लाइफस्टाइल

बशीर बद्र: आम आदमी का वो शायर, 'खास' लोगों ने पढ़े जिसके शेर, कभी इंदिरा गांधी तो कभी पीएम मोदी हुए मुरीद

Bashir Badr Death: आज बशीर बद्र के निधन की खबर ना सिर्फ उर्दू अदब की दुनिया के लिए नहीं, बल्कि उन लाखों दिलों के लिए गहरा सदमा है जिन्होंने कभी उनकी गजलों में अपने जज्बात तलाशे थे।

Image

अलविदा बशीर बद्र..

हर दिल अजीज मशहूर शायर बशीर बद्र का 91 साल की उम्र में निधन हो गया। भोपाल में अपने आवास पर अंतिम सांस लेने वाले बशीर बद्र लंबे समय से डिमेंशिया बीमारी से पीड़ित थे। उनकी याददाश्त जा चुकी थी। उन्होंने लोगों को पहचानना भी छोड़ दिया था। लेकिन दिल के किसी कोने में शेर-ओ-शायरी की दुनिया हमेशा आबाद रही। तभी तो अपने आखिरी दिनों में जब भी उन्हें मुशायरे की याद आती तो इरशाद, इरशाद कहने लगते थे।

बशीर बद्र उन चुनिंदा शायरों में गिने जाते थे, जिनकी शायरी किताबों से निकलकर लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन गई। उनके शब्दों में ऐसी नरमी, ऐसी सादगी और ऐसा दर्द था, जो सीधे दिल में उतर जाता।

15 फरवरी 1935 में उत्तर प्रदेश के अयोध्या में जन्मे बशीर बद्र को बचपन से ही शेर-ओ-शायरी का शौक था। उनकी कलम से निकले शब्द कभी महफिलों की रौनक बनें तो कभी अकेलेपन में सहारे का भी काम किया। बशीर बद्र साहब की सबसे बड़ी खासियत यह रही कि उन्होंने मुश्किल अल्फाजों के बजाय बेहद आसान और आम भाषा में गहरी बातें कहीं। शायद यही वजह है कि उनकी शायरी हर उम्र और हर दौर के लोगों के दिल तक पहुंची।

बशीर बद्र की शायरी में टूटे हुए रिश्तों की टीस भी थी और जिंदगी को मुस्कुराकर जीने का हुनर भी। उन्होंने दर्द को कभी भारी शब्दों में नहीं बांधा, बल्कि उसे इतनी नर्मी से लिखा कि हर पढ़ने वाला उसमें खुद को महसूस करने लगता है।

जब इंदिरा गांधी ने पढ़ा बशीर बद्र का वह मशहूर शेर

1971 में भारत के हाथों पाकिस्तान को करारी शिकस्त झेलनी पड़ी थी। युद्ध के बाद दोनों देशों के बिगड़े संबंधों को सामान्य बनाने और स्थायी शांति स्थापित करने के लिए 2 जुलाई 1972 को शिमला समझौता हुआ। इस समझौते पर तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और तब के पाकिस्तानी वजीर ए आजम जुल्फिकार अली भुट्टो ने हस्ताक्षर किये थे।

शिमला समझौते के वक्त इंदिरा गांधी ने बशीर बद्र के मशहूर शेर से जुल्फिकार अली भुट्टो को नसीहत भी दी थी और दोस्ती का हाथ भी बढ़ाया था। यह मशहूर शेर था-

"दुश्मनी जमकर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे, जब कभी हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिन्दा न हों।"

इंदिरा गांधी बशीर बद्र की बड़ी प्रशंसक थीं। इस बात की तस्दीक खुद बशीर बद्र ने साहित्य अकादमी से प्रकाशित अपनी किताब 'आस' में की है। उन्होंने लिखा है कि इंदिरा गांधी ने एक बार उनका यह मशहूर सुना अपनी करीबी दोस्त को हैरान कर दिया था। वह शेर था-

"उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो, न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए"

यह शेर बशीर बद्र का सबसे मशहूर शेर माना जाता है। यही वह शेर है जिसे पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने भी इमरजेंसी के बाद अपनी आखिरी तकरीर के तौर पर पढ़ा था।

मशहूर अभिनेत्री मीना कुमारी पर इस शायरी का गजब रंग चढ़ा था। यूं तो वह खुद भी शायरियां लिखा करती थीं, लेकिन बशीर बद्र का यह शेर उन्हें इतना पसंद था कि उन्होंने इस शेर को मशहूर स्टार एण्ड स्टाइल मैगजीन में अपने हाथ से उर्दू में लिखकर छपवाया था।

वैसे समय बदला, अभिनेता बदले और फिर नेता भी बदले..जो नहीं बदले वो थे बशीर बद्र के शेर और उन्हें सुनने सुनाने वाले। मौजूदा दौर में पीएम नरेंद्र मोदी भी विरोधियों पर हमले के लिए बशीर बद्र का यह शेर पढ़ चुके हैं:

"जी चाहता है सच बोलें, क्या करें, हौसला नहीं होता.."

आज बशीर बद्र के निधन की खबर ना सिर्फ उर्दू अदब की दुनिया के लिए, बल्कि उन लाखों दिलों के लिए गहरा सदमा है जिन्होंने कभी उनकी गजलों में अपने जज्बात तलाशे थे। उनका जाना ऐसा है जैसे नज्मों की दुनिया का एक बेहद नरम, खूबसूरत और रूहानी हिस्सा अचानक खामोश हो गया हो।

शेर-ओ-शायरी के कद्रदानों के लिए तो बशीर बद्र का निधन मानो किसी पुरानी महफिल की आखिरी रोशनी का बुझ जाना हो। लेकिन हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि कुछ लोग भले दुनिया छोड़ जाते हैं, लेकिन अपनी यादों के उजाले अपने चाहने वालों के लिए जरूर छोड़ जाते हैं। टाइम्स नाऊ नवभारत की तरफ से बशीर बद्र साहब को उन्हीं के सबसे मशहूर शेर से आखिरी सलाम:

उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो

न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए..

मुसाफिर हैं हम भी मुसाफ़िर हो तुम भी

किसी मोड़ पर फिर मुलाक़ात होगी..

अलविदा बशीर बद्र।

Suneet Singh
सुनीत सिंह author

सुनीत सिंह टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में डिप्टी न्यूज एडिटर के रूप में कार्यरत हैं और लाइफस्टाइल सेक्शन में स्पेशल स्टोरीज प्रोजेक्ट का नेतृत्व कर रहे ... और देखें

End of Article