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' देसी बम' का डॉक्टर, पूर्वांचल के माफियाओं का 'तुरुप का इक्का', अतीक के स्पेशल बुलावे पर आया था गुड्डू मुस्लिम

  • Authored by: प्रांजुल श्रीवास्तव
  • Updated Apr 17, 2023, 01:55 PM IST

Who is Guddu Muslim: अतीक अहमद हत्याकांड के बाद लोग गुड्डू मुस्लिम के बारे में जानना चाहते हैं। कहा तो यह भी जा रहा है कि अतीक अहमद हत्याकांड के पीछे गुड्डू मुस्लिम का हाथ हो सकता है। यहां हम आपको बताएंगे कि गुड्डू मुस्लिम कौन है? उसका आपराधिक इतिहास क्या है? अतीक अहमद के साथ उसका नाम कैसे जुड़ा? ​और उसे बमबाज गुड्डू के नाम से क्यों जाना जाता था? आइए जानते हैं उसकी कहानी... का भी हाथ हो सकता है।

Who is Guddu Muslim: अतीक अहमद हत्याकांड के बाद से गुड्डू मुस्लिम का नाम चर्चा में है। दरअसल, जिस समय अतीक और उसके भाई अशरफ की हत्या की गई, उस समय अशरफ गुड्डू मुस्लिम के बारे में ही मीडिया से बात कर रहा था। हालांकि, वह कुछ कह पाता, इससे पहले ही उसे गोली मार दी गई। गोली लगते ही दोनों माफिया बंधु वहीं ढेर हो गए और बात अधूरी रह गई।

इस घटना के बाद से लोग गुड्डू मुस्लिम के बारे में जानना चाहते हैं। बता दें, गुड्डू मुस्लिम उमेश पाल हत्याकांड का भी आरोपी है। फिलाहल वह फरार चल रहा है और पुलिस ने उसके सिर पर पांच लाख रुपये का इनाम रखा है। कहा तो यह भी जा रहा है कि अतीक अहमद हत्याकांड के पीछे गुड्डू मुस्लिम का भी हाथ हो सकता है। दरअसल, दोनों भाई उसके बारे में चौंकाने वाला खुलासा कर सकते थे। यहां हम आपको बताएंगे कि गुड्डू मुस्लिम कौन है? उसका आपराधिक इतिहास क्या है? अतीक अहमद के साथ उसका नाम कैसे जुड़ा? और उसे बमबाज गुड्डू के नाम से क्यों जाना जाता था? आइए जानते हैं उसकी कहानी...

कैसे चर्चा में आया गुड्डू मुस्लिम

गुड्डू मुस्लिम उमेश पाल हत्याकांड के बाद से फरार चल रहा है। उमेश की हत्या के समय गुड्डू मुस्लिम भी वहीं मौजूद था। इसके सीसीटीवी फुटेज भी सामने आए थे। इन फुटेज में गुड्डू मुस्लिम को बमबाजी करते हुए देखा गया था। वह बम ऐसे बरसा रहा था, जैसे यह कोई बच्चों का खेल हो। इस हत्याकांड के बाद पुलिस ने उसके सिर पर पांच लाख रुपये का इनाम रखा है। झांसी में उसके होने की खबर यूपी एसटीएफ को मिली थी, लेकिन वह पुलिस को चकमा देने में कामयाब हो गया।

अब जानते हैं उसका आपराधिक इतिहास

गुड्डू मुस्लिम के बारे में कहा जाता है कि वह 15 साल की उम्र में ही छोटी-मोटी चोरियों के जरायम की दुनिया में दाखिल हुआ। हालांकि, कुछ समय बाद गुड्डू इतना बड़ा नाम बन गया कि उसे बड़े-बड़े माफियाओं की शरण मिलने लगी। यहीं से वह अपराध की दुनिया में इतना बड़ा नाम बन गया कि पुलिस की सूची में मोस्ट वॉटेड अपराधियों में शामिल हो गया। उसकी प्रयागराज में बड़ी क्रिमनल हिस्ट्री है। एक समय ऐसा आया कि उत्तर प्रदेश के हर बड़े अपराध से उसका नाम जुड़ने लगा। लखनऊ में ला मार्टिनेयर स्कूल के एक शिक्षक की हत्या के आरोप में 1997 में गुड्डू जेल भी गया, लेकिन सबूतों के अभाव में उसे रिहा कर दिया गया।

पूर्वांचल के बड़े अपराधियों का बना तुरुप का इक्का

एक रिपोर्ट के मुताबिक, गुड्डू मुस्लिम पूर्वांचल के बड़े अपराधियों की गैंग में भी शामिल रहा। उसने श्री प्रकाश शुक्ला, मुख्तार अंसारी, धनंजय सिंह और अभय सिंह जैसे कई माफियाओं के साथ करीब दो दशक तक काम किया।

क्यों कहा जाता है बमबाज गुड्डू मुस्लिम

गुड्डू मुस्लिम को देसी बम बनाने का स्पेश्लिस्ट कहा जाता है। वह बम बनाने में इतना एक्सपर्ट था कि खेल-खेल में एक से एक खतरनाक बम बना देता था। कई आपराधिक वारदातों में हुई बमबाजी में उसका नाम सामने आया। उमेश पाल हत्याकांड में भी गुड्डू मुस्लिम को बमबाजी करते हुए देखा गया था।

अतीक से क्या है कनेक्शन

ऐसा कहा जाता है उत्तर प्रदेश में एक बड़ी वारदात के बाद गुड्डू मुस्लिम फरार हो गया था। वह बिहार में छिपा हुआ था। हालांकि, 2001 में उसकी गिरफ्तारी हो गई। ऐसा माना जाता है कि अतीक अहमद ने उसे जेल से बाहर निकालने में मदद की, जिसके बाद में वह अतीक अहमद के साथ जुड़ गया और उसका दाहिना हाथ माना जाने लगा। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, उमेश पाल की हत्या के लिए अतीक ने विशेष तौर पर गुड्डू मुस्लिम को बुलाया था, जिससे वह मौके पर बमबाजी कर सके और दहशत फैला सके।

गुड्डू मुस्लिम को लेकर तलाश और तेज

पुलिस को मिली जानकारी के मुताबिक, अतीक अहमद का खास शूटर गुड्डू मुस्लिम ही अतीक का सारा नेटवर्क संभलता था। एसटीएफ के मुताबिक ISI से मंगवाए गए हथियार पंजाब के रास्ते लाने में गुड्डू मुस्लिम ही मैनेज करता था। झांसी में छुपने के दौरान सुबह से शाम तक गुड्डू मुस्लिम अपने गुर्गों के साथ रेकी करता रहता था, जबकि झांसी में बबीना रेंज सैन्य ठिकाना सहित काई महत्वपूर्ण स्थान है। ऐसे में पुलिस ने उसकी तलाश और तेज कर दी है।
प्रांजुल श्रीवास्तव
प्रांजुल श्रीवास्तवauthor

<p>मैं इस वक्त टाइम्स नाउ नवभारत से जुड़ा हुआ हूं। पत्रकारिता के 8 वर्षों के तजुर्बे में मुझे और मेरी भाषाई समझ को गढ़ने और तराशने में कई वरिष्ठ पत्रकारों और संपादकों का योगदान रहा। 2016 में उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से शुरू हुआ यह सफर देश की राजधानी दिल्ली में 'टाइम्स नाउ नवभारत' तक आ पहुंचा है। अखबारों में रिपोर्टिंग करते हुए शहरों की धूल फांकना और डिजिटल पत्रकारिता की बारीकियों को समझते हुए देश-विदेश की खबरों को आप तक पहुंचाने का मेरा ये सफर काफी किस्से-कहानियों से भरा हुआ है। लखनऊ की बाबा भीम राव अंबेडकर सेंट्रल यूनिवर्सिटी के क्लासरूम में प्रोफेसरों से मिले किताबी ज्ञान और पत्रकारीय सिद्धांतों को जमीन पर उतारने का मौका मुझे 2016 में ही मिल गया। पहला ब्रेक टाइम्स ग्रुप के प्रतिष्ठित अखबार 'नवभारत टाइम्स' ने दिया। यहां बतौर इंटर्न मुझे कई सामाजिक संगठनों की रिपोर्टिंग करने का मौका मिला। दिनभर शहर में घूम-घूम कर खबरों को बटोरना और शाम होते ही उन्हें लिखकर डेस्क के हवाले करना मेरी दिनचर्या का हिस्सा हो गया। इस अनुभव ने मुझे समाज के तौर तरीकों से परिचित कराया तो न्यूजरूम में सीनियर्स से मिली डांट ने पत्रकारिता की बारीकियों और भाषाई मर्यादा को समझने में मदद की। करीब 3 से 4 महीनों की इंटर्नशिप के बाद मुझे 2017 आते-आते गांधी परिवार के गढ़ रायबरेली भेजा गया। यह समय उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव और सत्ता के बदलाव का था। यहां बतौर रिपोर्टर मैं पहली बार राजनीतिक खबरों से रूबरू हुआ। रायबरेली के मिजाज को करीब 8 महीनों तक समझने के बाद नवभारत टाइम्स ने मुझे वापस लखनऊ बुलाया और शहर की रिपोर्टिंग करने का मौका दिया। यहां विज्ञान, पर्यावरण, बाजार, लखनऊ विकास प्राधिकरण, आवास विकास और मेट्रो जैसी बीट पर जमकर काम किया। यह सफर अब पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिले मुरादाबाद तक पहुंच गया था, जहां मुझे दैनिक जागरण जैसे प्रतिष्ठित अखबार के लिए दो वर्षों तक रिपोर्टिंग करने का अवसर मिला। करीब दो वर्षों की पत्रकारिता के बाद अब मुझे देश की राजधानी की ओर रुख करना था और यह मौका अमर उजाला (डिजिटल) ने दिया। अखबारों की रिपोर्टिंग से निकलकर डिजिटल पत्रकारिता के अनुभव से मैं पहली बार रूबरू हो रहा था। यहां पर मुझे मेन डेस्क पर जिम्मेदारी मिली। जहां सबसे आगे रहते हुए सबसे सटीक खबरें आप तक पहुंचाना चुनौती भरा काम था, लेकिन पत्रकारिता की शुरुआत में मिले अनुभवों ने मेरा काम आसान बना दिया। यहां भी करीब दो वर्षों के बाद 2023 में मुझे टाइम्स ग्रुप से दोबारा जुड़ने का मौका मिला और टाइम्स नाउ नवभारत की मेन डेस्क पर मेरा सफर अब तक जारी है।</p>

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