महिला आरक्षण को लेकर संसद में एक बार फिर सियासी हलचल तेज हो गई है। लगभग सभी दलों की महिला सांसद महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के पक्ष में हैं, लेकिन असली टकराव इस बात पर है कि कानून को कब, कैसे और किन शर्तों के साथ लागू किया जाए। महिला आरक्षण के मुद्दे पर राजनीतिक दलों के बीच सिद्धांततः सहमति दिख रही है।
लेकिन इसे लागू करने के रोडमैप, समयसीमा और शर्तों को लेकर मतभेद सामने आ रहे हैं। खासतौर पर जनगणना और परिसीमन से जोड़ने के मुद्दे ने बहस को और तेज कर दिया है।
कांग्रेस: डिलिमिटेशन पर सवाल, तुरंत लागू करने की मांग
कांग्रेस की वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी ने साफ कहा है कि महिलाओं को आरक्षण देने के विचार पर अब कोई विवाद नहीं है। उन्होंने मौजूदा बहस का केंद्र डिलिमिटेशन को बताया और प्रक्रिया को “deeply flawed and anti-democratic” करार दिया। उनका कहना है कि महिला आरक्षण को तुरंत और न्यायपूर्ण तरीके से लागू किया जाना चाहिए। साथ ही उन्होंने एससी, एसटी और ओबीसी महिलाओं के लिए “आरक्षण के भीतर आरक्षण” सुनिश्चित करने की मांग दोहराई और कहा कि इस मुद्दे को राजनीतिक प्रबंधन का औजार नहीं बनाया जाना चाहिए।
समाजवादी पार्टी: समर्थन के साथ सरकार से तीखे सवाल
समाजवादी पार्टी की युवा सांसद इकरा हसन ने टाइम्स नाउ नवभारत से बातचीत में कहा कि महिला आरक्षण के खिलाफ कोई नहीं है, लेकिन सरकार के रुख पर सवाल उठते हैं।उन्होंने कहा कि बजट सत्र के दौरान सपा ने “नारी शक्ति वंदन अधिनियम” में ओबीसी आरक्षण शामिल करने की मांग की थी, लेकिन सरकार ने इसे अलग मुद्दा बताया। अब वही सरकार महिला आरक्षण को जनगणना और परिसीमन से जोड़ रही है, जबकि ये दोनों ही राजनीतिक और विवादित मुद्दे हैं।
इकरा हसन ने यह भी याद दिलाया कि 2023 में विशेष सत्र बुलाकर यह कानून बिना पर्याप्त चर्चा के लाया गया था, जिसकी वजह से अब संशोधन की जरूरत पड़ रही है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब महिला आरक्षण 2029 लोकसभा चुनाव से लागू होना है, तो सरकार इतनी जल्दबाजी क्यों दिखा रही है।
शिवसेना (यूबीटी): विपक्ष के भीतर भी मतभेद
शिवसेना (यूबीटी) की नेता प्रियंका चतुर्वेदी ने विपक्ष के भीतर मौजूद हिचकिचाहट पर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि अगर महिलाओं से संसद और विधानसभा में सीट आरक्षित करने का वादा किया गया है, तो उसे पूरा करने में देरी क्यों होनी चाहिए। उनके इस बयान से साफ है कि विपक्षी खेमे के भीतर भी इस मुद्दे पर एक समान रुख नहीं है।
