Delhi Protest News: दिल्ली में प्रदर्शन को लेकर पुलिस के खिलाफ दाखिल दो याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई शुरू हो गई है। पहली याचिका वकील शैलेन्द्र मणि त्रिपाठी की तरफ से दाखिल की गई है जिसमें केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन दिल्ली पुलिस आयुक्त अनुराग कुमार और DMRC अध्यक्ष डी. थारा के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई शुरू करने की मांग की गई है। याचिका मे 9 अक्टूबर के सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना का आरोप लगाया गया है।
जबकि दूसरी याचिका सीनियर एडवोकेट और TMC की राज्यसभा सांसद मेनका गुरूस्वामी ने दाखिल की है। इस याचिका में दिल्ली में विपक्षी नेताओं की एहतियातन हिरासत को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। मेनका गुरुस्वामी ने अपनी याचिका में कहा है कि शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन के मौलिक अधिकार को दबाने के लिए एहतियातन हिरासत का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता, खासकर उन नेताओं के खिलाफ जो पहले राज्यों के मुख्यमंत्री रह चुके हैं।
कपिल सिब्बल ने कोर्ट का शुक्रिया किया
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कोर्ट का शुक्रिया किया कि आप इस घड़ी में सुनवाई के लिए आए। इस पर जस्टिस बागची ने कहा, हम देश सेवा के लिए हमेशा मौजूद हैं। इस मामले में दिल्ली पुलिस, सरकार की तरफ से सोलिसिटर जनरल तुषार मेहता और एसजी पेश हुए। कपिल सिब्बल ने कहा कि वो हिरासत में लिए जाने के तरीके को पूरी तरह से चुनौती दे रहे हैं। वरिष्ठ वकील शादान फरासत ने SCAORA की याचिका मेंशन की, जिसमें वकीलों के साथ बदसलूकी का मामला उठाया
वहीं मनोज झा की याचिका के लिए गोपाल शंकर नारायण पेश हुए।
कपिल सिब्बल ने कहा, लोगों को गैरकानूनी तरीके से हिरासत में लिया गया है। 4 किलोमीटर के प्रतिबंधित क्षेत्र की सीमा का भी उल्लंघन किया गया है। इन दोनों मामलों पर सुप्रीम कोर्ट का अनुराधा भसीन मामले में दिया गया फैसला लागू होता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, हम समझते हैं कि इन घटनाओं से आप सभी काफी परेशान हैं, इसीलिए आप हमारे सामने आए हैं। सिब्बल ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी 45 मेट्रो स्टेशन बंद रखे गए…4 किमी के दायरे में इंटरनेट बंद रखा गया। ये आपकी अवमानना है।
वकील शादान फरासत ने कहा, कल मेरे साथ भी मारपीट की गई
वरिष्ठ अधिवक्ता शादान फरासत ने कहा, कल मेरे साथ भी मारपीट की गई। दूसरे वकीलों के साथ भी ऐसा हुआ। हमारा मुद्दा सिर्फ वकीलों तक सीमित नहीं है। कल शहर में हालात बेहद दमनकारी थे। लोगों को खड़े तक नहीं होने दिया जा रहा था। मुझे चलती हुई बस में फेंक दिया गया। कल हम पुलिस स्टेट यानी पुलिस के मनमाने नियंत्रण वाले राज्य से बस एक कदम दूर थे। सुप्रीम कोर्ट नागरिकों के शांतिपूर्ण तरीके से विरोध-प्रदर्शन करने के अधिकार को बहाल करे। पूरी तरह से पुलिस स्टेट जैसी स्थिति बन गई थी, जो भी दिखा उसे पुलिस पकड़ रही थी।
सीनियर एडवोकेट गोपाल शंकर नारायणन ने कहा, मुझे बताया गया है कि अभी भी सुप्रीम कोर्ट के बाहर धारा 163 लागू कर दी गई है। जिस तरह की हिंसा की जा रही है, उसे देखिए। शांतिपूर्ण तरीके से आगे बढ़ रहे लोगों को हिरासत में लेने, उन्हें पीटने और उन पर हमला करने की क्या जरूरत थी? इसकी कोई जरूरत नहीं थी। यह मामला अब हममें से कई लोगों के लिए भावनात्मक हो गया है, क्योंकि हमें एहसास है कि यह स्थिति हमारे दरवाजे तक आ पहुंची है। हम आज ही निर्देश चाहते हैं कि लोगों की स्वतंत्र आवाजाही बहाल की जाए और बैरिकेड हटाए जाएं। 40 मीटर से ज्यादा का इलाका बंद कर दिया गया था। पुलिसकर्मी बिना बैज के अब भी कार्रवाई कर रहे हैं।
प्रदर्शन करने की प्रक्रिया पुलिस एक्ट के दायरे में होनी चाहिए
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा, विरोध-प्रदर्शन करना नागरिकों का अधिकार है, लेकिन प्रदर्शन करने की प्रक्रिया पुलिस एक्ट के दायरे में होनी चाहिए। लोगों को हिरासत में लेने, किन परिस्थितियों में हिरासत में लिया गया, किस तरीके से कार्रवाई की गई और इसके पीछे क्या औचित्य था।इन सभी मुद्दों पर राज्य सरकार अपना जवाब दाखिल करे। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हिरासत में लेने की कार्रवाई और उसके औचित्य पर राज्य सरकार का पक्ष सामने आने के बाद तय करेंगे।
