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Karnataka: कर्नाटक में दलित शिक्षिका को आंगनवाड़ी में प्रवेश से रोका, अधिकारियों तक पहुंचा मामला

  • Authored by: प्रांजुल श्रीवास्तव
  • Updated Jul 30, 2023, 04:29 PM IST

Karnataka: महिला शिक्षिका आनंदम्मा का आरोप है कि वह दलित समुदाय से हैं, इसलिए मेरे साथ ऐसा किया जा रहा है। उन्होंने बताया, मैंने केंद्र में प्रवेश करने के कई प्रयास किए, लेकिन ग्रामीणों ने मुझे रोक दिया। पिछले 10 महीनों से मैं यहां आ रही हूं।

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आंगनवाड़ी केंद्र (फाइल फोटो)

Photo : BCCL

Karnataka: कर्नाटक में एक दलित शिक्षिका को आंगनवाड़ी केंद्र में प्रवेश से रोकने का मामला सामने आया है। यह मामला बेंगलुरु ग्रामीण जिले के डोड्डाबल्लापुर तालुक के मेलेकोटे गांव का है। कथित तौर पर यहां बीते 10 महीने से स्थानीय लोग दलित शिक्षिका को आंगनवाड़ी केंद्र में घुसने नहीं दे रहे हैं, जिससे महिला शिक्षिका केंद्र के बाहर खड़ी रहने के लिए मजबूर है।

शिक्षिका की पहलचान आनंदम्मा के रूप में हुई है, जो मडिगा समुदाय (एससी) से हैं। खबरों के मुताबिक, वह राजघट्टा में आंगनवाड़ी सहायिका के रूप में काम कर रही थीं। बाद में उन्हें आंगनवाड़ी शिक्षिका के रूप में पदोन्नत करके उनका स्थानांतरण सितंबर 2022 में मेलेकोटे गांव में किया गया था।

ग्रामीणों ने जताई थी आपत्ति

आनंदम्मा के स्थानांतरण के बाद मेलेकोटे के ग्रामीणों ने उनकी पदोन्नति और उनकी आंगनवाड़ी में पोस्टिंग दोनों पर आपत्ति जताई थी। इस मामले में अधिकारियों से शिकायत भी की गई थी, जिसमें कहा गया था कि उनकी जगह आंगनवाड़ी में किसी दूसरे शिक्षक की नियुक्ति की जाए। आरोप लगाया गया था कि महिला शिक्षिका मेलेकोटे गांव की नहीं हैं और केंद्र से तीन किलोमीटर दूर डोड्डारायप्पनहल्ली में रह रही हैं। नियमानुसान, किसी आंगनवाड़ी शिक्षिका को केंद्र से 3 किमी के भीतर रहना होता है।

दो बार हो चुकी है जांच

बेंगलुरु ग्रामीण जिले के महिला एवं बाल कल्याण विभाग के उप निदेशक नटराज एस ने का कहना है कि ग्रामीणों की शिकायत के बाद महिला शिक्षिका के निवास स्थान को लेकर दो बार सत्यापन कराया गया, जिसमें सामने आया कि महिला नियमानुसार केंद्र से सिर्फ तीन किलोमीटर की दूरी पर निवास कर रही है।

दलित होने के कारण हो रहा ऐसा

महिला शिक्षिका आनंदम्मा का आरोप है कि वह दलित समुदाय से हैं, इसलिए मेरे साथ ऐसा किया जा रहा है। उन्होंने बताया, मैंने केंद्र में प्रवेश करने के कई प्रयास किए, लेकिन ग्रामीणों ने मुझे रोक दिया। पिछले 10 महीनों से मैं यहां आ रही हूं, लेकिन वे मुझे काम नहीं करने दे रहे हैं। उन्होंने बताया, विशेषकर महिलाएं उनका रास्ता रोक रही हैं। उन्होंने इस मामले में अधिकारियों से भी दखल देने की मांग की है।

प्रांजुल श्रीवास्तव
प्रांजुल श्रीवास्तवauthor

<p>मैं इस वक्त टाइम्स नाउ नवभारत से जुड़ा हुआ हूं। पत्रकारिता के 8 वर्षों के तजुर्बे में मुझे और मेरी भाषाई समझ को गढ़ने और तराशने में कई वरिष्ठ पत्रकारों और संपादकों का योगदान रहा। 2016 में उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से शुरू हुआ यह सफर देश की राजधानी दिल्ली में 'टाइम्स नाउ नवभारत' तक आ पहुंचा है। अखबारों में रिपोर्टिंग करते हुए शहरों की धूल फांकना और डिजिटल पत्रकारिता की बारीकियों को समझते हुए देश-विदेश की खबरों को आप तक पहुंचाने का मेरा ये सफर काफी किस्से-कहानियों से भरा हुआ है। लखनऊ की बाबा भीम राव अंबेडकर सेंट्रल यूनिवर्सिटी के क्लासरूम में प्रोफेसरों से मिले किताबी ज्ञान और पत्रकारीय सिद्धांतों को जमीन पर उतारने का मौका मुझे 2016 में ही मिल गया। पहला ब्रेक टाइम्स ग्रुप के प्रतिष्ठित अखबार 'नवभारत टाइम्स' ने दिया। यहां बतौर इंटर्न मुझे कई सामाजिक संगठनों की रिपोर्टिंग करने का मौका मिला। दिनभर शहर में घूम-घूम कर खबरों को बटोरना और शाम होते ही उन्हें लिखकर डेस्क के हवाले करना मेरी दिनचर्या का हिस्सा हो गया। इस अनुभव ने मुझे समाज के तौर तरीकों से परिचित कराया तो न्यूजरूम में सीनियर्स से मिली डांट ने पत्रकारिता की बारीकियों और भाषाई मर्यादा को समझने में मदद की। करीब 3 से 4 महीनों की इंटर्नशिप के बाद मुझे 2017 आते-आते गांधी परिवार के गढ़ रायबरेली भेजा गया। यह समय उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव और सत्ता के बदलाव का था। यहां बतौर रिपोर्टर मैं पहली बार राजनीतिक खबरों से रूबरू हुआ। रायबरेली के मिजाज को करीब 8 महीनों तक समझने के बाद नवभारत टाइम्स ने मुझे वापस लखनऊ बुलाया और शहर की रिपोर्टिंग करने का मौका दिया। यहां विज्ञान, पर्यावरण, बाजार, लखनऊ विकास प्राधिकरण, आवास विकास और मेट्रो जैसी बीट पर जमकर काम किया। यह सफर अब पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिले मुरादाबाद तक पहुंच गया था, जहां मुझे दैनिक जागरण जैसे प्रतिष्ठित अखबार के लिए दो वर्षों तक रिपोर्टिंग करने का अवसर मिला। करीब दो वर्षों की पत्रकारिता के बाद अब मुझे देश की राजधानी की ओर रुख करना था और यह मौका अमर उजाला (डिजिटल) ने दिया। अखबारों की रिपोर्टिंग से निकलकर डिजिटल पत्रकारिता के अनुभव से मैं पहली बार रूबरू हो रहा था। यहां पर मुझे मेन डेस्क पर जिम्मेदारी मिली। जहां सबसे आगे रहते हुए सबसे सटीक खबरें आप तक पहुंचाना चुनौती भरा काम था, लेकिन पत्रकारिता की शुरुआत में मिले अनुभवों ने मेरा काम आसान बना दिया। यहां भी करीब दो वर्षों के बाद 2023 में मुझे टाइम्स ग्रुप से दोबारा जुड़ने का मौका मिला और टाइम्स नाउ नवभारत की मेन डेस्क पर मेरा सफर अब तक जारी है।</p>

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