दिल्ली : लोक सभा में मॉनसून सत्र की कार्यवाही के दौरान 'लोक परीक्षा (अनुचित साधन निवारण) संशोधन विधेयक' पर बोलते हुए कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने सरकार से तीखे सवाल किए। उन्होंने कानून के क्रियान्वयन और उसकी प्रभावशीलता पर गंभीर संदेह जताते हुए स्पष्टता की मांग की। थरूर ने विधेयक के तहत केस को तीन महीने के भीतर निपटाने के सरकारी दावे पर सवाल खड़े किए। उन्होंने पूछा कि 'अगर सरकार वास्तव में तीन महीने में मामलों के निपटारे का दावा कर रही है, तो सदन को यह बताए कि यह लक्ष्य कैसे हासिल किया जाएगा? क्या सरकार न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाएगी? क्या समर्पित सरकारी वकील नियुक्त किए जाएंगे? क्या फॉरेंसिक क्षमता को बेहतर बनाया जाएगा, या फिर यह कानून केवल कागजों तक ही सीमित रहेगा?
स्पेशल टास्क फोर्स की संरचना पर संदेह
विधेयक में प्रस्तावित 'स्पेशल टास्क फोर्स' (STF) को लेकर भी थरूर ने कई अहम चिंताएं जताईं। उन्होंने पूछा कि इस फोर्स में कौन से अधिकारी शामिल होंगे? उनकी योग्यताएं क्या होंगी? उनका कार्यकाल कितना होगा और किन परिस्थितियों में कोई मामला इस फोर्स को सौंपा जाएगा?
सरकार की जवाबदेही पर जोर
थरूर ने कहा कि ये सवाल इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि पेपर लीक मामले में आरोपी और जांचकर्ता दोनों ही सरकार के प्रशासनिक ढांचे के तहत काम कर रहे हैं। उन्होंने सरकार से मांग की कि वह इस कानून की कार्यप्रणाली को लेकर अधिक पारदर्शी और स्पष्ट योजना सदन के सामने रखे।
शशि थरूर ने कहा कि लाखों छात्र और उसने परिवार नीट पेपर से प्रभावित हुए। उनके माता पिता बच्चों के बेहतर भविष्य और सपने को साकार करने के लिए अपनी जमापूंजी लगा दी, लेकिन मिलता क्या है? उन्होंने कहा कि बच्चों को न्याय कब मिलेगा। मॉर्डन जमाने में इस तरह के पेपर लीक मामले एजूकेशन सिस्टम को कटघरे में खड़ा करते हैं।
उन्होंने मांग की इसमें दोषियों को पकड़ने के लिए हाई लेवल कमेटी काम करे। इसमें एनटीए की तैयारियों पर भी नजर रखें। उन्होंने कहा मॉर्डन व्यवस्थाओं के बीच साइबर तरीके से पेपर लीक होना सरकार के 12 साल के करियर पर सवालिया निशान खड़े करते हैं। ऐसा क्यों हैं कि साल 2014 से 2026 तक सरकार ऐसी व्यवस्था नहीं बना पाई, जिससे पारदर्शी तरीके से एग्जाम कराए जा सकें।
