आसान उदाहरण से समझें:

मान लीजिए दिल्ली के कनॉट प्लेस का पिनकोड 110001 है।

1 - उत्तरी भारत (जोन)

11 - दिल्ली राज्य

110 - दिल्ली सॉर्टिंग जिला

001 - कनॉट प्लेस का मुख्य डाकघर

जैसे ही डाकिया पिनकोड के शुरुआती तीन अंक देखता है, वह समझ जाता है कि थैले को किस ट्रेन या फ्लाइट से किस शहर भेजना है। भाषा पढ़ने की जरूरत ही खत्म।

चिट्ठी के दौर से ई-कॉमर्स की रीढ़ बनने तक

आज के दौर में भले ही हाथ से लिखी चिट्ठियों और पीले लिफाफों की जगह वॉट्सऐप और ईमेल ने ले ली हो, लेकिन क्या पिनकोड की अहमियत कम हुई है? इसका जवाब है नहीं..बिल्कुल नहीं। आज भी इन पिन कोड्स की सार्थकता बनी हुई है।

आज जब आप Amazon या Flipkart जैसे किसी ई-कॉमर्स वेबसाइट से कोई चीज मंगवाते हैं, तो इनका पूरा लॉजिस्टिक्स और डिलीवरी नेटवर्क इसी 54 साल पुराने पिनकोड के ढांचे पर नाचता है। आपका पिनकोड डालते ही सिस्टम तय कर लेता है कि वहां सामान डिलीवरी के लिए उपलब्ध है या नहीं।

इसके अलावा अब भारत सरकार इस 6 अंकों के पिनकोड को और सटीक बनाते हुए DIGIPIN (डिजिटल पिन) जैसी नई तकनीकों पर काम कर रही है, जो जीपीएस ग्रिड के जरिए आपके घर के सटीक दरवाजे की लोकेशन बताएगी। इस नए विजन की नींव भी वेलणकर साहब के इसी पिनकोड पर टिकी है।

कम नहीं हुई पिनकोड की वैल्यू (Photo: iStock)

कम नहीं हुई पिनकोड की वैल्यू (Photo: iStock)

एक खास कोड, जो बन गया हमारा पता

इंसान का घर महज ईंटों और गारे से नहीं बनता, वह बनता है उस पते से जहां उसकी यादें बसती हैं। भारत जैसे विशाल देश में 6 अंकों का यह पिनकोड हर भारतीय के घर, उसकी जड़ों और गांव की सोंधी माटी का एक अदृश्य धागा है। इसीलिए तो किसी अजनबी शहर में बैठा कोई इंसान जब किसी फॉर्म में अपने गांव का पिनकोड भरता है, तो एक लम्हे के लिए वक्त ठहर जाता है। उस 6 डिजिट के नंबर को लिखते ही उसे अपनी वही धूल भरी गलियां, नीम की छांव, पीपल का चौपाल और अपनों का बेसाख्ता प्यार याद आ जाता है।

जमाना बदल गया। पीली चिट्ठियों की जगह वॉट्सऐप ने ले ली और डाकिया दादा की आहट धूमिल होती गई। लेकिन आज भी, बिना भटके, बिना किसी भाषा की शर्त के, दूर-दराज के आखरी दरवाजे तक प्यार और अपनों का पैगाम पहुंचाने वाला यह 6 डिजिट का फॉर्मूला जस का तस खड़ा है। तकनीक कितनी भी हाईटेक क्यों न हो जाए, पर दिल के पते को ढूंढ़ निकालने वाली यह 6 अंकों की व्यवस्था भारतीय दूरदर्शिता और हमारे इंसानी जुड़ाव की सबसे खूबसूरत मिसाल है।

Suneet Singh
सुनीत सिंहauthor

सुनीत सिंह टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में डिप्टी न्यूज एडिटर के रूप में कार्यरत हैं और लाइफस्टाइल सेक्शन में स्पेशल स्टोरीज प्रोजेक्ट का नेतृत्व कर रहे हैं। टीवी और डिजिटल पत्रकारिता में 13 वर्षों के अनुभव के साथ, सुनीत उन बहुमुखी पत्रकारों में शामिल हैं जिन्होंने न्यूजरूम और फील्ड—दोनों मोर्चों पर खुद को साबित किया है। माइक, कैमरा और एडिटिंग डेस्क तीनों से उनकी सहज जुगलबंदी ने उन्हें एक संतुलित और विश्वसनीय मीडिया प्रोफेशनल के रूप में स्थापित किया है। पिछले 10 वर्षों से सुनीत लाइफस्टाइल, लिटरेचर, सिनेमा और संस्कृति से जुड़ी गहन व विश्लेषणात्मक स्टोरीज लिखते रहे हैं और अबतक 12,000 से अधिक आर्टिकल पब्लिश कर चुके हैं। उनकी लेखन शैली गहराई, मौलिक दृष्टिकोण और रिसर्च-आधारित प्रस्तुति से पहचानी जाती है। वे विषयों की बारीकियों को पकड़कर उन्हें सरल, प्रभावी और पाठकों से जुड़ने वाली भाषा में ढालने में दक्ष हैं।

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