शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के साथ हुई घटना, पुलिस की मनमानी- सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल, SOP बनाने की मांग
- Reported by: गौरव श्रीवास्तव
- Updated Jan 30, 2026, 05:22 PM IST
प्रयागराज में माघ मेला के दौरान ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के साथ हुए दुर्व्यहार को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की गई है। याचिका में धार्मिक व्यक्तियों से जुड़े मामलों में पुलिस कार्रवाई के लिए SOP बनाने की मांग की गई है।
सुप्रीम कोर्ट (फाइल फोटो)
माघ मेला प्रयागराज के दौरान ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के साथ मौजूद नाबालिग वेदपाठी छात्रों और संतों के साथ कथित पुलिस मारपीट की घटना को लेकर सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दाखिल की गई है। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में बच्चों को शिखा पकड़कर घसीटते, सार्वजनिक रूप से पीटते और एक साधु के कपड़े फाड़ते हुए पुलिसकर्मी दिखाई दे रहे हैं। इस मामले को गंभीर बताते हुए सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस करने वाले अधिवक्ता उज्जवल गौर ने संविधान के तहत याचिका दायर की है।
मौनी अमावस्या की घटना के वीडियो बने आधार
याचिका माघ मेले के दौरान हुई कथित घटना से जुड़ी है। वीडियो में धार्मिक छात्रों और संतों के साथ कथित दुर्व्यवहार को दिखाया गया है। याचिकाकर्ता का कहना है कि ये दृश्य न केवल कानून व्यवस्था पर सवाल खड़े करते हैं बल्कि धार्मिक स्वतंत्रता और मानवीय गरिमा पर भी सीधा हमला हैं।
धार्मिक व्यक्तियों से जुड़े मामलों में SOP की मांग
याचिका में कहा गया है कि प्रयागराज में माघ मेला के दौरान ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के साथ हुए दुर्व्यहार को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की गई है। याचिका में धार्मिक व्यक्तियों से जुड़े मामलों में पुलिस कार्रवाई के लिए SOP बनाने की मांग की गई है।कोई स्पष्ट नियम और प्रक्रिया तय नहीं है। इसी वजह से अधिकारियों को खुली छूट मिल जाती है, जिससे इस तरह की घटनाएं सामने आती हैं। याचिका में अदालत से स्पष्ट दिशा निर्देश जारी करने की मांग की गई है।
संविधान के मौलिक अधिकारों के उल्लंघन का आरोप
याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया है कि इस घटना से संविधान के अनुच्छेद 14, 21 और 25 का उल्लंघन हुआ है। इसे क्रूर, अमानवीय और अपमानजनक व्यवहार बताया गया है, जो धार्मिक आस्था और मानवीय सम्मान के खिलाफ है।
शिकायत निवारण व्यवस्था न होने पर चिंता
याचिका में यह भी कहा गया है कि धार्मिक व्यक्तियों के खिलाफ कथित सरकारी ज्यादतियों के मामलों में शिकायत दर्ज कराने और न्याय पाने के लिए कोई प्रभावी व्यवस्था नहीं है। इससे पीड़ितों को राहत मिलने में देरी होती है।
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