Varanasi MLC Poll Result: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में भाजपा को तगड़ा झटका लगा है। विधान परिषद की दोनों सीटों पर भाजपा को करारी हार का सामना करना पड़ा है। समाजवादी पार्टी ने एमएलसी की शिक्षक और स्नातक सीट पर अपना कब्जा बरकरार रखा। वाराणसी में भाजपा की शिकस्त के सियासी मायने निकाले जा रहे हैं और विपक्ष भाजपा के 'काशी मॉडल' पर सवाल उठा रहा है।
वाराणसी में एमएलसी की दोनों सीटों पर हार का आंकड़ा, पिछली बार के मुकाबले कहीं ज्यादा है और यही भाजपा की सबसे बड़ी चिंता है। जानकार बता रहे हैं कि कमजोर रणनीति और प्रत्याशियों के चयन में लापरवाही हार की प्रमुख वजह रही। MLC चुनाव में भाजपा से कहां चूक हुई? यहां समझिए इसके 3 बड़े कारण।
1. शिक्षक-ग्रेजुएट वोटर की नाराजगी
ये आम वोटर नहीं है। पुरानी पेंशन योजना (OPS), शिक्षकों के तबादले, वित्तविहीन शिक्षकों की समस्याएं और विश्वविद्यालयों में संविदा भर्ती जैसे मुद्दों ने इस वर्ग को भाजपा से दूर किया। जबकि दूसरी ओर समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी लाल बिहारी यादव ने वित्तविहीन शिक्षकों के बीच गहरी पैठ बना ली थी। वित्तविहीन शिक्षकों को मतदाता सूची से जोड़ने से लेकर चुनाव प्रचार में सपा प्रत्याशी कहीं आगे नजर आए।
2. बूथ मैनेजमेंट में पिछड़ी भाजपा
भाजपा कैडर बेस पार्टी मानी जाती है। संगठनात्मक दृष्टिकोण से भाजपा मजबूत नजर आती है, लेकिन एमएलसी चुनाव में भाजपा पिछड़ गई। बूथ मैनेजमेंट में पार्टी समाजवादी पार्टी से पीछे नजर आई। चाहे ग्रेजुएट छात्रों को मतदाता सूची से जोड़ना हो या फिर उन्हें बूथ तक लाना हो, समाजवादी पार्टी आगे दिखी। इसके अलावा प्रत्याशियों के चेहरे को लेकर भी पार्टी नेताओं में रुची नहीं दिखी। भाजपा के तमाम विधायक, मंत्री चुनाव प्रचार में दिलचस्पी लेते नहीं दिखे।
3. अति-आत्मविश्वास
भाजपा ने शिक्षक सीट पर ऐसे प्रत्याशी (प्रमोद मिश्रा) को उतारा, जो पिछली बार निर्दलीय हार चुके थे। वोट घटने से साफ है कि कैडर ने भी पूरी तरह से साथ नहीं दिया।
अखिलेश का तंज - पहले अयोध्या, अब काशी
नतीजों के बाद सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने भाजपा पर चुटकी ली। उन्होंने 'एक्स' पर लिखा, "पहले अयोध्या में हराया, अब काशी में मात दी।" उन्होंने इसे "डबल इंजन सरकार की डबल हार" बताया और कहा कि वाराणसी स्नातक सीट पर भाजपा शुरुआती गिनती और रीकाउंटिंग दोनों में हारी है। सिर्फ अखिलेश यादव ही नहीं, विपक्ष के तमाम नेता वाराणसी की हार के बहाने नरेंद्र मोदी को घेरने में जुट गए।
जमीन से आसमान तक विकास, फिर भी हार क्यों?
पिछले 12 सालों में देश ने बदलते वाराणसी की तस्वीर देखी है। पीएम नरेंद्र मोदी की कोशिशों का ही नतीजा है कि वैश्विक पटल पर वाराणसी ने अलग पहचान बनाई। वाराणसी की गिनती अब देश के अग्रणी शहरों में होने लगी है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, यहां 80 हजार करोड़ से ज्यादा की परियोजनाएं जमीन पर उतरी हैं। सड़क से लेकर स्वास्थ्य और शिक्षा तक हर क्षेत्र में वाराणसी ने तरक्की की। नरेंद्र मोदी ने शासन काल में 339 करोड़ रुपये की लागत से काशी विश्वनाथ धाम का पुनर्निर्माण हुआ तो 8 हजार करोड़ रुपये की लागत से बना रोप-वे प्रोजेक्ट तैयार हो चुका है। इसके अलावा गंजारी में बन रहा इंटरनेशनल क्रिकेट स्टेडियम, मदन मोहन मालवीय कैंसर हॉस्पिटल के अलावा शहर में सड़क, फ्लाईओवर का जाल। विकास की इतनी परियोजनाओं के बाद भी भाजपा की हार ने सियासी जानकारों को सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर चूक कहां हुई ?
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MLC रिजल्ट के आंकड़े क्या कहते हैं?
पिछले 3 दिनों तक चली मैराथन मतगणना के बाद गुरुवार को फाइनल नतीजे आए।
1. वाराणसी स्नातक खंड
सपा प्रत्याशी आशुतोष सिन्हा ने 55,046 वोट हासिल कर जीत दर्ज की। उन्होंने भाजपा के केदार नाथ सिंह (35,114 वोट) को 19,932 वोटों के भारी अंतर से हराया। आशुतोष ने पहले राउंड से आखिरी राउंड तक बढ़त बनाए रखी। भाजपा ने 5वें राउंड में गिनती पर आपत्ति जताई थी, जिसके बाद रात में दोबारा गिनती शुरू हुई, लेकिन नतीजा वही रहा।
2. वाराणसी शिक्षक खंड
यहां सपा के लाल बिहारी यादव ने लगातार दूसरी बार जीत दर्ज की। उन्हें दूसरी वरीयता की गिनती के बाद कुल 11,612 वोट मिले, जबकि भाजपा प्रत्याशी डॉ. प्रमोद मिश्रा को 6,597 वोट ही मिले। जीत का अंतर 5,015 वोट रहा। प्रथम वरीयता में लाल बिहारी को 10,958 और प्रमोद मिश्रा को 6,060 वोट मिले थे। खास बात ये है कि 2020 में निर्दलीय के तौर पर 6,830 वोट लाने वाले प्रमोद मिश्रा का वोट इस बार भाजपा के टिकट पर घटकर 6,597 रह गया।
