TMC MP in Delhi: तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो व पश्चिम बंगाल की पूर्व सीएम ममता बनर्जी को एक और बड़ा झटका लग सकता है। विधायकों द्वारा अलग गुट बनाए जाने के बाद अब सांसद भी अलग खेमा तैयार करने की कोशिशों में जुट गए हैं। बताया जा रहा है कि टीएमसी के 19 सांसद दिल्ली पहुंचे हैं। ये सांसद एक नया खेमा बनाने की कोशिश में हैं। लोकसभा में फिलहाल अभिषेक बनर्जी टीएमसी के नेता हैं। बागी सांसद अपना गुट बनाकर नेता बदलना चाहते हैं, ठीक उसी तर्ज पर जिस तरह बंगाल में टीएमसी विधायकों ने ऋतुव्रत बनर्जी की अगुवाई में नया गुट बना लिया।
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संसदीय दल पर टूट का खतरा मंडराया
टीएमसी संसदीय दल में टूट के आासार नजर आ रहे हैं। बागी सांसदों का खेमा दो तिहाई सांसदों के समर्थन वाली चिट्ठी लेकर कल लोकसभा स्पीकर से मुलाकात कर सकता है। सूत्रों के मुताबिक, ये खेमा लोकसभा में टीएमसी नेता अभिषेक बनर्जी को हटाकर अपना नेता चुन सकता है। इसी सिलसिले में बागी सांसदों का गुट स्पीकर से मुलाकात कर सकता है। बताया जा रहा है कि चुनाव नतीजों से कई सांसद खफा हैं और वे अलग रास्ता अपना सकते हैं। रिपोर्टों में सूत्रों के हवाले से कहा गया है कि करीब 20 सांसद भारतीय जनता पार्टी के संपर्क में हैं और वे पाला बदल सकते हैं। सूत्रों का कहना है कि इस बारे में शीर्ष स्तर पर बातचीत चल रही है और टीएसमी सांसदों ने पार्टी छोड़ने इच्छा जताई है।
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संसद में टीएमसी के 41 सांसद
संसद में टीएमसी के 41 सांसद हैं। लोकसभा में तृणमूल कांग्रेस के 28 और राज्यसभा में 13 सांसद हैं। टीएमसी के ये सांसद यदि बगावत करते हैं तो ममता बनर्जी के लिए यह बहुत बड़ा झटका होगा। सांसदों की अगर बात करें तो संख्या बल के लिहाज से टीएमसी संसद में विपक्ष की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी है। ऐसे में सांसद अगर टूटते हैं तो राष्ट्रीय स्तर पर एवं संसद में ममता बनर्जी के रसूख में कमी आएगी। जानकार मान रहे हैं कि टीएमसी पर से ममता बनर्जी की पकड़ धीरे-धीरे कमजोर पड़ती जा रही है। बंगाल विधानसभा में स्पीकर का पद गंवाने और कोलकाता मेयर पद से फिरहाद हकीम के इस्तीफे के बाद ममता बनर्जी पर दबाव काफी बढ़ गया है। नेता एक-एक कर उनसे दूर जा रहे हैं। फिरहाद के बाद बिधाननगर मेयर कृष्णा ने भी इस्तीफा दे दिया है।
विद्रोह के बीज काफी पहले ही पड़ चुके थे
बंग भवन में 22 मई को तृणमूल के बागी विधायक ऋतब्रत बनर्जी और मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी के बीच कथित तौर पर हुई 'संयोगवश’ मुलाकात से शुरू हुआ घटनाक्रम बुधवार को उस समय निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया, जब 58 विधायकों ने पार्टी के विधायक दल पर नियंत्रण स्थापित कर लिया। विधायकों ने ऋतब्रत बनर्जी को अपना नेता चुन लिया और विधानसभा अध्यक्ष से भी इसकी मान्यता हासिल कर ली। इस बगावत ने औपचारिक रूप से उस पार्टी में विभाजन की रेखा खींच दी, जिसकी स्थापना ममता बनर्जी ने एक जनवरी, 1998 को कांग्रेस से अलग होकर की थी। हालांकि, विद्रोह के बीज काफी पहले ही पड़ चुके थे।
