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'दुनिया में 'टैरिफ किंग' अब कोई है तो वह अमेरिका है', पूर्व राजनयिक विकास स्वरूप बोले-इन 3 बातों से चिढ़े हैं ट्रंप

पूर्व राजनयिक विकास स्वरूप ने बुधवार को कहा कि 'दुनिया में 'टैरिफ किंग' अब भारत नहीं बल्कि अमेरिका है क्योंकि हमारा औसत टैरिफ करीब 15.98 प्रतिशत जबकि अमेरिका का टैरिफ 18.4% है। ऐसे में दुनिया में 'टैरिफ किंग' यदि कोई है तो वह अमेरिका है। वास्तविकता यह है कि टैरिफ पैसे ला रहा है और इससे अमेरिका को एक साल में करीब 100 अरब डॉलर मिल जाएंगे।'

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विकास स्वरूप ने बताया आखिर भारत से क्यों चिढ़ें हैं ट्रंप। तस्वीर-पीटीआई

Photo : PTI

Vikas Swarup : टैरिफ को लेकर भारत और अमेरिका के रिश्ते में आए एक तरह के गतिरोध पर पूर्व राजनयिक विकास स्वरूप ने विस्तार से बात की है। समाचार एजेंसी एएनआई के साथ बातचीत में विकास स्वरूप ने बुधवार को कहा कि 'दुनिया में 'टैरिफ किंग' अब भारत नहीं बल्कि अमेरिका है क्योंकि हमारा औसत टैरिफ करीब 15.98 प्रतिशत जबकि अमेरिका का टैरिफ 18.4% है। ऐसे में दुनिया में 'टैरिफ किंग' यदि कोई है तो वह अमेरिका है। वास्तविकता यह है कि टैरिफ पैसे ला रहा है और इससे अमेरिका को एक साल में करीब 100 अरब डॉलर मिल जाएंगे।'

पूर्व राजनयिक ने कहा कि बात यह है कि आखिर में इस टैरिफ का भुगतान कौन करेगा? तो इसका भुगतान अमेरिकी जनता करेगी। तो इसका असर होगा कि अमेरिका में महंगाई बढ़ेगी।

हम किसी देश के पिछलग्गू नहीं बन सकते-स्वरूप

पाकिस्तान के साथ अमेरिकी की बढ़ती करीबी पर स्वरूप ने कहा कि 'मुझे लगता कि अमेरिका की तरफ से यह रणनीतिक रूप से चूक हो रही है क्योंकि आप उस देश के साथ मेलजोल बढ़ा रहे हैं जो चीन का करीबी है जबकि चीन, अमेरिका का प्रतिद्वंद्वी है।' ट्रंप दबाव के बारे में उन्होंने कहा कि 'यदि आप बदमाश के आगे झुक जाएंगे तो वह अपनी मांग बढ़ाएगा। इसके बाद मांग और बढ़ेगी। इसलिए मुझे लगता है कि हमने सही चीज की है। भारत बहुत बड़ा है। हम किसी देश के पिछलग्गू नहीं बन सकते। विदेश नीति में हमारी एक रणनीतिक स्वायत्तता 1950 से रही है। दिल्ली में चाहे कोई भी सरकार हो, वह इससे समझौता नहीं करेगी।'

'इन तीन चीजों से भारत से खुश नहीं हैं ट्रंप'

भारत-अमेरिका के बीच टैरिफ को लेकर चल रहे कूटनीतिक विवाद पर पूर्व राजनयिक ने कहा, 'हमें यह समझना होगा कि ये टैरिफ क्यों लगाए गए हैं? मुझे व्यक्तिगत रूप से लगता है कि इसके तीन कारण हैं। पहला, ट्रंप भारत से खुश नहीं हैं क्योंकि हम ब्रिक्स के सदस्य हैं और किसी तरह उनके दिमाग में यह धारणा बैठ गई है कि ब्रिक्स एक अमेरिका-विरोधी गठबंधन है जो डॉलर के विकल्प के रूप में एक नई मुद्रा बनाने पर तुला हुआ है। इसलिए उन्हें लगता है कि भारत को ब्रिक्स का सदस्य नहीं होना चाहिए।'

भारत ने उनकी भूमिका स्वीकार नहीं की

उन्होंने कहा, 'दूसरा, ऑपरेशन सिंदूर और उसमें उनके कथित तौर पर युद्धविराम कराने की भूमिका। हम शुरू से ही कहते आए हैं कि ट्रंप की इसमें कोई भूमिका नहीं थी क्योंकि हम बाहरी मध्यस्थता को स्वीकार नहीं करते। यह युद्धविराम पाकिस्तान और भारत के डीजीएमओ के बीच सीधे, पाकिस्तान के डीजीएमओ के अनुरोध पर, कराया गया था। ट्रंप अब तक लगभग 30 बार कह चुके हैं कि उन्होंने दोनों देशों को टकराव के कगार से पीछे हटाया। तो जाहिर है कि उन्हें इस बात का मलाल है कि भारत ने उनकी भूमिका को स्वीकार नहीं की जबकि पाकिस्तान ने न केवल उनकी भूमिका स्वीकार की बल्कि उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामित भी किया।'

ट्रेड डील में अपनी बात मनवाना चाहते हैं ट्रंप

स्वरूप ने कहा कि तीसरा, यह उनके दबाव बनाने की रणनीति का हिस्सा है ताकि भारत अमेरिकी डेयरी, कृषि और जीएम फसलों से जुड़ी अधिकतम मांगों पर दस्तखत कर दे। हालांकि, हमने झुकने से इनकार कर दिया है। वह इस बात से भी निराश हैं कि वे राष्ट्रपति पुतिन को युद्धविराम के लिए राजी नहीं करा पाए जिस पर जेलेंस्की एक तरह से सहमत हो गए हैं। ट्रंप और पुतिन 15 अगस्त को अलास्का में मिल रहे हैं। अगर अलास्का वार्ता का सकारात्मक नतीजा निकलता है तो मुझे 100% यकीन है कि रूस पर से प्रतिबंध हटा दिए जाएंगे।

ओबामा से एक कदम आगे निकलना चाहते हैं ट्रंप

अमेरिका द्वारा भारत पर लगाए गए 50% टैरिफ पर पूर्व राजनयिक ने कहा, 'ट्रंप एक डीलमेकर हैं और उन्होंने अब यह अपनी पहचान बना ली है कि वे शांति कराने वाले हैं। देखिए, उन्होंने कितने संघर्षपूर्ण हालात में मध्यस्थता की है -चाहे वह थाईलैंड और कंबोडिया हो, रवांडा और डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो हो, आर्मेनिया और अजरबैजान हो-उन्होंने इनमें खुद को शामिल किया। उन्हें लगता है कि इनमें सबसे बड़ी उपलब्धि भारत और पाकिस्तान वाली है क्योंकि दोनों परमाणु शक्ति संपन्न देश हैं। इस दृष्टिकोण से ट्रंप को लगता है कि उन्हें इसका श्रेय मिलना चाहिए, और ओबामा ही एकमात्र अमेरिकी राष्ट्रपति हैं जिन्हें नोबेल शांति पुरस्कार मिला है। ट्रंप ओबामा से एक कदम आगे बढ़ना चाहते हैं, और इसी वजह से, मेरा मानना है, उन्होंने नोबेल शांति पुरस्कार पाने की अपनी चाहत को कभी छुपाया नहीं। उन्हें उम्मीद है कि अगर उन्हें इन मामलों में यह पुरस्कार नहीं मिल पाया, तो अगर वे रूस और यूक्रेन के बीच युद्धविराम करा पाते हैं, तो वही उनके लिए नोबेल शांति पुरस्कार का टिकट बन सकता है।'

Alok Rao
आलोक कुमार रावauthor

19 वर्षों से मीडिया जगत में सक्रिय आलोक राव ने प्रिंट, न्यूज एजेंसी, टीवी और डिजिटल चारों ही माध्यमों में काम किया है। इस लंबे अनुभव ने उन्हें समाचारों की समझ, प्रेजेंटेशन, डिटेलिंग और न्यूजरूम डायनेमिक्स में असाधारण दक्षता प्रदान की है। राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों में विशेष रुचि रखने के साथ-साथ जियो-पॉलिटिक्स एवं डिफेंस की स्टोरीज में इनकी खासी दिलचस्पी है। आलोक ने अलग-अलग माध्यमों में काम करते हुए समाचारों की समझ, प्रस्तुति और विश्लेषण में मजबूत दक्षता विकसित की है और अब तक 25,000 से अधिक आर्टिकल तैयार कर चुके हैं। तथ्यों की गहन जांच, मजबूत न्यूज सेंस और तेज निर्णय क्षमता उनकी पत्रकारिता की प्रमुख खासियतें हैं।

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