Delhi Gymkhana Club: दिल्ली जिमखाना क्लब ने केंद्र सरकार के उस आदेश के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है, जिसमें क्लब को लुटियंस दिल्ली स्थित अपनी 27.3 एकड़ जमीन 5 जून तक खाली करने का निर्देश दिया गया है। मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने तत्काल सुनवाई की मांग स्वीकार करते हुए याचिका को 26 मई के लिए लिस्ट कर दिया है। वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने मामले में तत्काल सुनवाई की मांग की।
किस आधार पर दी गई है केंद्र को चुनौती?
याचिका में दिल्ली जिमखाना क्लब ने केंद्र सरकार के आदेश को कई आधारों पर चुनौती दी है। क्लब का कहना है कि परिसर अपने कब्जे में लेने के लिए सरकार ने “डिफेंस इंफ्रास्ट्रक्चर”, “पब्लिक सिक्योरिटी” और “गवर्नेंस इंफ्रास्ट्रक्चर” जैसे कारण बताए हैं, लेकिन इनके समर्थन में कोई ठोस जानकारी नहीं दी गई। क्लब ने इसे महज एक दिखावटी आधार बताया है। याचिका में यह भी कहा गया है कि आदेश में संपत्ति, दिए गए प्रीमियम और परिसर में मौजूद भवनों एवं ढांचों के नुकसान के एवज में किसी प्रकार के मुआवजे का प्रावधान नहीं किया गया है। याचिका में एक और महत्वपूर्ण तथ्य यह रखा गया है कि दिल्ली सरकार ने 1 अक्टूबर 2009 को इस परिसर को “ग्रेड-II हेरिटेज बिल्डिंग/प्रिसिंक्ट” घोषित किया था। क्लब का कहना है कि इससे इसकी ऐतिहासिक और संस्थागत अहमियत साबित होती है।
दिल्ली जिमखाना क्लब का क्या है दावा?
क्लब ने संविधान के अनुच्छेद 300A का हवाला देते हुए दावा किया है कि सरकार का कदम संपत्ति के अधिकार से जुड़े संवैधानिक संरक्षण का उल्लंघन है। याचिका के अनुसार, केंद्र सरकार के भूमि एवं विकास कार्यालय ने 18 दिसंबर 2009 के एक पत्र में स्वयं स्वीकार किया था कि क्लब के स्वामित्व और अधिकार बहाल हैं। ऐसे में बिना कानून का पालन किए अधिग्रहण की प्रक्रिया, कानूनी सुरक्षा उपायों और मुआवजे के मालिकाना अधिकार समाप्त नहीं किए जा सकते।
याचिका में केंद्र सरकार की कार्रवाई को दुर्भावनापूर्ण और कपटपूर्ण अधिकार का प्रयोग बताया गया है। क्लब का आरोप है कि यह जिमखाना क्लब पर नियंत्रण हासिल करने की सरकार की कोशिश का हिस्सा है, जिसमें हाल में प्रबंधन अपने हाथ में लेने का प्रयास किया था। इसके अलावा क्लब ने दलील दी है कि सरकार कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया अपनाने के बजाय प्रशासनिक आदेश, सरकार की शक्ति और पुलिस कार्रवाई के दबाव के जरिए जबरन बेदखली का प्रयास कर रही है। अब इस मामले पर दिल्ली हाईकोर्ट में 26 मई को सुनवाई होगी।
जिमखाना क्लब का इतिहास
दिल्ली जिमखाना क्लब ने अपनी याचिका में सिर्फ बेदखली आदेश को चुनौती नहीं दी, बल्कि क्लब के इतिहास, उसकी कानूनी स्थिति और केंद्र सरकार के साथ दशकों पुराने संबंधों का भी विस्तार से जिक्र किया है। याचिका के मुताबिक, दिल्ली जिमखाना क्लब की स्थापना 3 जुलाई 1913 को एक गैर-लाभकारी संस्था के रूप में हुई थी। उस समय इसका नाम “इम्पीरियल दिल्ली जिमखाना क्लब” था और इसे ब्रिटिश अधिकारियों एवं सैन्य अफसरों के खेल और सामाजिक गतिविधियों के लिए बनाया गया था। क्लब ने अदालत को बताया है कि 28 फरवरी 1928 को तत्कालीन “सेक्रेटरी ऑफ स्टेट फॉर इंडिया इन काउंसिल” ने करीब 27.3 एकड़ जमीन का “परपेचुअल लीज डीड” क्लब के पक्ष में निष्पादित किया था। यह जमीन मौजूदा 2, सफदरजंग रोड, नई दिल्ली स्थित परिसर है। क्लब का कहना है कि यह लीज “इन परपेच्युटी” यानी स्थायी अधिकार के तौर पर दी गई थी।
याचिका में यह भी कहा गया है कि इस स्थायी लीज के बदले क्लब ने 1928 में 5,460 रुपये का “प्रिंसली प्रीमियम” अदा किया था। क्लब का दावा है कि उसी भुगतान के आधार पर उसे स्थायी लीजहोल्ड अधिकार दिए गए। क्लब ने अपने इतिहास का हवाला देते हुए कहा है कि आजादी के बाद इसका नाम बदलकर “दिल्ली जिमखाना क्लब” कर दिया गया, लेकिन तब से लेकर अब तक क्लब लगातार उसी परिसर में संचालित हो रहा है। याचिका में कहा गया है कि क्लब ने पिछले करीब एक सदी में खेल और सामाजिक बुनियादी ढांचे को विकसित किया है और यहां अंतरराष्ट्रीय स्तर की टेनिस, स्क्वैश, बैडमिंटन और अन्य खेल सुविधाएं मौजूद हैं। यहां डेविस कप जैसे बड़े खेल आयोजन भी हुए हैं। क्लब ने यह भी बताया है कि मौजूदा भवन का डिजाइन प्रसिद्ध आर्किटेक्ट रॉबर्ट टी. रसेल ने तैयार किया था, जिन्होंने कनॉट प्लेस और तत्कालीन प्रधानमंत्री आवास का भी डिजाइन बनाया था।
