Iran War: मिडल ईस्ट में जारी तनाव और ईरान संकट के बीच समुद्र के रास्ते व्यापार करने वाले जहाजों पर खतरे के बादल मंडरा रहे हैं। कई भारतीय व्यापारिक जहाज इस खतरनाक युद्ध क्षेत्र में फंस चुके हैं। इसी अनिश्चितता और खौफ के बीच फंसे छत्तीसगढ़ के एक युवा मर्चेंट नेवी ट्रेनी नेविगेशन ऑफिसर रुद्रांश चौबे (Rudransh Chaubey) सुरक्षित अपने वतन लौट आए हैं। भारत वापस आकर रुद्रांश ने समुद्र के बीच बिताए उन डरावने दिनों की दास्तान बयां की, जहां उन्होंने 21 अन्य क्रू मेंबर्स के साथ मौत को बेहद करीब से देखा।
जब 'हॉर्मुज जलडमरूमध्य' में फंस गया जहाज
रुद्रांश चौबे ने न्यूज एजेंसी 'ANI' से बात करते हुए बताया कि उन्होंने दिसंबर 2025 में मिस्र (Egypt) से अपना जहाज ज्वाइन किया था। फरवरी के पहले हफ्ते में उनका जहाज सऊदी अरब को कार्गो डिलीवरी देने के लिए सामरिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में दाखिल हुआ।
सऊदी अरब से दूसरा कंसाइनमेंट लोड कर जब वे मिस्र के लिए निकले, तभी खबर आई कि ईरान हॉर्मुज जलडमरूमध्य को बंद कर सकता है। इस खबर के बाद अचानक समुद्र के बीचों-बीच जहाज पर भ्रम और डर का माहौल बन गया कि आगे क्या किया जाए।
आंखों के सामने उड़ रही थीं मिसाइलें और ड्रोन
कंपनी के निर्देश पर जहाज को बहरीन की ओर मोड़ा गया। रुद्रांश ने उस 'युद्ध जैसे हालात' को याद करते हुए कहा: "जब हम हॉर्मुज जलडमरूमध्य से गुजर रहे थे, तो हमने अपनी आंखों के सामने युद्ध छिड़ते देखा। हमारे जहाज के ऊपर से कई मिसाइलें और सुसाइड ड्रोन उड़ रहे थे। हमने देखा कि कैसे अरब देश उन मिसाइलों को हवा में ही इंटरसेप्ट कर नष्ट कर रहे थे। उसी दौरान मैंने एक दूसरे जहाज पर हुआ लाइव हमला भी देखा।"
जहाज के पास हुआ ड्रोन हमला
रुद्रांश ने बताया कि उनका जहाज कतर और दुबई के पास युद्ध क्षेत्र के बिल्कुल बीच में फंस गया था। 22 चालक दल के सदस्यों वाले इस जहाज के पास एक जोरदार ड्रोन हमला भी हुआ, जिसने सभी को झकझोर कर रख दिया।
रुद्रांश के मुताबिक, "शुरुआत में बोर्ड पर किसी को समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें, हर तरफ पैनिक था। चूंकि मर्चेंट नेवी में यह मेरा पहला अनुभव था, इसलिए शुरुआती दिन बेहद चुनौतीपूर्ण थे। लेकिन बाद में हमें भारत सरकार के डीजी शिपिंग और हमारी कंपनी से स्पष्ट गाइडलाइंस मिलीं। हमने खुद को सुरक्षित रखने के लिए जहाज पर कई सेफ्टी ड्रिल्स किए और खुद को मानसिक रूप से तैयार किया।"
सैटेलाइट बंद होने पर बढ़ जाती थी परिवार की धड़कनें
युद्ध क्षेत्र में फंसे होने के दौरान घर पर संपर्क साधना सबसे मुश्किल काम था। रुद्रांश ने बताया कि उनके परिवार वाले टीवी पर खाड़ी देशों के हालात देखकर डर जाते थे और फोन करते थे। रुद्रांश उन्हें दिलासा देते थे कि सब ठीक है। कई बार युद्ध क्षेत्र में सैटेलाइट सिग्नल ठप हो जाते थे, जिससे बातचीत बंद हो जाती थी। ऐसी स्थिति में वे जैसे-तैसे कम से कम एक मैसेज भेजने की कोशिश जरूर करते थे ताकि घरवाले परेशान न हों।
भारत सरकार के 'डीजी शिपिंग' ने बचाई जान
रुद्रांश ने मुश्किल घड़ी में मदद के लिए भारत सरकार की एजेंसी 'डीजी शिपिंग' की जमकर तारीफ की। उन्होंने कहा कि डीजी शिपिंग ने लगातार जहाज की निगरानी की, सुरक्षा के कड़े नियम भेजे और एक इमरजेंसी हेल्पलाइन नंबर दिया, जिससे क्रू का हौसला बढ़ा रहा।
वतन वापसी पर राहत
रुद्रांश चौबे का कॉन्ट्रैक्ट अब खत्म हो चुका है, जिसके बाद वे सुरक्षित अपने घर लौट आए हैं। मौत के मुंह से बाहर निकलने पर उन्होंने राहत की सांस ली है। उन्होंने खाड़ी देशों के समुद्री इलाके में फंसे अन्य साथियों और नाविकों के लिए संदेश देते हुए कहा कि वे पूरी तरह सतर्क रहें, सुरक्षित रहें और सरकार व कंपनी द्वारा जारी गाइडलाइंस का सख्ती से पालन करें।
