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चीन-पाक की जरा सी हरकत तो नेस्तनाबूद होगा लाहौर और बीजिंग, भारतीय सेना ने एक्टिव की S-400, इसकी ताकत से कांपते हैं दुश्मन

  • Authored by: प्रांजुल श्रीवास्तव
  • Updated Oct 31, 2023, 08:12 AM IST

S-400 Missile System: भारत ने 2018-19 में रूस से एस-400 मिसाइल प्रणाली के पांच स्क्वाड्रन खरीदने का करार किया था। इसकी लागत करीब 35 हजार करोड़ रुपये थी। पांच में से तीन स्क्वाड्रन की डिलीवरी भारत को पहले ही मिल चुकी है, लेकिन उसे दो स्क्वाड्रन का इंतजार है। भारत जल्द ही रूसी अधिकारियों के साथ इनकी डिलीवरी के लिए बैठक कर सकता है।

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एस-400 मिसाइल प्रणाली

Photo : ANI

S-400 Missile System: S-400 वो मिसाइल है, जिसकी तैनाती भर से दुश्मन यह सोचने पर मजबूर हो जाता है कि हमला करें या न करें। भारत ने इस मिसाइल प्रणाली को चीन और पाकिस्तान की सीमाओं पर सक्रिय कर दिया है। सैन्य सूत्रों की मानें तो सीमा से जुड़े अलग-अलग सेक्टरों में ये मिसाइल प्रणालियां पहले से ही सक्रिय हैं। इसमें एक यूनिट चीन और पाकिस्तान सीमा पर एक्टिव की गई है। जबकि एक-एक मिसाइल चीन और पाकिस्तान सीमा पर अलग से तैनात की गई है।

रूस निर्मित इस मिसाइल की अधिकतम रेंज करीब 400 किलोमीटर या इससे ज्यादा है। खास बात यह है कि यह मिसाइल प्रणाली अपनी ओर आते दुश्मन को पलभर में राख में तब्दील कर देती है। इसे दुनिया की सबसे सटीक एयर डिफेंस मिसाइल प्रणाली भी माना जाता है और कहा जाता है कि यूक्रेन में रूस ने इन्हीं मिसाइलों से तबाही मचा दी थी।

रूस से एस-400 के पांच स्क्वाड्रन खरीदने का हुआ था करार

बता दें, भारत ने 2018-19 में रूस से एस-400 मिसाइल प्रणाली के पांच स्क्वाड्रन खरीदने का करार किया था। इसकी लागत करीब 35 हजार करोड़ रुपये थी। पांच में से तीन स्क्वाड्रन की डिलीवरी भारत को पहले ही मिल चुकी है, लेकिन उसे दो स्क्वाड्रन का इंतजार है। कहा जाता है कि भारतीय वायु सेना के लिए बनाए गए दो एस-400 स्क्वाड्रन का इस्तेमला रूस ने यूक्रेन पर किया था, जिसकी वजह से भारत को डिलीवरी मिलने में देरी हो रही है। अब खबर है कि भारत जल्द ही रूसी अधिकारियों के साथ इनकी डिलीवरी के लिए बैठक कर सकता है।

ताकत में है बेमिसाल

रूस से भारत को एस-400 के तीन स्क्वाड्रन मिल चुके हैं। इसका मतलब है कि एक स्क्वाड्रन में आठ लॉन्चर होती है। प्रत्येक लॉन्चर चार मिसाइलें दाग सकता है। यानी एक स्क्वाड्रन में 32 मिसाइलें होती हैं। इस मिसाइल प्रणाली की ताकत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि यह न्यूक्लियर मिसाइलों, फाइटर प्लेनों को हवा में ही ध्वस्त करने की क्षमता रखती है। यह प्रणाली माइनस 50 से लेकर माइनस 70 डिग्री में भी काम करने में सक्षम है, साथ ही इसे आसानी से डिटेक्ट भी नहीं किया जा सकता है।

प्रांजुल श्रीवास्तव
प्रांजुल श्रीवास्तवauthor

<p>मैं इस वक्त टाइम्स नाउ नवभारत से जुड़ा हुआ हूं। पत्रकारिता के 8 वर्षों के तजुर्बे में मुझे और मेरी भाषाई समझ को गढ़ने और तराशने में कई वरिष्ठ पत्रकारों और संपादकों का योगदान रहा। 2016 में उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से शुरू हुआ यह सफर देश की राजधानी दिल्ली में 'टाइम्स नाउ नवभारत' तक आ पहुंचा है। अखबारों में रिपोर्टिंग करते हुए शहरों की धूल फांकना और डिजिटल पत्रकारिता की बारीकियों को समझते हुए देश-विदेश की खबरों को आप तक पहुंचाने का मेरा ये सफर काफी किस्से-कहानियों से भरा हुआ है। लखनऊ की बाबा भीम राव अंबेडकर सेंट्रल यूनिवर्सिटी के क्लासरूम में प्रोफेसरों से मिले किताबी ज्ञान और पत्रकारीय सिद्धांतों को जमीन पर उतारने का मौका मुझे 2016 में ही मिल गया। पहला ब्रेक टाइम्स ग्रुप के प्रतिष्ठित अखबार 'नवभारत टाइम्स' ने दिया। यहां बतौर इंटर्न मुझे कई सामाजिक संगठनों की रिपोर्टिंग करने का मौका मिला। दिनभर शहर में घूम-घूम कर खबरों को बटोरना और शाम होते ही उन्हें लिखकर डेस्क के हवाले करना मेरी दिनचर्या का हिस्सा हो गया। इस अनुभव ने मुझे समाज के तौर तरीकों से परिचित कराया तो न्यूजरूम में सीनियर्स से मिली डांट ने पत्रकारिता की बारीकियों और भाषाई मर्यादा को समझने में मदद की। करीब 3 से 4 महीनों की इंटर्नशिप के बाद मुझे 2017 आते-आते गांधी परिवार के गढ़ रायबरेली भेजा गया। यह समय उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव और सत्ता के बदलाव का था। यहां बतौर रिपोर्टर मैं पहली बार राजनीतिक खबरों से रूबरू हुआ। रायबरेली के मिजाज को करीब 8 महीनों तक समझने के बाद नवभारत टाइम्स ने मुझे वापस लखनऊ बुलाया और शहर की रिपोर्टिंग करने का मौका दिया। यहां विज्ञान, पर्यावरण, बाजार, लखनऊ विकास प्राधिकरण, आवास विकास और मेट्रो जैसी बीट पर जमकर काम किया। यह सफर अब पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिले मुरादाबाद तक पहुंच गया था, जहां मुझे दैनिक जागरण जैसे प्रतिष्ठित अखबार के लिए दो वर्षों तक रिपोर्टिंग करने का अवसर मिला। करीब दो वर्षों की पत्रकारिता के बाद अब मुझे देश की राजधानी की ओर रुख करना था और यह मौका अमर उजाला (डिजिटल) ने दिया। अखबारों की रिपोर्टिंग से निकलकर डिजिटल पत्रकारिता के अनुभव से मैं पहली बार रूबरू हो रहा था। यहां पर मुझे मेन डेस्क पर जिम्मेदारी मिली। जहां सबसे आगे रहते हुए सबसे सटीक खबरें आप तक पहुंचाना चुनौती भरा काम था, लेकिन पत्रकारिता की शुरुआत में मिले अनुभवों ने मेरा काम आसान बना दिया। यहां भी करीब दो वर्षों के बाद 2023 में मुझे टाइम्स ग्रुप से दोबारा जुड़ने का मौका मिला और टाइम्स नाउ नवभारत की मेन डेस्क पर मेरा सफर अब तक जारी है।</p>

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