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TMC के लिए आ रहा एक और 'तूफान'! विधायकों के बाद क्या अब सांसद होंगे बागी, BJP के संपर्क में 20 MP

संसद में टीएमसी के 41 सांसद हैं। लोकसभा में तृणमूल कांग्रेस के 28 और राज्यसभा में 13 सांसद हैं। टीएमसी के ये सांसद यदि बगावत करते हैं तो ममता बनर्जी के लिए यह बहुत बड़ा झटका होगा। सांसदों की अगर बात करें तो संख्या बल के लिहाज से टीएमसी संसद में विपक्ष की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी है।

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टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी।

Photo : PTI

TMC Rebellion: पश्चिम बंगाल चुनाव के बाद तृणमूल कांग्रस को राजनीतिक रूप से झटके पर झटके लग रहे हैं। विधायकों के बागी होने के बाद अब उसके सांसद बागवत के रास्ते पर निकल सकते हैं। टीएमसी को टूटने का डर सता रहा है। बताया जा रहा है कि चुनाव नतीजों से कई सांसद खफा हैं और वे अलग रास्ता अपना सकते हैं। रिपोर्टों में सूत्रों के हवाले से कहा गया है कि करीब 20 सांसद भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के संपर्क में हैं और वे पाला बदल सकते हैं। सूत्रों का कहना है कि इस बारे में शीर्ष स्तर पर बातचीत चल रही है और टीएसमी सांसदों ने पार्टी छोड़ने इच्छा जताई है।

संसद में टीएमसी के 41 सांसद

संसद में टीएमसी के 41 सांसद हैं। लोकसभा में तृणमूल कांग्रेस के 28 और राज्यसभा में 13 सांसद हैं। टीएमसी के ये सांसद यदि बगावत करते हैं तो ममता बनर्जी के लिए यह बहुत बड़ा झटका होगा। सांसदों की अगर बात करें तो संख्या बल के लिहाज से टीएमसी संसद में विपक्ष की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी है। ऐसे में सांसद यदि टूटते हैं तो राष्ट्रीय स्तर पर एवं संसद में ममता बनर्जी के रसूख में कमी आएगी। जानकार मान रहे हैं कि टीएमसी पर से ममता बनर्जी की पकड़ धीरे-धीरे कमजोर पड़ती जा रही है। बंगाल विधानसभा में स्पीकर का पद गंवाने और कोलकाता मेयर पद से फिरहाद हकीम के इस्तीफे के बाद ममता बनर्जी पर दबाव काफी बढ़ गया है। नेता एक-एक कर उनसे दूर जा रहे हैं। फिरहाद के बाद बिधाननगर मेयर कृष्णा ने भी इस्तीफा दे दिया है।

विद्रोह के बीज काफी पहले ही पड़ चुके थे

बंग भवन में 22 मई को तृणमूल के बागी विधायक ऋतब्रत बनर्जी और मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी के बीच कथित तौर पर हुई 'संयोगवश’ मुलाकात से शुरू हुआ घटनाक्रम बुधवार को उस समय निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया, जब 58 विधायकों ने पार्टी के विधायक दल पर नियंत्रण स्थापित कर लिया। विधायकों ने ऋतब्रत बनर्जी को अपना नेता चुन लिया और विधानसभा अध्यक्ष से भी इसकी मान्यता हासिल कर ली। इस बगावत ने औपचारिक रूप से उस पार्टी में विभाजन की रेखा खींच दी, जिसकी स्थापना ममता बनर्जी ने एक जनवरी, 1998 को कांग्रेस से अलग होकर की थी। हालांकि, विद्रोह के बीज काफी पहले ही पड़ चुके थे।

अभिषेक को लेकर पार्टी में असंतोष बढ़ा

विधानसभा चुनाव में चार मई को भाजपा के हाथों मिली हार के बाद पार्टी के भीतर कलह उभरने लगी थी। पार्टी के कुछ विधायकों को लगने लगा था कि संगठन और निर्णय प्रक्रिया में पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी के भतीजे एवं सांसद अभिषेक बनर्जी का दखल लगातार बढ़ रहा है, जिससे असंतोष धीरे-धीरे गहराता चला गया। नवनिर्वाचित विधायकों की बैठक में छह मई को ममता बनर्जी ने कथित तौर पर विधायकों से चुनाव अभियान में अभिषेक बनर्जी की भूमिका के लिए खड़े होकर उनका अभिनंदन करने को कहा। हालांकि इसका उद्देश्य उनके योगदान को स्वीकारना था, लेकिन पार्टी के एक वर्ग में इस कदम को लेकर फुसफुसाहट शुरू हो गई। कुछ विधायकों को लगने लगा कि पार्टी का केंद्र धीरे-धीरे एक ही परिवार के इर्द-गिर्द सिमटता जा रहा है।

19 मई को सामने आया पहला असंतोष

पार्टी में असंतोष पहली बार खुले तौर पर 19 मई को सामने आया। एक अन्य बैठक में ऋतब्रत बनर्जी और इंटाल्ली के विधायक संदीपन साहा ने सवाल उठाया कि फालटा विधायक जहांगीर खान द्वारा पुन:चुनाव से हटने की सार्वजनिक घोषणा किए जाने के बावजूद पार्टी ने उन्हें निष्कासित क्यों नहीं किया। चूंकि जहांगीर को अभिषेक बनर्जी का करीबी माना जाता था, इसलिए इस आलोचना को व्यापक तौर पर तृणमूल के राष्ट्रीय महासचिव को सीधी चुनौती के रूप में देखा गया। वरिष्ठ विधायक कुणाल घोष ने भी इसी तरह की चिंताएं जताईं, हालांकि बाद में उन्होंने खुद को बागी खेमे से अलग कर लिया।

22 मई को दिल्ली में सुवेंदु से हुई ऋतब्रत की मुलाकात

घटनाक्रम ने तीन दिन बाद निर्णायक मोड़ लिया। ऋतब्रत बनर्जी राज्यसभा सदस्य के रूप में अपना कार्यकाल समाप्त होने के बाद की औपचारिकताएं पूरी करने के लिए 22 मई को दिल्ली गए हुए थे तभी वह दोपहर के भोजन के लिए बंग भवन पहुंचे, जहां उनकी मुलाकात मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी से हो गई। इसके बाद ऋतब्रत ने सार्वजनिक रूप से विपक्षी विधायकों और सांसदों को प्रशासनिक समीक्षा बैठकों में आमंत्रित करने के सुवेंदु अधिकारी के फैसले का स्वागत किया और इसे स्वस्थ लोकतांत्रिक परंपरा बताया। उनके इस बयान ने तत्काल राजनीतिक हलकों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया।

जाली हस्ताक्षर सौंपने का आरोप

हालांकि, कुछ ही दिन में तृणमूल एक अलग विवाद में घिर गई। 25 मई को आरोप सामने आए कि विधानसभा में विधायक दल के नेतृत्व ढांचे से जुड़े दस्तावेजों पर कई विधायकों के जाली हस्ताक्षर कर विधानसभा अध्यक्ष को सौंपे गए थे। इस आरोप ने पहले से सुलग रहे असंतोष को और हवा दे दी तथा पार्टी के भीतर जारी खींचतान को खुले टकराव में बदल दिया। इस विवाद ने 27 मई को कानूनी मोड़ ले लिया जब ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा ने विधानसभा अध्यक्ष से औपचारिक शिकायत कर हस्ताक्षरों की जालसाजी का आरोप लगाया। इसके बाद विधानसभा सचिवालय ने मामले को पुलिस के संज्ञान में दिया, जिसके साथ ही अपराध अन्वेषण विभाग (सीआईडी) की ओर से जांच शुरू हो गई।

सोनारपुर दौरे के दौरान भीड़ ने अभिषेक पर हमला किया

अगले दो दिन के दौरान जब जांचकर्ताओं ने विधायकों से पूछताछ शुरू की, तो मामला महज एक प्रक्रियागत विवाद तक सीमित नहीं रहा बल्कि तेजी से राजनीतिक संघर्ष में बदल गया। यह राजनीतिक सकंट 30 मई को उस समय और गहरा गया, जब अभिषेक बनर्जी पर सोनारपुर दौरे के दौरान भीड़ ने हमला कर दिया। यद्यपि सभी राजनीतिक दलों ने इस घटना की निंदा की, लेकिन तृणमूल के कई नेताओं ने निजी तौर पर संगठन और विधायक दल के कुछ वर्गों की अपेक्षाकृत फीकी प्रतिक्रिया पर ध्यान दिलाया। उनके अनुसार, यह नेतृत्व और निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के एक हिस्से के बीच बढ़ती दूरी का संकेत था। इसके बाद 31 मई तक नेतृत्व की पकड़ कमजोर पड़ती साफ दिखाई देने लगी। ममता बनर्जी ने अपने कालीघाट स्थित आवास पर नवनिर्वाचित विधायकों की बैठक बुलाई, लेकिन उसमें अपेक्षा से कम उपस्थिति रही।

शिकायत के बाद सीआईडी जांच हुई शुरू

निर्णायक रूप से विभाजन एक जून को मुख्यमंत्री शुभेंदु द्वारा सार्वजनिक रूप से यह खुलासा किए जाने के कुछ ही घंटे बाद सामने आया कि सीआईडी जांच ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा की शिकायतों के आधार पर शुरू हुई है। तृणमूल कांग्रेस ने दोनों नेताओं को पार्टी से निष्कासित कर दिया। लेकिन संकट को थामने के बजाय इस कदम ने बगावत को और तेज कर दिया। देखते ही देखते बागी खेमे के भीतर इस मुहिम को एक नाम भी मिल गया-'ऑपरेशन क्राउन प्रिंस’। यह राजनीतिक नाटक बुधवार को चरम पर पहुंच गया जब 58 विधायकों के एक समूह ने विधानसभा अध्यक्ष को पत्र सौंपकर ऋतब्रत बनर्जी को विधायक दल का नेता चुने जाने और नई टीम के गठन की जानकारी दी।

13 दिन में ममता ने देखी इतिहास की सबसे बड़ी दरार

विधानसभा अध्यक्ष ने इस दावे को स्वीकार कर लिया। इसके साथ ही बागी गुट को तृणमूल कांग्रेस के आधिकारिक विधायक दल के रूप में मान्यता मिल गई। कुछ ही मिनट बाद इन्हीं में से कई विधायक राज्य सचिवालय ’नबान्न’ में शुभेंदु अधिकारी द्वारा बुलाई गई सरकारी समीक्षा बैठक में भी शामिल हुए। दिल्ली में शुरू हुई यह बगावत, जिसने हस्ताक्षर जालसाजी के आरोपों, संगठन के भीतर बढ़ते असंतोष और उत्तराधिकार की लड़ाई के सहारे रफ्तार पकड़ी थी, उसका अंतिम और निर्णायक अध्याय आखिरकार विधानसभा के भीतर ही लिखा गया। ममता बनर्जी के व्यक्तित्व और राजनीतिक प्रभुत्व के इर्द-गिर्द खड़ी हुई पार्टी ने महज 13 दिन में अपने अब तक के इतिहास की सबसे बड़ी दरार देखी।

(एजेंसी इनपुट)

Alok Rao
आलोक कुमार रावauthor

19 वर्षों से मीडिया जगत में सक्रिय आलोक राव ने प्रिंट, न्यूज एजेंसी, टीवी और डिजिटल चारों ही माध्यमों में काम किया है। इस लंबे अनुभव ने उन्हें समाचारों की समझ, प्रेजेंटेशन, डिटेलिंग और न्यूजरूम डायनेमिक्स में असाधारण दक्षता प्रदान की है। राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों में विशेष रुचि रखने के साथ-साथ जियो-पॉलिटिक्स एवं डिफेंस की स्टोरीज में इनकी खासी दिलचस्पी है। आलोक ने अलग-अलग माध्यमों में काम करते हुए समाचारों की समझ, प्रस्तुति और विश्लेषण में मजबूत दक्षता विकसित की है और अब तक 25,000 से अधिक आर्टिकल तैयार कर चुके हैं। तथ्यों की गहन जांच, मजबूत न्यूज सेंस और तेज निर्णय क्षमता उनकी पत्रकारिता की प्रमुख खासियतें हैं।

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