पश्चिम बंगाल में जारी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन पर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने ममता सरकार को बड़ा झटका देते हुए SIR की प्रक्रिया में ज्यूडिशियल अधिकारियों को शामिल करने का आदेश दे दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हमने कई अंतरिम आदेश दिए उसके बावजूद राज्य सरकार और चुनाव आयोग के बीच विश्वास की भारी कमी है। दोनों ही पक्ष एक दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट का आदेश
निर्वाचन आयोग और ’’लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई’’ तृणमूल कांग्रेस सरकार के बीच ’’दुर्भाग्यपूर्ण आरोप-प्रत्यारोप’’ और ’’विश्वास की कमी’’ पर खेद जताते हुए प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली की पीठ ने राज्य में एसआईआर प्रक्रिया को पूरा करने के लिए कई नये निर्देश जारी किये। पीठ ने तार्किक विसंगति सूची में शामिल तथा मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के खतरे का सामना कर रहे व्यक्तियों के दावों और आपत्तियों के निपटारे के लिए न्यायिक अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति का आदेश दिया।
सुप्रीम कोर्ट का सख्त रूख
उच्चतम न्यायालय ने कलकत्ता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश सुजॉय पॉल से पश्चिम बंगाल में एसआईआर के काम में सहायता के लिए कुछ न्यायिक अधिकारियों को मुक्त करने और पूर्व न्यायाधीशों को खोजने के लिये कहा। पीठ ने पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के लिए ’ए’ श्रेणी के पर्याप्त अधिकारियों को उपलब्ध नहीं कराने पर कड़ा रुख अपनाया। मुख्य न्यायाधीश पॉल को शनिवार को एक बैठक बुलाने के लिए कहा गया है जिसमें मुख्य सचिव, पुलिस महानिदेशक (डीजीपी), निर्वाचन आयोग के अधिकारी और राज्य के महाधिवक्ता, केंद्र के अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल और उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल शामिल होंगे। बैठक का उद्देश्य एसआईआर प्रक्रिया में न्यायिक अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति को अंतिम रूप देना है।
28 फरवरी को मसौदा सूची
उच्चतम न्यायालय ने निर्वाचन आयोग को 28 फरवरी तक राज्य में मतदाताओं की मसौदा सूची प्रकाशित करने की अनुमति दी और साथ ही निर्वाचन आयोग को बाद में पूरक सूचियां जारी करने की भी अनुमति दी। पीठ ने कहा कि यदि 28 फरवरी के बाद पूरक मतदाता सूचियां जारी की जाती हैं, तो किसी को कोई नुकसान नहीं होगा, क्योंकि मतदाताओं के नाम चुनाव के लिए नामांकन पत्र दाखिल करने की अंतिम तिथि तक शामिल किए जा सकते हैं।
ममता सरकार का तर्क
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने आरोप लगाया कि मतदाता सूची अधिकारियों द्वारा पारित आदेशों की समीक्षा अब एक ’’नये तरह के अधिकारियों’’ द्वारा की जा रही है, जिन्हें अब ’’विशेष मतदाता अधिकारी ’’ (एसआरओ) कहा जाता है। निर्वाचन आयोग ने इस दावे का खंडन करते हुए कहा कि एसआरओ शुरुआत से ही मौजूद हैं। पीठ ने निर्वाचन आयोग की दलीलों से सहमति जताई।
पीठ ने कहा कि यदि असहयोग जारी रहता है, तो न्यायालय न्यायिक अधिकारियों को तैनात करेगा या निर्वाचन आयोग को अन्य राज्यों से अधिकारियों को तैनात करने के लिए कहेगा। सुनवाई के दौरान, राज्य सरकार की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि अगर निर्वाचन आयोग को 28 फरवरी तक अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित करने की अनुमति दी जाती है तो कानून-व्यवस्था की समस्या उत्पन्न हो सकती है।
निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से, उच्चतम न्यायालय ने कहा कि ऐसे न्यायिक अधिकारियों/पूर्व न्यायिक अधिकारियों को दावों और आपत्तियों का निर्णय करते समय निर्वाचन आयोग के ’माइक्रो ऑब्जर्वर’ और राज्य सरकार के अधिकारियों द्वारा सहायता प्रदान की जाएगी। पीठ ने कहा, ’’परिस्थितियां असाधारण होने के कारण, न्यायिक अधिकारियों और पूर्व न्यायिक अधिकारियों को कार्य सौंपना भी असाधारण है।’’
चुनाव आयोग ने क्या कहा
निर्वाचन आयोग की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता डी.एस. नायडू ने असहयोग और कानून-व्यवस्था के उल्लंघन का मुद्दा उठाते हुए आरोप लगाया कि शरारती तत्वों ने दस्तावेजों को फाड़ दिया है, लेकिन फिर भी इस संबंध में कोई खास कार्रवाई नहीं की गई है। उन्होंने विभिन्न राजनीतिक पदाधिकारियों द्वारा निर्वाचन अधिकारियों के खिलाफ दिए गए बयानों को प्रस्तुत किया और कहा कि किसी के भी खिलाफ प्राथमिकी दर्ज नहीं की गई है। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने बयानों का अध्ययन करने के बाद कहा, ’’दुर्भाग्यवश, चुनाव के दौरान इस तरह के गैरजिम्मेदाराना बयान दिए जा रहे हैं। यदि कोई कार्रवाई नहीं की गई, तो डीजीपी को इसके परिणाम भुगतने होंगे।’’
