लाइफस्टाइल

पैकेट में मिल रही चूल्हे की राख, हैरान करेगी उपले-दातुन की कीमत- ऑनलाइन की दुनिया में देसी चीजों के क्यों आसमानी हुए भाव

कभी ऑनलाइन शॉपिंग में क्या आपका भी सामना किसी ऐसी देसी चीज से हुआ है जिसकी कीमत आपको हैरान कर गई हो। राख, उपले, दातुन जैसे कितने ही फ्री वाले आइटम अब ऑनलाइन मुनाफे वाली डील बन चुके हैं। ये देसी के कूल होने का सबूत है या बस एक ट्रेंड भर है। क्या ये चीजें वापस हमारे लाइफस्टाइल में आ गई हैं। जानें क्यों ऑनलाइन ये चक दे इंडिया वाला मूमेंट चल रहा है।

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ऑनलाइन की दुनिया में देसी चीजों के क्यों आसमानी हुए भाव (Pic: Canva)

हमारे जिन पाठकों का जन्म 80 या 90 के दशक में हुआ है, उन्होंने अपनी दादी-नानी को राख से बर्तन साफ करते जरूर देखा होगा। डिश वॉशर, डिश सोप, चकाचक सफाई करने वाले लिक्विड से इतर एक वक्त वो भी था, जब घर के बर्तन राख से चमकाए जाते थे। चूल्हे से बची राख का घर में ये प्रयोग बढ़िया हुआ करता था। लेकिन यहां राख की बात इसलिए हो रही है क्योंकि हाल ही में एक ऑनलाइन शॉपिंग वेबसाइट की सेल में मुझे वुडएश (WoodAsh) नाम का प्रोडक्ट कुछ डिस्काउंट पर मिलता हुआ नजर आया। प्रोडक्ट पेज पर जाने पर समझ आया कि बढ़िया पैकेजिंग में राख बेची जा रही है।

राख ही नहीं, और भी देसी चीजों की हुई ब्रैंडिंग

वैसे राख जैसा झटका उपले और नीम के दातुन भी दे चुके हैं। 25 दातुन का पैकेट आपको 150 से 200 रुपये के बीच ऑनलाइन मिलता है। बर्तन धोने के लिए अगर आपको राख चाहिए तो केमिकल फ्री राख का आधा किलो का पैक आपको 200 रुपये के करीब में घर पर डिलीवर किया जाएगा। ऐसा ही हाल उपलो का भी है। शरीर रगड़ने वाली सूखी तोरई का, जिसे नेचुरल लूफा के नाम पर आपको बेचा जा रहा है। आप देसी से देसी चीज का नाम लेते जाएं और ऑनलाइन खरीदने की सर्च में एक नहीं, बीसियों ऑप्शन आपके पास हैं। डिजिटल एरा में भी इन चीजों की ऐसी डिमांड और सप्लाई आखिर मामला क्या है।

दिल अभी भी देसी है

डिजिटल मार्केटिंग की दुनिया को करीब से देखने वाले अभिषेक पांडे एक ही लाइन में इस बात को समझाते हैं - हाथ में लेटेस्ट मोबाइल हुआ तो क्या लेकिन दिल तो अभी भी देसी ही है। अभिषेक का कहना है कि फिलहाल जो जेनरेशन कमाने वाले लोगों की लाइन में है, उन्होंने अपनी जीवन में एक बड़ा ट्रांसिजशन देखा है। इसलिए भले ही वो हर समय इंटरनेट पर रहते हैं लेकिन जमीनी जड़ों से वो दूर नहीं हैं। वो अभी भी बेसिक चीजों से, अपने कल्चर से जुड़े रहना चाहते हैं। लेकिन महानगरों के विस्तार से देसी सामान दुकानों पर खोजना मुश्किल हो जाता है। जब ऑनलाइन बाजार ने इस जरूरत को समझा तो अब एक से एक चीज डिमांड के मुताबिक कंज्यूमर्स के हाथ में मौजूद है।

क्या है इस ट्रेंड की वजह

जड़ों से जुड़ाव को कुछ नए शब्दों मसलन सस्टेनेबल, इको-फ्रेंडली, विरासत, पुराने भारत की खुशबू ने अब कूल बना दिया है। अगर आप इनको खरीदते हैं तो अचानक ही आप अवेयर्ड कैटिगरी में शामिल हो जाते हैं। देसी परंपराओं को ग्लैमराइज करना हमेशा ही हिट फॉर्मुला रहा है। देसी को कूल बनाने का यह प्रोसेस धीरे से लाइफस्टाइल का हिस्सा बन जाता है। कहने की जरूरत नहीं कि पुरानी मिट्टी से जुड़ाव की भावना को अगर आप इन प्रोडक्ट्स के जरिए व्यक्त करते हैं तो बिना बड़ी गाड़ी के भी अपने सर्कल में सेंटर ऑफ अट्रैक्शन बन जाते हैं।

सजगता भी है एक वजह

ऊपर की बात को एक और रूप दे सकते हैं - अवेयरनेस यानी सजगता का। देसी चीजों की ऑनलाइन उपलब्धता की एक वजह लोगों की जागरूकता भी है। जैसे कि राख के उपयोग को कभी यह कहकर खारिज कर दिया गया था कि इससे बर्तन ठीक से साफ नहीं होते और कीटाणु रह जाते हैं। लेकिन अब पर्यावरण सजगता के दौर में यही राख जब प्रदूषण कम करती है, तो वापस ट्रेंड में आकर कूल हो गई है। दातुन करेंगे तो प्लास्टिक वाले ब्रश का कचरा नहीं होगा -जैसे तमाम तर्क अब पुरानी चीजों का सुनहरा दौर वापस लेकर आ रहे हैं।

मगर महंगा बहुत है

पहले क्या अभी भी, छोटे शहरों में नाम का दातुन अगर आप 200 रुपये में खरीदेंगे तो या आप धन्ना सेठ कहलाएंगे या फिर लोग आपको यही समझाएंगे कि आप ठगे गए। बाजू में लगा नीम का पेड़ आपको फ्री में ही ढेरों दातुन दे सकता है। लेकिन गुरुग्राम या नोएडा की सोसाइटी में रहेंगे, 12-14 घंटे पर बाद घर घुसेंगे या फिर वर्क फ्रॉम होम में लैपटॉप से सिर नहीं उठा पाएंगे तो दातुन ढूंढेंगे कहां। इसलिए ऑनलाइन सेवा हाजिर है मगर इसकी भी कीमत है। जो चीजें आपको पहले एक तरह मुफ्त में मिलती थीं, वहीं अब 200 से 500 रुपये का खर्च बन चुकी हैं। सॉफ्टवेयर इंजीनियर गरिमा सिंह ने बताया कि वो चेहरे पर फिटकरी यूज करती हैं। उनके घर में इसका उपयोग उनके बचपन से रहा है। पहले जो थोड़ी सी चीज 5-10 रुपये में मिल जाती थी, अब वो बल्क में लेनी पड़ती है और कई गुना कीमत पर। यानी सामान लेने का कंफर्ट तो है लेकिन जेब थोड़ा अनकंफर्टेबल होती है।

अभिषेक समझाते हैं कि पहले पंसारी की छोटी दुकान पर ये चीजें आप पैदल चलकर या साइकिल से जाते थे। अब आपके पास 24 से 48 घंटे में आमतौर पर ये चीजें दरवाजे पर पहुंच जाती हैं। तो सामान में डिलीवरी, पैकेजिंग की कीमत तो जुड़ेगी ही। लेकिन फिर भी ये खरीदी जा रही हैं क्योंकि आज के कस्टमर की डिमांड ही ऐसी है।

सोशल मीडिया ने भी संवारा खेल

सोशल मीडिया का कोई भी प्लैटफॉर्म आप खंगाल जाएं। हो ही नहीं सकता कि पांच मिनट में आपके पास 2-4 पोस्ट या रील देसी चीजों की बड़ाई करती ना मिले। कहीं ब्यूटी गाइड होगी, कहीं टेस्टी खाने की गारंटी, कहीं वेट लॉस का सीक्रेट होगा तो कहीं बाल उगाने का तरीका बताया जा रहा होगा तो कोई दांतों की समस्या का शर्तिया इलाज बताएगा। जब इतना रश ऐसी पोस्ट्स का देखेंगे तो जाहिर है कि इन प्रोडक्ट्स को ढूंढेंगे भी। इन्फ्लुएंसर और कंटेंट मार्केटिंग के जरिए भी इन चीजों की नई पहचान बनाई जा रही है। लेकिन ये सब जानने के बाद अब दुकान पर जाने का टाइम नहीं है तो ऑनलाइन आपको देसी से देसी सामान उपलब्ध हो जाएगा।

साइकॉलजिस्ट प्रिया सिंह बताती हैं कि देसी चीजों के बारे में हमने बचपन में सुना था। पहले घरों में ये चीजें आमतौर पर मौजूद होती थीं और इनके फायदों की बात हमेशा से होती आई है। ऐसे में जब सोशल मीडिया हमारे अंदर बसी बातों को पुख्ता करता है तो इन चीजों का बाजार और मजबूत होता जाता है।

परंपरा हुई प्रीमियम, इसमें ही खुश हम

गौर से देखें तो एक तरीके ये पूरा चक्र हमारी परंपराओं और देसी चीजों के प्रीमियम होने से जुड़ा है। इसी बहाने इनकी पहुंच विदेशों तक पहुंचती है, और देसी तरीकों और सामान को वैश्विक पहचान मिलती है। हमारी खुशी बस इसी में है कि पश्चिमी चीजों के बीच हमारी देसी चीजें भी प्रसिद्धी पा रही हैं। हम खरीदें या न खरीदें, बाजार में इनके दिखने पर भले ही हम क्रिकेट मैच जीतने जैसा शोर न मचा पाएं लेकिन चक दे इंडिया की आवाज तो अंदर से आती ही है!

Medha Chawla
मेधा चावला author

मेधा चावला टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में सीनियर एसोसिएट एडिटर हैं और लाइफस्टाइल सेक्शन की लीड हैं। लाइफस्टाइल पत्रकारिता में 20 वर्षों का अनुभव रखने वा... और देखें

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